जल बचाओ- जग जीतो

डॉ.चन्द्रकुमार जैन
जल है तो जग है. जल है तो जग का जीवन है, सपने हैं, राहें हैं, मंज़िलें हैं, उत्सव है, उमंग है, प्रकृति का यह सारा नृत्य है,तरंग है. लेकिन,अफ़सोस की बात है कि सामाजिक और प्राकृतिक रूप से आज जल संकट एक विकराल रूप धारण कर चुका है. इस संकट के कई रूप और कई आयाम हैं. माना जा रहा है कि यदि जल संकट का यह हाल,बहाल रहा तो कोई भी सरकार अपने नागरिकों को पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री उपलब्ध नहीं करवा पाएगी साथ ही 2025 तक हर तीन में से दो व्यक्ति पानी के संकट से जूझेंगे. जल नहीं होगा तो रह जायेगी सिर्फ जलन, घुटन, तपन और उससे जुड़े अनगिन सवालों का अम्बार. रह जायेगी छटपटाती मानवता बार-बार. जल का विश्व दिवस शायद यही सन्देश लेकर आया है कि जल को लेकर जागना हो जाए तो उसे लेकर भागना न होगा. जल यदि जीवन है तो स्मरण रहे कि जल बचाने में ही जीवन की गरिमा और महिमा है.

सर्वविदित है कि पिछले कुछ दशक के दौरान पेड़ों की कटाई अन्धाधुन्ध हुई. लिहाज़ा, बारिश का पानी सीधे जमीन पर गिरता है और मिट्टी की ऊपरी परत को काटते हुए बह निकलता है. इससे नदियों में मिट्टी अधिक पहुँचने के कारण वे उथली तो हो रही है, साथ ही भूमिगत जल का भण्डार भी प्रभावित हुआ है. इसके विपरीत नलकूप, कुँओं आदि से भूमिगत जल का खींचना बेतरतीब बढ़ा है. कागजों पर आँकड़ों में देखें तो हर जगह पानी दिखता है लेकिन हकीकत में पानी की एक-एक बूँद के लिए लोग पसीना बहा रहे हैं. जहाँ पानी है, वह इस्तेमाल के काबिल नहीं है. आज पानी की दौलत को बढ़ता खतरा, बढ़ती आबादी से कतई नहीं है. दरसल खतरा है आबादी में बढ़ोतरी के साथ बढ़ रहे औद्योगिक प्रदूषण, दैनिक जीवन में बढ़ रहे रसायनों के प्रयोग और मौजूद जल संसाधनों के अनियोजित उपयोग से. यह दुखद है कि जिस जल के बगैर एक दिन भी ज़िंदा रहना मुश्किल है, उसे गन्दा करने में हम और हमारा समाज बड़ा बेरहम है.


इधर एक अच्छी खबर है कि पानी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए फोर्स संस्था विश्व जल दिवस (22 मार्च 2015) के मौके पर एक पदयात्रा का आयोजन कर रही है. यह पदयात्रा सुबह 9:30 बजे नई दिल्ली में राजघाट से शुरू होकर इण्डिया गेट पर 11:30 बजे खत्म होगी. इस यात्रा में केन्द्रीय जल संसाधन और गंगा विकास मन्त्री, दिल्ली के मुख्यमन्त्री सहित कई नामचीन हस्तियों के शामिल होने की उम्मीद है. यह वास्तव में एक अच्छी पहल है.

गौरतलब है कि यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरूस्थल, जैसी विषमताएँ प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों-पिण्डों से पलायन कर गए. उसके पहले का समाज तो हर जल-विपदा का समाधान रखता था. अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आँगन, गाँव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएँ गायब हुए हैं. बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ. हमारा आदि समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था. वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती संरचना, पानी की माँग व आपूर्ति का गणित भी जानता था. उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कण्ठ तर हो जाएगा.

चिंतनीय है कि पानी की कमी के आलावा उसका प्रदूषण लगाता बढ़ता जा रहा है. जल प्रदूषण से सर्वाधिक आहत मनुष्य एवं सूक्ष्मजीव होते हैं. चिकित्सकों के अनुसार याद रहे कि प्रदूषित जल का सेवन करने से हैजा, तपेदिक, पीलिया, अतिसार, मियादी बुखार, टायफाइड, पेचिश, आंत्रशोध, मलेरिया, फाईलेरिया, पोलियो, इंसेफेलाइटिस, डेंगू जैसे घातक रोग न केवल पनपते हैं, बल्कि मृत्यु का कारण भी बनते हैं. ऐस्बेस्ट्स के रेशों से युक्त जल के प्रयोग से फेफड़ों का कैंसर तथा पेट के अनेक रोग उत्पन्न होते हैं.

