छग में फेल ‘मेक इन इंडिया’ का शेर

रायपुर | बीबीसी: छत्तीसगढ़ में मेक इन इंडिया का हाल-बेहाल है कम से कम पिछले 10 सालों का अनुभव इसी ओर इशारा करता है. वो गर्मियों के दिन थे. तारीख थी 4 जून 2005. तब से लेकर अब तक के 10 सालों की जो कहानी मैं बता रहा हूँ, उससे आपको भारत में कृषि की ज़मीन लेकर उद्योग लगाने की जटिल प्रक्रिया की एक मिसाल तो मिल ही जाएगी.

ख़ैर, 10 साल पहले, जून के उस दिन, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में केवल एक ही चर्चा थी- बस्तर में टाटा कंपनी का स्टील प्लांट.

राज्य बनने के बाद देश की किसी नामी-गिरामी कंपनी के साथ पहली बार छत्तीसगढ़ सरकार क़रार पर हस्ताक्षर कर रही थी.

उस उमस भरे दिन में तय हुआ कि टाटा बस्तर में स्टील का कारखाना लगाएगी.

टाटा स्टील और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच हुए इस समझौते की बात महीनों तक बनी रही.

बहरहाल अगले कुछ महीनों के भीतर टाटा स्टील ने बस्तर में अपना कामकाज शुरू किया.

लेकिन थोड़े दिनों बाद टाटा स्टील ने कुछ और गांवों लोहंडीगुड़ा और तोकापाल के 10 गांवों में स्टील प्लांट लगाने के लिए सरकार से ज़मीन आवंटन की मांग की थी.

इस बार ज़मीन का क्षेत्रफल भी दोगुने से ज्यादा हो गया था.

इन सब बातों और आंकड़ों के बीच सरकार और टाटा स्टील के अफसर बदलते रहे, कैलेंडर भी. गर्मियों के मौसम आते-जाते रहे.

अब आप पूछेंगे कि इन 10 सालों में फिर आगे क्या हुआ ?

छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एमओयू के बाद टाटा स्टील ने कुछ ही महीनों के भीतर ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की.

जिस ज़मीन को टाटा स्टील के लिए चुना गया, उसमें बड़ा हिस्सा किसान आदिवासियों की ज़मीन थी.

यहां कानून के हिसाब से ग्राम सभा की अनुमति के बिना किसी भी ज़मीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता.

10 मई 2006 से कई ग्राम सभाओं का आयोजन हो चुका है.

तारीखें कई हैं. लेकिन कोई भी ग्राम सभा सफल नहीं हो पाई.

लोहंडीगुड़ा से लेकर जगदलपुर तक ग्राम सभाएं और जन सुनवाइयों और उनके विरोध का दौर चलता रहा.

इस बीच कुछ आदिवासियों ने ज़मीन देना स्वीकार भी कर लिया.

टाटा संयंत्र के एक अधिकारी का दावा है कि अधिग्रहण के एवज में इन दस गांवों के 1707 खातेदारों में से 1165 खातेदारों को मुआवज़ा भी बांटा जा चुका है.

लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि सरकारी अफसरों ने ज़मीनों के बदले दूसरे लोगों को खड़ा किया, क़ागजात में हेरफेर हुई और फिर दूसरे लोगों को ही मुआवज़ा भी बांट दिया.

आदिवासियों के बीच काम करने वाले ट्राइबल वेलफेयर सोसायटी के प्रवीण पटेल कहते हैं, “बस्तर का जो मिजाज है, उसे टाटा स्टील और सरकार समझ नहीं पाई.”

बस्तर में टाटा स्टील प्लांट शुरू करने की कौन कहे, उसे आज तक वह ज़मीन ही नहीं मिल पाई, जहां ठीक-ठीक तरीके से टाटा स्टील का बोर्ड भी लगाया जा सके.

मुआवजे के अलावा दूसरे कामकाज में भी टाटा स्टील ने कोई 70 करोड़ रुपये से भी अधिक रक़म खर्च कर दी.

लेकिन सवा सौ करोड़ रुपये से अधिक की रक़म खर्च कर के भी टाटा के हिस्से धेला नहीं आया.

टाकरागुड़ा के सरपंच रहे हिड़मूराम मंडावी का मानना है कि खेती की ज़मीन गई तो वे नौकर बन जाएंगे.

वहीं बड़ांजी के मधुसूदन का तर्क है कि टाटा स्टील के लिए सरकार बस्तर की बंजर पड़ी ज़मीन ले ले.

छत्तीसगढ़ में एक उद्योग संघ के अध्यक्ष हरीश केडिया का आरोप है कि टाटा स्टील ने ज़मीन के चयन में ही सूझबूझ का परिचय नहीं दिया.

वे कहते हैं, “अभी तो 2015 है, 2035 भी हो जाए तो भी टाटा का स्टील प्लांट वहां नहीं शुरू हो सकेगा. बस्तर में आदिवासियों की ज़मीन लेना लगभग असंभव है.”

हरीश केडिया का दावा है कि पहले तो गांव के लोग उद्योग के लिए बुलाते हैं और जैसे ही उद्योगपति वहां अपनी योजना लेकर पहुंचता है, गांव का एक वर्ग उसका विरोध करना शुरू कर देता है.

केडिया कहते हैं, “अधिकांश मामलों में ये विरोध केवल इसलिए होता है कि गांव के उस खास वर्ग को अतिरिक्त पैसे मिलें, चंदा मिले और उद्योग के निर्माण में उन्हें ठेका मिले. छोटे-छोटे समूह ऐसे-ऐसे अड़ंगे डालते हैं कि उद्योगपति को पसीना आ जाए.”

हरीश केडिया का आरोप है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अफ़सरशाही इतनी हावी है कि उद्योगपति को अपने जायज़ काम के लिए भी उनके इतने चक्कर लगाने पड़ते हैं कि उद्योगपति तो एक बार के लिए राज्य में उद्योग लगाने से ही तौबा कर ले.

हरीश केडिया की बात से अगर टाटा स्टील सहमत होगी तो सहमति वालों की सूची में एस्सार स्टील का भी नाम जुड़ना चाहिए.

अब कहेंगे कि एस्सार स्टील का ज़िक्र क्यों ?

टाटा स्टील ने छत्तीसगढ़ सरकार से जब क़रार किया था, उससे कोई महीने भर बाद 5 जुलाई 2005 को एस्सार स्टील ने भी बस्तर के ही धुरली-भांसी में स्टील प्लांट लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किया था.

आंकड़े, जगह का नाम, प्रतिक्रिया और तारीखें भर बदल दें, एस्सार का भी वही हाल हुआ, जो टाटा स्टील का. इन सारी कहानियों में माओवादियों के विरोध को भी जोड़ सकते हैं.

दोनों ही कंपनियों के अधिकारी ऑन द रिकॉर्ड कुछ भी नहीं कहना चाहते. हमने दोनों ही कंपनियों से कई-कई बार संपर्क किया, लेकिन हमारे सवालों का जवाब नहीं दिया गया.

टाटा के एक अधिकारी नाम का उल्लेख न किए जाने की शर्त पर कहते हैं, “मामला कोर्ट में है, ऐसे में कौन बोलेगा? वैसे भी देख ही रहे हैं, बस्तर कितना गरम है.”

ज़मीन अधिग्रहण की मुश्किल नए उद्योगों के लिए और सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ के मंसूबों के लिए अच्छी ख़बर नहीं मानी जाएगी.


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