छत्तीसगढ़ से पलायन, क्योंकि मजदूरी कम

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में मनरेगा की मजदूरी देश में सबसे कम मात्र 159 रुपया प्रतिदिन है. यह एक प्रमुख कारण है कि छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में गांव वाले पलायन कर देश के दिगर राज्यों में चले जाते हैं. सरकारी आकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ से सबसे ज्यादा पलायन जांजगीर-चांपा तथा बलौदाबाजार जिलों से होता है. जब सरकार ही मजदूरी कम देगी तो निजी ठेकेदार उससे ज्यादा क्यों देने लगे.

श्रम बाजार में हस्तक्षेप करने के लिये सरकार खुद मजदरी बढ़ाने के लिये पहलकदमी करे तभी जाकर मजदूरों का पलायन रुकेगा. एक और कारण है कि मनरेगा का भुगतान देर से किया जाता है.


जांजगीर-चांपा से पलायन का एक बड़ा कारण वहां के नदियों के पानी को पॉवर उद्योगों को दिया जाना भी है. इससे पहले जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़ का सबसे सिंचित जिला माना जाता था. जाहिर है कि उद्योगों ने वहां के गांव वालों को किसानी से बेदखल करके मजदूरी करने कि लिये मजबूर कर दिया. जाहिर है कि जब मजदूरी करेंगे तो उस स्थान की ओर पलायन कर जायेंगे जहां ज्यादा मेहताना मिलता मिलता है चाहे वो निजी ठेकेदार या ईंट भट्टे के मालिक ही क्यों न हो. यह अर्थशास्त्र का सामान्य सा नियम है. इस चक्कर में वे दलालों के हाथों में फंसकर निजी ठेकेदारों के यहां काम करने लगते है जहां कई बार उन्हें बंधक बना लिया जाता है.

छत्तीसगढ़ सरकार के आकड़ें बताते हैं कि जिला जांजगीर-चांपा से पिछले तीन सालों में क्रमशः 7278, 6505 तथा 5185 मजदूरों ने पलायन किया. यह सरकारी आकड़ा है तथा इनमें उन्ही मजदूरों का नाम शामिल है जो रजिस्टर्ड ठेकेदारों के माध्यम से जाते हैं. इसी तरह से बलौदाबाजार से 4132, 6336 तथा 5950 मजदूरों ने पलायन किया. राजनांदगांव से 3834-2499-4327, कबीरधाम से 3773-4474-3022, महासमुंद से 2575-7927-3944 मजदूरों ने पलायन किया.

सरकारी आकड़ों की सच्चाई परखने के लिये बिलासपुर के आकड़ें पर्याप्त हैं. बिलासपुर में पिछले तीन सालों में क्रमशः 767-813-538 मजदूरों ने पलायन किया. जबकि पलायन के समय यदि कोई बिलासपुर के रेलवे स्टेशन तथा बस स्टैंड में दिन के 10 घंटे भी बैठ जाये तो पायेगा कि इतनी संख्या में मजदूर तो रोज पलायन करते हैं. जाहिर है कि पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या सरकारी आकड़ों से कई-कई गुना ज्यादा है.

खुद सरकारी आकड़ों के अनुसार साल 2013-14 में 23,420 मजदूरों ने, साल 2014-15 में 31,902 मजदूरों ने तथा साल 2015-16 में फरवरी माह तक 25,096 मजदूरों ने पलायन किया.

इन आकड़ों पर तब विश्वास करने का मन नहीं करता जब यह बताता है कि राजधानी रायपुर से पिछले तीन सालों में किसी भी मजदूर ने पलायन नहीं किया है.

अब हम मुख्य मुद्दे पर आते हैं. यूपीए सरकार के समय से गांव वालों को गांवों में ही रोजगार मुहैया करवाने के लिये केन्द्र सरकार ने मनरेगा की शुरुआत की. जिसमें गांव वालों को रोजगार के साथ-साथ वहां का विकास का कार्य भी उन्हीं से करवाया जाता है. इस तरह से रोजगार तथा विकास की अवधारणा पर मनरेगा आधारित है. लेकिन जब इसे छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो पाते हैं कि यहां पर देशभर में सबसे कम मजदूरी मनरेगा के द्वारा दी जाती है. छत्तीसगढ़ ही नहीं मध्यप्रदेश में भी इतनी ही मजदूरी मनरेगा के तहत दी जाती है.

जबकि आंध्रप्रदेश में मनरेगा की प्रतिदिन की मजदूरी 180 रुपये, गुजरात में 178 रुपये, हरियाणआ में 251 रुपये, जम्मू-कशमीर में 164 रुपये, कर्नाटक में 204 रुपये, केरल में 229 रुपये, पंजाब में 201 रुपये, तेलंगाना में 180 रुपये तथा तमिलनाडु में 183 रुपये प्रतिदिन है.

मजदूरी की यह दर केन्द्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 31 अप्रैल 2015 को तय की है.

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