आवारा है, पत्रकार बना लो

शैलेंद्र ठाकुर 
मैंने पत्रकारिता की शुरुआत वर्ष 2002 में दंतेवाडा से ही की. बगैर किसी अनुभव के सीधे ‘नवभारत’ में सिटी रिपोर्टर की नौकरी मिल गई. 12 सौ रुपए मासिक मानदेय से शुरुआत हुई थी. 2 साल दंतेवाडा में काम करने के बाद ‘नवभारत’ के जगदलपुर संभागीय कार्यालय में 5 साल काम करने का मौका मिला. इसके बाद दंतेवाडा कार्यालय में बतौर जिला प्रतिनिधि वापसी हुई. तब तक मेरा वेतन महज 3800 रुपये तक पहुँच सका था. न विज्ञापन का कमीशन, न कोई साइड बिजनेस. ऐसे में घर चलाना काफी मुश्किल था, सो ‘दैनिक भास्कर’ में लगभग दोगुने वेतन का पैकेज मिला तो मैंने इस बार देर नहीं की.

दंतेवाडा जैसी जगह पर पत्रकारिता करना काफी मुश्किल भरा काम है. अगर आपका साइड बिजनेस न हो तो परिवार का गुजारा भी नहीं चल सकता. किसी भी अखबार की प्रतियाँ चलाने वाला एजेंट ही आम तौर पर रिपोर्टर की भूमिका निभा रहा है. दैनिक भास्कर. नवभारत, नईदुनिया, पत्रिका जैसे कुछ गिने चुने अख़बारों को छोड़ कर दूसरे कोई भी अखबार या इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने रिपोर्टर को वेतन नहीं देते हैं. केवल बैनर का इस्तेमाल करने की आजादी मिल जाती है.


इलेक्ट्रानिक मीडिया में हों तो माइक की आईडी और कार्ड, प्रिंट मीडिया हो तो परिचय पत्र. इससे ज्यादा कुछ नहीं. अधिकांश बेचारों को तो समाचार कवरेज के लिए मेहनताना तक नहीं मिलता. विज्ञापन पर मिलने वाले कमीशन या अफसरों से संबंधों के आधार पर चलाये जाने वाले साइड बिजनेस से काम चलाना पड़ता है. जब कोई हादसा हो जाए तो कम्पनी उसे अपना प्रतिनिधि तक मानने से इनकार कर देती है. जबकि नक्सली वारदातों की कवरेज के दौरान क्रॉस फायरिंग का खतरा तो होता ही है, क्योंकि गोलियां इन्सान को नही पहचानती. कभी-कभी साथियों की मौत से गुस्साए जवानों के आक्रोश का सामना भी मीडियाकर्मी को करना पड़ता है.

एक साल के भीतर तोंगपाल निवासी नेमीचन्द जैन और बासागुडा निवासी पत्रकार साईं रेड्डी की हत्या नक्सलियों ने की है. ऐसे में पत्रकारों का मनोबल गिरा हुआ है.क्योंकि संवेदनशील इलाकों में भी बेधड़क कवरेज करने वाले पत्रकार अब तक ये मानते आ रहे थे कि कम से कम नक्सलियों से तो उन्हें खतरा नहीं है.

जनसंपर्क विभाग ने पत्रकारों के बीमा के लिए जो शर्त रखी है, उसमे केवल वेतनभोगी पत्रकार ही आवेदन कर पायेंगे. ऐसे में फायदा कितनो को मिल पायेगा, आप अंदाजा लगा सकते हैं.

दक्षिण बस्तर, खासकर दंतेवाडा जिले में पत्रकारिता की राह इसलिए भी मुश्किल भरी हो जाती है, क्योंकि यहाँ आने वाले प्रशासनिक अफसरों का रवैया भिजतील होता है. अकसर अकादमी से पास आउट नए-नए अफसरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंप दी जाती है, जो केवल पढ़ी-पढाई थ्योरी के आधार पर काम करने की कोशिश करते हैं. पूर्वाग्रह के चलते और व्यवहारिक ज्ञान की कमी से सभी मीडियाकर्मियों को एक लाठी से हांकने की कोशिश में रहते है. इसका नतीजा यह होता है कि अधिकतर समय मीडिया और प्रशासन के बीच संवादहीनता की स्थिति बनी रहती है.

पत्रकारों के संघ-संगठन भी केवल चुनाव के वक्त सभी के हित की बात करने की कसमें तो खाते हैं, लेकिन जब किसी एक पर बन आती है, तो सब अलग-थलग पड़ जाते हैं. इसका फायदा उठाकर अफसर तुष्टीकरण की नीति अपनाने लगते हैं. किसी एक को प्रताड़ित करना हो तो उसके विज्ञापन रोक दिए जाते हैं. ऐसे में मैनेजमेंट और एडिटोरियल का जिम्मा एक ही व्यक्ति पर हो तो समाचार की गुणवत्ता प्रभावित होना लाजिमी है.

दुःख की बात यह है कि मीडिया के क्षेत्र में शिक्षा को यहाँ कोई तवज्जो नहीं मिलती. जब से एजेंट कम संवाददाता/ब्यूरो चीफ का चलन बढ़ा है, तब से हालात और भी बिगड़े हैं. चैनलों और साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ आने के बाद से कोई भी व्यक्ति आपके सामने खींसे निपोरकर खड़ा हो सकता है. अब तो एक भ्रष्ट सिपाही या बाबू भी किसी पत्रकार से यार-दोस्त जैसा सलूक करता है. आखिर इस पेशे का अवमूल्यन कैसे हुआ, इसकी चिंता किसी को नहीं है. कुछ पालक अक्सर यह भी कहते हुए मिल जाते है, हमारा बेटा कुछ करता-वरता नहीं है, आवारागर्दी करता रहता है. इसे भी अपने साथ पत्रकार बना लो. यह स्थिति केवल दंतेवाडा ही नहीं पूरे राज्य में है.

* रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ और कश्मीर में पत्रकार सरकारी और ग़ैर-सरकारी दोनों तत्वों के निशाने पर रहे. हमने छत्तीसगढ़ में पत्रकार और पत्रकारिता को लेकर पत्रकारों से ही उनकी राय ली.

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