जल आंदोलन के शिखर पुरुष अनुपम मिश्र ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि हम सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में एक तरह की जलवायु नहीं है. हर साल मौसम बदलता रहता है, जिससे बारिश कहीं ज्यादा तो कहीं कम होती है. हमारे यहाँ मोटे तौर पर जैसलमेर में न्यूनतम वार्षिक औसत 15 सेमी से लेकर मेघालय, जिसका नाम ही मेघों पर है, वहाँ पानी मीटरों में गिरता है. सेंटीमीटर में नहीं! इसमें छत्तीसगढ़ भी आता है, जहाँ 200 से 400 सेमी तक बरसात होती है. ऐसी जगहों पर जल-प्रबन्धन न कोई एक दिन में बन सकने वाली व्यवस्था नहीं है.

सैकड़ों-हजारों सालों से इन सब इलाकों के किसानों ने, वहाँ के लोगों ने, गाँवों ने, शहरों ने, जिनको हम कम पढ़ा-लिखा, अनपढ़ न जाने क्या-क्या कहते हैं, इन सब लोगों ने अंग्रेजों के आने से भी बहुत पहले अपने पानी का इन्तजाम कुछ-न-कुछ सोच लिया था. ‘प्रबन्धन’ तो नया शब्द है.

इसी तरह जल सचेतक कृष्ण गोपाल ‘व्यास’ बताते हैं कि सारी दुनिया में अधिकांश बीमारियाँ अशुद्ध पानी पीने के कारण होती हैं. इस बात को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने पीने के पानी की शुद्धता के मापदण्ड भी तय किए हैं. इन मापदण्डों की कुल संख्या 34 है. उनमें पानी के भौतिक गुण, रासायनिक गुण और बैक्टेरालाजिकल गुण सम्मिलित है. पानी सप्लाई करने वाली संस्था का दायित्व है कि वह उनका सख्ती से पालन करे.

समाज का दायित्व है कि वह दूषित पानी का उपयोग नहीं करे. अनेक बार संस्थाएँ मुख्य रसायनों की जाँच को अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेती हैं जबकि बहुत ही कम मात्रा में मिलने वाले रसायन अधिक गम्भीर बीमारी का सबब् होते हैं. जरूरी है कि पानी की जाँच कराने वाले संस्थानों को पानी के सभी 34 मानकों की पूरी जाँच कराना चाहिए. इस जाँच में एक भी मानक नहीं छूटना चाहिए. जाँच हमेशा विश्वसनीय तथा प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में कराना चाहिए.

अमानक पानी पीने से होने वाली बीमारियों की जानकारी है ? अगर नहीं तो इन बातों पर पल भर के लिए गौर फरमाइए –
1. जब एक लीटर पानी में घुले रसायनों की मात्रा 500 मिलीग्राम से अधिक होती है तो आँतों में जलन पैदा होने लगती है.
2. जब एक लीटर पानी में घुले क्लोराइड की मात्रा 250 मिलीग्राम से अधिक हो जाती है तो पाचन तन्त्र पर बुरा असर पड़ता है. क्लोराइड की अधिकता, हार्ट और गुर्दे के रोगियों के लिये घातक होती है.
3. जब एक लीटर पानी में घुले आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिलीग्राम से अधिक, सीसे की मात्रा 0.001 मिलीग्राम से अधिक, निकिल की मात्रा 0.02 मिलीग्राम से अधिक, सायनाइड की मात्रा 0.05 मिलीग्राम से अधिक, कैडमियम की मात्रा 0.003 मिलीग्राम से अधिक और पारे की मात्रा 0.01 मिलीग्राम से अधिक होती है तो वह पानी जहरीला हो जाता है.
4. जब एक लीटर पानी में घुले सल्फेट की मात्रा 200 मिलीग्राम से अधिक होती है तो उसके सेवन से आँतों में जलन होती है.
5. जब एक लीटर पानी में घुले नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम से अधिक होती है तो उसके सेवन से बच्चों को Methaemoglo and binamia रोग होता है.
6. जब एक लीटर पानी में घुले फ्लोराइड की मात्रा 0.1 मिलीग्राम (अधिकतम 0.015) से अधिक हो जाती है तो प्रभावित व्यक्ति के दाँतों का नष्ट होना और हड्डियों में लाइलाज विकार पैदा होते हैं. अन्ततः प्रभावित व्यक्ति अपंग हो जाता है.
7. जब एक लीटर पानी में घुले एल्यूमीनियम की मात्रा 0.03 मिलीग्राम से अधिक होती है तो मस्तिष्क रोग पैदा होता है.
8. जब एक लीटर पानी में घुले बेरियम की मात्रा 0.07 मिलीग्राम से अधिक हो जाती है तो हार्ट सम्बन्धी विकार पैदा होते हैं.
9. जब एक लीटर पानी में घुले क्रोमियम की मात्रा 0.05 मिलीग्राम से अधिक और ब्रोमोफार्म की मात्रा 0.1 मिलीग्राम से अधिक हो जाती है तो कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

