कोल कंपनियों को छूट का विरोध

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ सरकार ने कोयला कंपनियों को तीन हजार करोड़ रुपयों की छूट दी है जिसका सर्वत्र विरोध किया जा रहा है. सोमवार को छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव संजय पराते ने इसका विरोध किया था. मंगलवार को छत्तीसगढ़ बचाओं मंच भी कोयला कंपनियों को तीन हजार करोड़ रुपये की स्टाम्प ड्यूटी में छूट दिये जाने का विरोध किया है. माकपा नेता ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार वास्तव में कुल उत्पादित खनिज मूल्य का केवल 15% ही रायल्टी के रूप में वसूल करती है. इस संशोधन अध्यादेश के जरिये वह लगभग मुफ्त में ही बहुमूल्य कोयला संपदा को इन कार्पोरेट घरानों को सौंप रही है, क्योंकि इस अध्यादेश से एक ही झटके में बालको को 500 करोड़, मोनेट को 1300 करोड़ तथा हिंडाल्को को 2700 करोड़ रुपयों का फायदा पहुंचने जा रहा है.

छत्तीसगढ़ बचाओ मंच के संयोजक आलोक शुक्ला तथा नंदकुमार कश्यप ने एक प्रेस वित्रप्ति के माध्यम से कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा अध्यादेश के माध्यम से कोयला खनन कंपनियों को दी गई 3 हजार करोड़ की रियायत जन विरोधी एवं कार्पोरेट परस्त निर्णय हैं. राज्य सरकार इस अध्यादेश को तुरंत वापिस ले.


नंदकुमार कश्यप ने कहा, “छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने 4 बड़ी कोयला कंपनियों बालको, हिंडाल्को, मोनेट, और एसीसी को 3 हजार करोड़ रूपये की स्टाम्प शुल्क में छूट दी है. राज्य सरकार का यह फैसला ना सिर्फ जनविरोधी बल्कि अमूल्य खनिज सम्पदा को कौड़ियो के दाम पर कार्पोरेट घरानों को सौंपने की कोशिश है, जिसका छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन तीव्र शब्दों में निंदा करते हुए विरोध करता है.”

छत्तीसगढ़ सरकार ने भारतीय स्टाम्प (छत्तीसगढ़ संसोधन) अध्यादेश 2015 लाकर मूल अधिनियम की अनुसूची 1 (क) में संसोधन करके खनन पट्टो पर लगने वाली स्टाम्प डयूटी में नीलामी की राशि पर छूट प्रदान की है.

उन्होंने आगे कहा, कोल ब्लाकों की नीलामी के 6 महीने के बाद भी कंपनियों के द्वारा उत्खनन शुरू करने की बजाये स्टाम्प ड्यूटी में रियायत के लिए राज्य सरकार पर दबाव बनाया जा रहा था, लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल है कि नीलामी में भाग लेने वाली इन कंपनियों को पहले से ही पता था की नीलामी की राशि से स्टाम्प ड्यूटी के शुल्क में वृधि होगी. इन कंपनियों के द्वारा मुनाफे का आकलन करने के बाद ही नीलामी में भाग लिया गया होगा. फिर आज स्टाम्प ड्यूटी में माफ़ी कई गंभीर सवाल पैदा करता है.

छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा यह कहना की महाधिवक्ता से अभिमत लिया गया है, समझ से परे हैं क्योंकि प्राकृतिक खनिज संसाधन समाज की संपदा है. राज्य सरकार ने स्टाम्प शुल्क परिवर्तन से पहले ना तो जनता से कोई राय या परामर्श मांगी है और ना ही विधानसभा में चर्चा करवाई गई है.

भाजपा नीत केंद्र व राज्य सरकार कार्पोरेट घरानों को मुनाफा पहुंचाने के लिए नीतियों और कानूनों में लगातार संशोधन कर रही है. प्राकृतिक संसाधनों की कार्पोरेट लूट को आसान बनाने में छत्तीसगढ़ सरकार हमेशा आगे रहती है. स्टाम्प शुल्क में माफ़ी इसका ताजा उदाहरण हैं. स्टाम्प शुल्क में माफ़ी मोदी सरकार के उन सभी दावों की भी पोल खोलता हे जिसमे यह कहा जा रहा था की नीलामी से सरकार के खजाने में करोड़ों रूपये जमा होगें.

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन पुनः राज्य सरकार के इस फैसले की निंदा करते हुए भारतीय स्टाम्प संसोधन अधिनियम को वापिस लेनें की मांग करता हैं.

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