इंद्रावती 65 प्रतिशत कम

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ का वन विभाग कानून के मामले में जंगल राज चला रहा है. मामला इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन का है, जिसका क्षेत्रफल एक तिहाई कर के राज्य सरकार ने केंद्र को भेजने की तैयारी की है. बुधवार को रायपुर में आनन-फानन में वाइल्ड लाइफ बोर्ड की एक बैठक के बाद तय किया गया कि 1540.70 वर्ग किलोमीटर के इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन को 513 वर्ग किलोमीटर कर दिया जाये.

पेसा कानून यानी पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम को किनारे कर के राज्य के वन महकमे ने पहले भी कानून को ताक पर रखा. यहां तक कि बफर ज़ोन के मामले में सुप्रीम कोर्ट तक को गुमराह किया. अब छत्तीसगढ़ सरकार फिर से वही प्रक्रिया अपना रही है. बफर ज़ोन का दायरा क्यों घटाया गया, इसका ठीक-ठीक जवाब भी वन विभाग के अफसरों के पास नहीं है.


सरकार ने इंद्रावती के बफर ज़ोन का दायरा ऐसे वक्त में घटाया है, जब हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बस्तर यात्रा हो चुकी है. माना जा रहा है कि बफर ज़ोन का दायरा घटा कर उसी इलाके में सरकार किसी नये उपक्रम की तैयारी कर रही है. यह उपक्रम कोई प्रशिक्षण केंद्र भी हो सकता है.

बफर जो़न का दायरा कम करने के लिये 23 जनवरी को धीरेंद्र शर्मा की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय कमेटी बनी और इसकी पहली बैठक 14 मार्च को जगदलपुर में हुई. इस बैठक में तय हुआ कि इंद्रावती टाइगर रिजर्व के फिल्ड डायरेक्टर, कलेक्टर बीजापुर और डीएफओ बीजापुर इस मामले का पुनरीक्षण प्रस्ताव ले कर आएंगे लेकिन केवल 10 दिन के भीतर ही अगली बैठक 23 मार्च को रायपुर में हुई और पुनरीक्षण प्रस्ताव पर मुहर भी लग गई.

गौरतलब है कि 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के टाइगर रिजर्व को उनका बफर ज़ोन अधिसूचित करने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को 3 माह के भीतर इसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को भी देने के निर्देश दिये थे. लेकिन छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने 6 मार्च 2009 के छत्तीसगढ़ राजपत्र में प्रकाशित एक ऐसी ग़ैरक़ानूनी अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में पेश कर के छुट्टी पा ली, जिस पर कई सवाल खड़े हो गये.

वन विभाग की इस अधिसूचना के अनुसार इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर इलाके की सीमा उत्तर में इंद्रावती नदी एवं ग्राम जारागुंडम, ग्राम सेंड्रा, ग्राम चेरपल्ली की सीमा होते हुये अलग-अलग कक्ष क्रमांक और इंद्रावती नदी होते हुये कक्ष क्रमांक पी 1321 की सीमा पर खत्म होती है. वहीं पूर्व में कक्ष क्रमांक पी 1321 से शुरु हो कर बेरुदी नदी से नेशनल हाइवे नैमेड़ रोड होते हुये बीजापुर तक यह सीमा बताई गई थी.

दक्षिण में इंद्रावती नदी और तिमेड़ ग्राम, भोपालपटनम, नेशनल हाइवे रोड समेत कई कक्षों को मिलाकर बीजापुर तक बफर ज़ोन की सीमा बताई गई थी. इसी तरह पश्चिम में जारागुंडम से होते हुये इंद्रावती के कई कक्षों को मिलाते हुये मट्टीमारका गांव और इंद्रावती नदी होते हुये ग्राम तीमेड़ तक बफर ज़ोन बताया गया. इस तरह से बफर एरिया का कुल क्षेत्रफल 1540.70 वर्ग किलोमीटर होता है.

ज़ाहिर है, राष्ट्रीय राजमार्ग को बफर ज़ोन में शामिल करके जारी अधिसूचना अपने आप में हास्यास्पद थी. 2006 के बाद से इस इलाके में वनजीवों की कोई गणना नहीं हुई. ऐसे में 2009 में इस इलाके को बफर ज़ोन बताने को लेकर भी कई सवाल थे. छत्तीसगढ़ के ही अचानकमार टाइगर रिजर्व से लगी हुई रतनपुर-पेंड्रा रोड के संरक्षित क्षेत्र में होने के कारण कई सालों से अपूर्ण है. इस सड़क के निर्माण को लेकर केंद्रीय वन मंत्रालय से अनुमति नहीं दी गई है. लेकिन यहां इंद्रावती टाइगर रिजर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग को संरक्षित कौन कहे, बफर ज़ोन में शामिल कर दिया गया.

हद ये है कि सुप्रीम कोर्ट, नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथारिटी और 2006 के वनप्राणी संरक्षण अधिनियम के संशोधन को ताक पर छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन को लेकर जारी इस अधिसूचना से पहले न तो कोई ग्राम सभा की और नियमानुसार न ही विषय विशेषज्ञों की कमेटी बना कर इस इलाके का कोई वैज्ञानिक अध्ययन किया. मतलब साफ है कि बफर ज़ोन को अधिसूचित करने की पूरी प्रक्रिया वन विभाग के अमले ने अपने कमरे में ही कर ली और मनगढ़ंत तरीके से अपनी रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में सौंप दी.

अब एक बार फिर छत्तीसगढ़ वन विभाग के अफसरों ने बंद कमरे में बैठक कर के सब कुछ तय कर लिया और सुप्रीम कोर्ट, नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथारिटी और 2006 के वनप्राणी संरक्षण अधिनियम के संशोधन को दरकिनार कर दिया.

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