कंगाली में दम तोड़ा, छत्तीसगढ़ की लता ने

कोरबा | अब्दुल असलम: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने वाली लोक कलाकार किस्मत बाई देवार मौत से जंग हर चुकी है. छत्तीसगढ़ की लता मंगेशकर कहलाने वाली लोक कलाकार किस्मत बाई देवार का निधन बुधवार को हो गया. पिछले कुछ दिनों से कोरबा के जिला अस्पताल उपचार चल रहा था. लंबे समय से अस्वस्थ्य चल रही किस्मत बाई की शासन प्रशासन ने सुध तक नही ली. उल्लेखनीय है कि 70-80 के दशक में उनके गाए गीत ‘चौरा में गोंदा रसिया मोर बारी मा पताल रे’ को लोग आज भी नहीं भूले हैं. जब ये गीत रेडियो पर प्रसारित होता, तो लोग झूमने लगते थे.

वो छत्तीसगढ़ी गीत है जिसने किस्मत बाई की किस्मत बदल दी
चौरा मा गोंदा


चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

चौरा मा गोंदा~~~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

लाली गुलाली रंग छिचत अईबे
राजा मोर छिचत अईबे
लाली गुलाली रंग छिचत अईबे
राजा मोर छिचत अईबे
छिचत अईबे रसिया
मै रैइथव छेव पारा म पूछत अईबे
पूछत अईबे रसिया
मै रैइथव छेव पारा म पूछत अईबे
चौरा मा गोंदा~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

परछी दुवारी म ठारेच रइहव
जोड़ी मोर ठारेच रइहव
परछी दुवारी म ठारेच रइहव
जोड़ी मोर ठारेच रइहव
ठारेच रैइहव रसिया
मन मा घलो मा
दिया ल बरेच रइहव
बरेच रइहव रसिया
मन मा घलो मा
दिया ल बरेच रइहव
चौरा मा गोंदा~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा

गली मा आँखी ल बिछाए रइहव
धनी मोर बिछाए रइहव
गली मा आँखी ल बिछाए रइहव
धनी मोर बिछाए रइहव
बिछाए रइहव रसिया
आके म नई लेबे रे रिसाये रइहव
रिसाये रइहव रसिया
आके म नई लेबे रे रिसाये रइहव
चौरा मा गोंदा~
चौरा मा गोंदा रसिया
मोर बारी म पताल रे
चौरा मा गोंदा
चौरा मा गोंदा
चौरा मा गोंदा

70 वर्षीय किस्मत बाई मूलत: सिकोलाभाठा दुर्ग निवासी थी लेकिन पिछले कुछ वर्षो से वह कोरबा के काशीनगर में अपने बेटी-दामाद जिया रानी के घर रहती थी. किस्मत बाई के चार बेटियां है जो छत्तीसगढ़ी लोक गीत को आगे बढ़ा रही हैं. छत्तीसगढ़ की मशहूर लोक गायिका किस्मत बाई देवार इलाज के अभाव मे जिंदगी और मौत जूझते हुए बुधवार को अंतिम सांस ली.

छत्तीसगढ़ की लता मंगेशकर किस्मत बाई दुनिया से रुखसत हो गई स्वास्थ्य बिगड़ने पर लोक कलाकार संघ ने परिजनों के साथ किस्मत बाई को जिला अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराया. उन्हे लकवा के साथ दूसरी अन्य गंभीर बीमारियों ने घेर लिया था.

किस्मत बाई ने आठ वर्ष की उम्र से ही गीत-संगीत और कलाकारी से नाता जोड़ लिया था. उनकी गुरु बरतनीन बाई रहीं. बाद में उन्होंने आदर्श देवार पार्टी नाम से मंडली बनाकर कार्यक्रम देना शुरू किया था. उन्होंने रायगढ़, बिलासपुर, कांकेर, संबलपुर समेत प्रदेश के कई स्थानों पर कार्यक्रम दिया. जानकारों का कहना है कि किस्मत बाई की गायिकी ने सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश में भी धूम मचाई थी.

किस्मत परंपरागत शैली में करमा, ददरिया, झूमर को बहुत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती रही हैं. छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक रंगमंच कलाकार हबीब तनवीर के साथ उन्होंने ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘चरनदास चोर’, ‘मोर नाव दामाद’ और ‘गांव के नाम ससुराल’ में भी काम किया था. किस्मत बाई अपने जमाने की बेहतरीन नर्तकी भी रही हैं. गायन को पुश्तैनी पेशा मानने वाली अंचल की वरिष्ठ लोक गायिका के गाए गीत काफी लोकप्रिय हुए.

आकाशवाणी रायपुर से उनके गीतों का प्रसारण सुनने श्रोताओं का एक बड़ा वर्ग उत्साहित रहता. उनके गाए गीत ‘चौरा में गोंदा रसिया मोर बारी मा पाताल रे चौरा मा गोंदा’ को लोग आज भी नहीं भूले. साथ ही ‘चल संगी जुर मिल कमाबो रे..’ और ‘करमा सुने ला चले आबे गा करमा तहूं ला मिला लेबो’, ‘मैना बोले सुवाना के साथ मैना बोले..’ को श्रोताओं ने काफी पसंद किया है.

प्रचलित कहावत है- कलाकार सदा भूखा ही सोता है, अमूमन कला गरीबी में जन्म लेती है, मुफलिसी में पलती है, और कंगाली में जन्म तोड़ देती है. छत्तीसगढ़ की लाता मंगेशकर किस्मत बाई की भी किस्मत कंगाली में दम तोड़ दी है. बड़ा सवाल क्या ऐसे में छत्तीसगढ़ी संस्कृति और लोक कला जीवित रहेगी ?

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