छत्तीसगढ़: 38% खाद्य पदार्थ स्तरहीन

रायपुर | विशेष संवाददाता: छत्तीसगढ़ के 38 फीसदी खाद्य पदार्थ जांच में मिलावटी, असुरक्षित, घटिया तथा मिसब्रांडेंड पाये गये. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में एक साल में कुल 294 खाद्य पदार्थो के मानकों की जांच की गई जिसमें से 112 अमानत स्तर के पाये गये. ज्ञात्वय रहे कि यह आकड़ा केवल जांच के लिये जब्त किये गये नमूनों का ही है.

भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के अनुसार छत्तीसगढ़ में इन अमानत पाये गये 112 मामलों में किसी को भी सजा नहीं हुई. इनमें से 56 मामलों में सिविल सूट दायर किया गया है. किसी के भी खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज नहीं किये गये हैं. इनमें से 7 मामलों में जुर्माना हुआ है. जिससे 3 लाख 49 हजार रुपयों का जुर्माना वसूला गया.

उल्लेखनीय है कि खाद्य सामग्रियों पर गलत लेबल लगाने, मिलावट करने या असुरक्षित पदार्थ बेचने पर छह महीने से लेकर आजीवन कारावास का प्रावधान है. इसके साथ ही 10 लाख रुपये तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

गौरतलब है कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 को लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाली गई है. राजधानी रायपुर के कालीबाड़ी में राज्य का खाद्य पदार्थो की जांच करने वाला लैब स्थित है.

सरकारी अनुमान के अनुसार छत्तीसगढ़ में खाद्य पदार्थो का व्यापर करने वाली 2 लाख 30 हजार हैं. 4507 खाद्य व्यापार इकाइयों को लाइसेंस प्राप्त है तथा 4722 खाद्य व्यापार इकाइयों पंजीकृत हैं.

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक गलत तरीके से ब्रांडिंग करते या मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचते पाई जाने वाली हर चार में से तीन कंपनियां सजा पाने से बच जाती हैं.

गत सात सालों में 53,406 कंपनियों के विरुद्ध खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लंघन करने के लिए मामला चलाया गया, जिनमें से सिर्फ 25 फीसदी को ही दोषी ठहराया जा सका.

गत वर्ष देश भर में दाल, घी और चीनी जैसे खाद्य सामग्रियों के 72,200 नमूने एकत्र किए गए. इनमें से 18 फीसदी नमूने मानक से कम गुणवत्ता के और मिलावटी पाए गए.

मिलावटी खाद्य सामग्री खाने से कैंसर, अनिद्रा तथा अन्य प्रकार के स्नायु संबंधी रोग पैदा होते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक कम मामलों में दोष साबित न हो पाना एक प्रमुख कारण है, जिसकी वजह से देश भर में मिलावट की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है.

अधिकारी कहते हैं कि खाद्य विश्लेषकों की कमी के कारण कम मामलों में दोष साबित हो पाता है.

एक रपट के मुताबिक, गत वर्ष विश्लेषकों की कमी के चलते राजस्थान ने सात सरकारी स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं बंद कर दीं.

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के एक अधिकारी ने बताया, “देश में सिर्फ 200 खाद्य विश्लेषक हैं. इसलिए अदालत में आरोप साबित कर पाना कठिन हो जाता है.”

2014-15 में 45 फीसदी मामलों में दोष साबित हुए, जबकि 2008-09 की दर 16 फीसदी थी. यह वृद्धि अगस्त 2011 में एफएसएसएआई स्थापित होने के कारण हुई है.

खाद्य सामग्रियों पर गलत लेबल लगाने, मिलावट करने या असुरक्षित पदार्थ बेचने पर छह महीने से लेकर आजीवन कारावास का प्रावधान है. इसके साथ ही 10 लाख रुपये तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

गत तीन वर्षो में सरकार ने इस कानून के तहत करीब 17 करोड़ रुपये जुर्माना वसूले हैं.

गत तीन साल के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू एवं कश्मीर जैसे कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी राज्यों में आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सका. इस मामले में बिहार, राजस्थान और हरियाणा का प्रदर्शन काफी बुरा है.

छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में हर तीन में से एक नमूना मानक पर खरा नहीं उतर पाया.

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