मजदूरों को हेलमेट नहीं…

मई दिवस पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने मजदूरों के लिये तीन घोषणायें की हैं. इन घोषणाओं के अनुसार भवन निर्माण के काम में लगे छत्तीसगढ़ के 9 लाख श्रमिकों के लिये मुख्यमंत्री हेलमेट योजना शुरु की जा रही है. इसके तहत इन असंगठित क्षेत्र के कामगारों को नि:शुल्क हेलमेट वितरित किये जायेंगे.

राज्य के श्रम मंत्री चंद्रशेखर साहु की उपस्थिति में मुख्यमंत्री ने रायपुर सहित प्रदेश के बड़े शहरों में श्रमिकों के लिये प्रतीक्षालय एवं भोजनालय खोले जाने की घोषणा की. इसके लिये बीस-बीस लाख रुपये मंजूर किये गये हैं.

इसके अलावा छत्तीसगढ़ के कामगारों के लिये एक हेल्पलाइन नंबर शुरु किया जा रहा है, जिसका लाभ दूसरे राज्यों में कार्यरत छत्तीसगढ़ी मजदूरों को मिलेगा. बंधक बनाये जाने पर इस नंबर पर संपर्क किया जा सकता है. इससे यदि उन्हें बंधक बनाया गया हो तो शासन को सूचना दी जा सकती है.

पहली नजर में ये घोषणायें बेहतर लगती हैं और माना जा सकता है कि इससे मजदूरों की हालत में सुधार होगा. लेकिन इन सभी घोषणाओं पर थोड़ा रुक कर विचार करने की ज़रुरत है. सरकार जब मजदूरों को हेलमेट दे कर उनके सिर की सुरक्षा की बात करती है तो यह भी देखा जाना जरुरी है कि इन मजदूरों के श्रम और जीवन की बेहतरी के लिये किस तरह की कोशिशें की गईं?

कानूनन यह शासन की जिम्मेदारी है कि वह कामगारों के लिये न्यूनतम वेतन घोषित करे. ताकि मजदूर दो जून का खाना खा सके तथा वह अपनी न्यूनतम जरूरतों को पूरा कर सके. छत्तीसगढ़ सरकार ने 1 अप्रैल 2013 को प्रदेश के मजदूरों के लिये न्यूनतम वेतन घोषित किया है. जिसके अनुसार कुशल श्रमिकों को प्रतिदिन 207 रुपये, अर्धकुशल को 197 रुपये प्रतिदिन तथा अकुशल को 190 रुपये मिलना चाहिये. न्यूनतम वेतन की घोषणा से ही साफ है कि यह अपने आप में अपर्याप्त है. केवल 5385 रुपयों में क्या एक परिवार न्यूनतम रूप से जी पायेगा. जाहिर है, यहां जरुरत इस बात की है कि मजदूरों को न्यूनतम जरुरतों को पूरा करने लायक पैसा मिल सके. हेलमेट से सिर बच सकता है लेकिन जीवन बचाने के लिये तो ठीक-ठीक पैसे की जरुरत होती है.

छत्तीसगढ़ में मजदूरों की हालत को जानना हो तो जरा मैदान के हाल भी देख लिये जायें. छत्तीसगढ़ में श्रमिकों पर होने वाले शोषण की जांच के लिये पूरे राज्य में श्रम निरीक्षकों की संख्या केवल 79 का है. इन्हीं श्रम निरीक्षकों पर श्रम कानूनों को लागू करवाने की जिम्मेदारी है. दूसरे क्षेत्र को छोड़ दें, छत्तीसगढ़ के 20 हजार से भी अधिक कल-कारखानों में मजदूरों की हालत जानने के लिये यह संख्या कितनी नाकाफी है, इसे आसानी से समझा जा सकता है. इसकी हकीकत जाननी हो तो पिछले 10 सालों में श्रम निरीक्षकों द्वारा मजदूरों के शोषण के खिलाफ की गई गंभीर कार्रवाइयों की संख्या देख ली जाये, जो दर्जन भर के आंकड़ों को भी पार नहीं कर पाई हैं.

दूसरी घोषणा के अनुसार प्रतीक्षालय एवं भोजनालय की व्यवस्था वाकई में स्वागत के योग्य है. लेकिन यह स्पष्ट नही किया गया है कि भोजन मुफ्त में मिलेगा या सब्सिडीकृत होगा. वैसे भी रमन सिंह सरकार ने पहली बार सत्ता में आते ही सबसे पहली जो योजना शुरु की थी, वह थी दाल-भात योजना. इस योजना में 5 रुपये में दाल-भात देने का प्रावधान था. लेकिन सरकार की इस योजना में इस तरह का भोजनालय चलाने वालों को दाल देने का कोई प्रावधान ही नहीं था. यही कारण है कि दाल-भात योजना ने साल दो साल के भीतर ही दम तोड़ दिया. ऐसे में मजदूरों के लिये भोजनालय पुरानी बोतल में नई शराब जैसी ही साबित होगी.

श्रम मंत्री की उपस्थिति में हेल्प लाइन की घोषणा अपने आप में छत्तीसगढ़ सरकार के दावों की पोल खोलता है, जहां रोजगार गारंटी योजना और उद्योगों में लाखों लोगों के काम के दावे किये जाते हैं. अगर ऐसा है तो फिर मजदूरों को पलायन की जरुरत क्यों है ? या तो छत्तीसगढ़ में काम नहीं है या फिर काम के बदले ठीक-ठीक मजदूरी नहीं है. ऐसे में इस तरह की हेल्पलाइन की घोषणा पलायन को रोकने के बजाये इसे सुविधाजनक बनाने की तरह ही है. हर दिन हजारों की संख्या में होने वाले पलायन को रोक कर छत्तीसगढ़ सरकार कहीं बेहतर तरीके से मजदूरों की हेल्प कर सकती है. उन्हें हेल्पलाइन से तो राहत नहीं ही मिलेगी.

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