ऊपर दिए गए मानक एक लीटर पानी में रसायन की सुरक्षित मात्रा की औसत स्थिति को दर्शाते हैं. इस सुरक्षित मात्रा का सम्बन्ध इस बात से भी है कि व्यक्ति प्रतिदिन कितना पानी पीता है. अर्थात् प्रतिदिन उसके शरीर में पानी के माध्यम से कितना रसायन पहुँचता है. रसायन की शरीर में पहुँची मात्रा ही शरीर पर अच्छा या बुरा असर डालती है. भोजन, चाय या अन्य तरीकों से भी शरीर को हानिकारक रसायन मिलता है. उस पानी के उपयोग से पैदा की सब्जी और अनाज भी शरीर में रसायनों को बढ़ाते हैं.

यह जानना भी रोचक है कि मेहनत-मजदूरी करने वाले व्यक्ति की पानी की खपत एयरकंडीशन कमरे में बैठकर काम करने वाले की तुलना में अधिक होती है. उसे बोतलबन्द साफ पानी भी नसीब नहीं होता. उसके पास इलाज के लिये धन भी नहीं होता इसलिये जरूरी है कि पानी में मौजूद अशुद्धियों से निजात पाने के लिये मानकों के सत्य को सरल भाषा में समाज तक पहुँचाया जाए. जागरुकता बढ़ाई जाए. शुद्ध पानी की उपलब्धता बढ़ाई जाए और उस पर सबकी पहुँच सुनिश्चित हो.

व्यास जी ठीक कहते है कि पानी के प्रबंध की फिलासफी का अंतिम लक्ष्य जल स्वराज है. जलस्वराज, हकीकत में पानी के प्रबंध की वह आदर्श व्यवस्था है जिसमें हर बसाहट, हर खेत-खलिहान तथा हर जगह जीवन को आधार प्रदान करती पानी की इष्टतम उपलब्धता सुनिश्चित होती है. समाज की अपेक्षा का आईना ही समग्र जल स्वराज है. वही सही जल प्रबंध है. वही जल स्वालम्बन है. वही जल जनित मानवीय विफलताओं को सफलता में बदलने का जरिया, समाज की अपेक्षाओं के अनुरुप रणनीति विकसित करने एवं तदनुरूप योजनाएं जमीन पर उतारने का सशक्त जरिया है.

जल को प्रदूषित होने से बचाना हमारा प्राथमिक ध्येय होना चाहिए, क्योंकि जल स्वयं में अति महत्वपूर्ण तो है ही, इसके अभाव में मनुष्य और वनस्पति जगत् का जीवन भी सुरक्षित नहीं है. अतः बिना किसी प्रतीक्षा के हमें जल को प्रदूषित होने से न केवल बचाना होगा, बल्कि विश्वस्तर पर हमें ऐसे प्रयास करने होंगे जिनसे सभी को लाभ हो सके.जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए कुछ उपाय आवश्यक तौर पर किए जा सकते हैं. जैसे –
1. वाहित मल को स्वच्छ जल में विसर्जित करने से पूर्व उसे उपचारित किया जाना चाहिए. इस कार्य के लिए कैथोड रेट्यू तथा गंदगी का अवशोषण करने वाले उपकरणों का प्रयोग किया जाना चाहिए.
2. उद्योगों के रसायन एवं गंदे अवशिष्टयुक्त जल को नदियों, सागरों, नहरों, झीलो आदि में सीधा न डाला जाए. साथ ही उद्योगों के ऐसे संयंत्र लगाने को कहा जाए, जिनसे वह गंदे जल को स्वच्छ करके ही बाहर निकाले.
3. सड़े-गले पदार्थ व कूड़ा-करकट को स्वच्छ जल के भंडार में विसर्जित नहीं किया जाना चाहिए.
4. शव को जलाने के लिए विद्युत शवदाह गृहों का निर्माण किया जाना चाहिए.
5. औद्योगिक अपशिष्टों के उपचार की व्यवस्था की जानी चाहिए. ऐसा न करने वाली औद्योगिक इकाइयों द्वारा वैधानिक नियमों का कड़ाई से पालन करवाने की योजना होनी चाहिए.
6. समुद्रों में परमाणु विस्फोट को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.
7. स्वच्छ जल के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. जल-प्रदूषण रोकने के लिए सामान्य जनता में जागरुकता और चेतना पैदा की जानी चाहिए. इसमें सभी प्रकार के प्रचार माध्यमों द्वारा जल-संरक्षण के उपायों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए.
8. जल में ऐसे जीव और वनस्पतियां विकसित की जाएं, जो जल को स्वच्छ रखने में सहायक हों.
9. प्रदूषित जल में विषाक्त रसायनों के निष्कर्षण की तकनीक पर बल दिया जाना चाहिए.
10. नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करके जल प्रदूषण के प्रभाव को कम किया जा सकता है.
11. विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल की शुद्धता की रासायनिक जांच समय-समय पर कराते रहना चाहिए.
12. मल विसर्जन से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए ‘सुलभ इंटरनेशनल जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग लेना चाहिए. सुलभ शौचालयों का निर्माण करने से निश्चित ही जल-प्रदूषण की मात्रा में कमी लाई जा सकती है.

