कमल विहार पर बैकफुट में सरकार

रायपुर | संवाददाता: रायपुर के कमल विहार में छत्तीसगढ़ सरकार बैकफुट पर है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर जिस तरह से सवाल खड़े किये हैं, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि परियोजनाओं को पूरा करने में अफसरशाही किस तरह नियम कानून को ताक पर रख कर चल रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कमल विहार पर जो झटका दिया है, उससे उबरने की कोशिश में लगे अफसरों का कहना है कि वो अपील में जाएंगे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सवालों का जवाब आसान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को उनकी ज़मीन लौटाने का आदेश दिया है.

जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 6 सवालों पर पूरे मुद्दे को केंद्रीत किया है. क्या कमल विहार स्कीम के अंतर्गत, आरडीए को टाउन डेवलपमेंट स्कीम बनाने का अधिकार है और क्या स्कीम संविधान के 73RD और 74TH संशोधन के उल्लंघन में बनाई गयी है? क्या स्कीम नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 के प्रावधानों के अनुसार निर्मित है? क्या आरडीये द्वारा निर्मित स्कीम जोनल प्लान के आभाव में भी वैद्य है? क्या 1973 का अधिनियम आरडीये को भूमि पट्टों के पुनर्गठन अवं भूमि उपयोग को परिवर्तित करने के लिए अधिकृत करता है? क्या आरडीए द्वारा आदिग्रहित भूमि पट्टों का भूस्वामियों को ३५% लौटने का निर्णय वैधानिक है? और क्या शाशन द्वारा योजना की प्लानिंग में पर्यावरण से जुडी अनुमतियाँ सक्षम प्राधिकरण से प्राप्त की गयी?

अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि आरडीए के सीईओ को एक पक्षीय रूप से विकास योजना बनाने का कोई अधिकार नहीं है एवं आरडीए को लोकतान्त्रिक संस्थाएं जैसे डिस्ट्रिक्ट प्लानिंग समिति से राय लेनी चाहिए थी, जो कमल विहार के मामले में नहीं ली गई. अदालत ने आरडीए द्वारा मास्टर प्लान में किये हुए बदलावों को भी अमान्य करते हुए उसे अधिनियम की धारा 14 एवं 17 का उल्लंघन घोषित किया है.

अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के निदेशक द्वारा विकास योजना को कमल विहार योजना के लिए बदल दिया गया एवं निदेशक का यह कृत्य अनुचित एवं गैरकानूनी है. इसके अलावा योजना के अनुमोदन प्रक्रिया एवं योजना के 1900 एकड़ के अतिरिक्त विस्तार को भी अवैधानिक करार दिया गया है, जिसका आधार एस एस बजाज का पहले आरडीए के सीईओ होकर योजना बनाना एवं बाद में योजना के अनुमोदन के समय विशेष सचिव, हाउसिंग एवं पर्यावरण विभाग बन योजना को अनुमोदित करना बताया गया है.

अदालत ने कहा कि नया रायपुर योजना के होते हुए यह ज़रूरी था कि सरकार कोई सर्वे करवा कर यह पता करती कि कमल विहार योजना की ज़रूरत क्या है ? अदालत ने कहा कि योजना को पहले 900 एकड़ फिर 1100 एकड़ फिर 394 एकड़ और फिर 2300 एकड़ में बिना किसी कारण बताये, समय समय पर बदल दिया गया जिससे यह मामला सरकार द्वारा “नॉन एप्लीकेशन ऑफ़ माइंड” का बनता है.

आरडीए के इस तर्क कि कमल विहार योजना से अवैध प्लॉटिंग पर लगाम लगेगी को भी ख़ारिज करते हुए यह निर्णय दिया गया कि अवैध प्लॉटिंग को रोकने के बहाने आरडीए लोगों की ज़मीन अनिवार्य रूप से अधिग्रहित नहीं कर सकती. कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिनियम के अंतर्गत, आरडीए को केवल “हाउसिंग” सुविधा उपलब्ध करने की शक्ति है एवं प्लॉटिंग की नहीं.

इस आदेश में आरडीए द्वारा टाउन डेवलपमेंट स्कीम को बिना जोनल प्लान के लागु करने को अवैधानिक करार देते हुए कहा गया है कि आरडीए स्कीम को लागु करने के नाम पर भूमि उपयोग में बदलाव नहीं कर सकती. न्यायालय ने आपत्तियों के निराकरण एवं सुनवाई के लिए आरडीए द्वारा गठित समिति को भी कानून का उल्लंघन करार दिया है एवं छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा इस समिति पर आये निर्णय को त्रुटिपूर्ण कहा है.

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि अधिनियम के द्वारा आरडीए को भूमि को पुनर्गठित करने का अधिकार प्राप्त नहीं है. आरडीए स्कीम द्वारा केवल बिल्डिंग, रोड एवं नागरिक सुविधाओं को मुहैय्या करा सकती है पर हाउसिंग स्कीम नहीं लागु कर सकती. इसी तरह महाराष्ट्र एवं गुजरात में “टाउन प्लानिंग अफसर” का पद विशेष रूप से निर्मित किया गया है परन्तु छत्तीसगढ़ में ये किये बिना आरडीए द्वारा ही ये सारे कार्य किये जा रहे हैं.

अदालती आदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि 1973 के अधिनियम में संशोधन के बिना स्कीम के अंतर्गत भूखंडों का पुनर्गठन अवैध है. अदालत के आदेश में समिति द्वारा आपत्तियों को बिना कारण दिए ख़ारिज करने की वजह से प्रक्रिया को अवैधानिक करार दिया है.

इसके अलावा आदेश में योजना के अंतर्गत भूमिस्वमियों को मात्र 35 % भूखंडों के लौटने को असंवैधानिक करार दिया गया है. कोर्ट द्वारा यह भी सुझाया गया है कि अगर आरडीए द्वारा पुनर्गठित भूखंडों का हिस्सा मात्र ही लौटाया जा रहा है तो बाकि हिस्से के लिए भूस्वामी मुआवजे का हक़दार होगा. आरडीए द्वारा 35 % भूखंड लौटने का निर्णय भी आधारहीन है क्योंकि इस आकलन का कोई आधार आरडीए द्वारा नहीं बताया गया है.

आरडीये द्वारा पर्यावरण अनुमति के दावे को भी ख़ारिज करते हुए न्यायालय ने आदेश दिया है कि आरडीए ने पर्यावरण अनुमति प्राप्त करने के बाद भी स्कीम में बदलाव किये हैं, जिससे यह अनुमति स्वतः रद्द हो गयी थी. ऐसे में योजना को लागु करने के लिये पर्यावरण अनुमति फिर से लिया जाना अनिवार्य था.

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