इधर एक और अच्छी खबर है कि छत्तीसगढ़ में पानी के उपयोग, प्रबंधन और संरक्षण को लेकर नीति बनाई जाएगी. नीति का निर्धारण आम लोगों के सहयोग से किया जाएगा. नीति निर्धारण करते वक्त पानी के वैज्ञानिक तरीके से उपयोग, पीने का साफ पानी, उद्योगों की जरूरत आदि से लेकर राज्य में प्रचलित पारंपरिक संरक्षण के उपायों को भी इसमें शामिल किया जाएगा. यह फैसला छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग और कंजर्वेशन कोर सोसाइटी की ओर से हुई परिचर्चा जल संवाद के बाद किया गया.

छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री सुनील कुमार के अनुसार प्रदेश में हालांकि पर्याप्त मात्रा में पानी है, लेकिन इसका संतुलित और संयमित उपयोग नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी के लिए पानी बचा पाना कठिन हो जाएगा. इस लिहाज से प्रदेश में एक जल नीति तैयार की जाएगी. नीति तैयार करने से पहले हर तबके के लोगों से चर्चा होगी. वैज्ञानिक उपायों से लेकर पारंपरिक ज्ञान को नीति में शामिल किया जाएगा.

महसूस किया गया ही कि वहीं प्रदेशभर में बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए जमीनी स्तर पर प्रयास की जरूरत है. इसके लिए स्वयं सहायता समूहों, गैर-सरकारी संगठनों और मीडिया के सहयोग से जन जागरुकता फैलाने की जरूरत है, ताकि आम लोग पानी के संरक्षण के उपायों को समझ सकें और उससे जुड़ सकें. सूबे में पानी के प्रबंधन, गुणवत्ता, जैव विविधता, इकोलॉजी आदि पर शोध के लिए बिलासपुर के केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोध कराया जाएगा. इसके लिए राज्य सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालय का सहयोग करेगी. यहां होने वाले शोध का फायदा प्रदेश को मिलेगा.

इतना ही नहीं, राज्य सरकार जल्द ही पीने का पानी या जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वालों को सम्मानित करेगी. इसके लिए ग्राम पंचायत और शहर स्तर पर अलग-अलग पुरस्कारों की घोषणा होगी. इसके लिए जल्द ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा नगरीय प्रशासन विभाग की ओर से निर्देश जारी किए जाएंगे.

बहरहाल,अंग्रेजों के भारत पर कब्जा करने के पहले इसी मॉडल ने भारत में जल स्वराज की इबारत लिखी थी. वही इबारत, आज भी समाज, धरती की सहमति, भारतीय जलवायु और भूगोल से तालमेल तथा सहयोग से लिखी जा सकती है. अवधारणा को पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है. इसलिए कहा जा सकता है कि भारत में जल स्वराज मुमकिन है.
जल बचाकर हम जग जीत सकते हैं, वह नहीं बचा तो आप ही बताएं क्या हम जी भी सकेंगे ?

(लेखक, शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर
महाविद्यालय, राजनांदगांव छग में प्रोफ़ेसर हैं.
संपर्क – मो.9301054300)

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