छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के माओवाद में फर्क

रायपुर | जेके कर: छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के माओवाद में जमीन आसमान का फर्क है. जहां नेपाल के माओवादियों ने नये संविधान सभा में भाग लेकर देश के लिये बने संविधान में अपनी हिस्सेदारी दर्ज करवाई है वहीं दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी हत्याकांड के मुख्य आरोपी सोनधर मलकानगिरी में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गये हैं. एक तरफ नेपाल के माओवादी नये नेपाल के निर्माण में शामिल हैं वहीं छत्तीसगढ़ के माओवादी जंगलों में कथित जन-अदालत लगाकर अपनी हत्यारी मुहिम को सामाजिक स्वीकृति बतलाने का प्रयत्न कर रहे हैं.

यहां पर इस बात का उल्लेख करना गलत न होगा कि नेपाल के माओवादियों ने भारत के माओवादियों से पूर्व में ही अपील की थी कि सशस्त्र मार्ग छोड़कर संसदीय राजनीति का मार्ग अपना ले.

यदि छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के माओवादियों के बीच के फर्क को बिना किसी पूर्वाग्रह के कहना है तो कहा जा सकता है कि नेपाल के माओवाद को शहरों तथा गांवों में जनता का समर्थन प्राप्त है. इसे उन्होंने 2008 के चुनाव में साबित भी कर दिया था. यह दिगर बात है कि वे अपना शासन न चला सके. इसके बाद नवंबर 2013 में संविधान सभा के लिये हुये चुनाव में नेपाली माओवादियों को मुंह की खानी पड़ी परन्तु उसके बाद भी तमाम असहमतियों के बावजूद उन्होंने नये संविधान को बनाने में अपनी भागीदारी दर्ज करवाई.

नेपाल के 2008 के प्रत्यक्ष चुनाव में ‘एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी’ को 240 में से 120 सीटे मिली थी तथा वे सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरे थे. 2013 के चुनाव में उन्हें मात्र 26 सीटें मिली तथा वे तीसरे स्थान पर रहे.

नेपाल में 10 वर्षों तक चले सशस्त्र संघर्ष और 19 दिनों तक चले जनआंदोलन के बाद साल 2006 में माओवादियों और गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व वाली सरकार के बीच हुए समझौते के बाद तेज घटनाक्रमों की परिणति 240 साल पुराने राजतंत्र की समाप्ति और गणराज्य की स्थापना के रूप में हुई थी.

इसके ठीक उलट छत्तीसगढ़ का माओवाद केवल वनांचल में बंदूके लेकर तथा सड़कों पर एंबुश लगाकर सामज में तथाकथित बगलाव लाना चाहता है. उसका मानना है कि जनता समाज में बदलाव के लिये तैयार खड़ी है जिसके हाथ में केवल बंदूक थमा देने की जरूरत है. जबकि वास्तविकता यह है कि जनता महंगाई के खिलाफ रैलियों तक में जाने से कतराती है.

नेपाल के संविधान की प्रस्तावना में बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली, नागरिक आजादी, मानवाधिकार, मत देने का अधिकार, प्रेस की आजादी, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका और कानून आधारित समाजवाद की बुनियाद पर एक खुशहाल राष्ट्र के निर्माण की बात कही गई है.

देश के कार्यकारी अधिकार मंत्रिपरिषद में निहित होंगे. राष्ट्रपति औपचारिक रूप से देश के राष्ट्राध्यक्ष होंगे. नए संविधान ने देश में आनुपातिक प्रतिनिधित्व चुनाव प्रणाली की बुनियाद डाली है.

इस तरह से नेपाल के माओवादी यतार्थ की राह पर अग्रसर हैं वहीं छत्तीसगढ़ में माओवादियों से संघर्ष में पिछले 10 सालों में कुल 2283 लोग काल के गाल में समा गये. इनमें 691 निरीह नागरिक, 865 सुरक्षा बलों के जवान तथा अफसर एवं खुद 727 माओवादी शामिल हैं.

लेटिन अमरीकी देशों में आज जो वामपंथी उभार दिख रहा है, वो गुरिल्ला रास्तों से नहीं, बल्कि जन-राजनीति पर आधारित जन आंदोलनों, जन विश्वास और जन संगठनों के निर्माण तथा पूंजीवादी राजनैतिक संस्थाओं के कुशल उपयोग का नतीजा है. नेपाल का अनुभव भी ‘सशस्त्र संघर्ष’ की अवधारणा को ठुकराता है. लेकिन छत्तीसगढ़ के माओवादी आज भी अपनी दशकों पुरानी अवधारणाओं से चिपके हुए हैं और भारतीय परिस्थितियों को क्रांति-पूर्व चीन की परिस्थितियों के समकक्ष मानते हुए सशस्त्र क्रांति को ही भारतीय क्रांति का मार्ग मानते हैं.

जबकि चीन के पूर्व राष्ट्रपति माओं जे दुंग के इस आंकलन को वे बिल्कुल भुला देते हैं–”(सशस्त्र) संघर्ष पर जोर देने का यह मतलब नहीं है कि संघर्ष के अन्य रुपों को छोड़ दें, बल्कि सशस्त्र संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक संघर्ष के अन्य रुपों के साथ इसका समन्वय न किया जाये.”

इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जहां शुरूआत में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने नक्सली आंदोलन का समर्थन किया था, वहीं बाद में उसने नक्सलियों की इस बात के लिए आलोचना की कि वह जन कार्य और जन संघर्षों की अनदेखी करते हुए राजनैतिक तथा संगठनात्मक मुद्दों का सैन्य रणनीति के साथ घालमेल कर रही है तथा विचारहीन रक्तपात और हत्यायों का आयोजन कर रही है.

इस संबंध में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने 1970-71 में एक नोट नक्सल प्रमुख चारू मजुमदार को भी भिजवाया था, लेकिन उन्होंने इस आलोचना को दबा दिया था. बाद में 14 जुलाई, 1972 को अपनी पत्नी को जेल से लिखे पत्र में उन्होंने स्वीकार किया था कि नक्सली आंदोलन में वैयक्तिक हत्या पर जोर देना ‘भटकाव’ था.

भाकपा (माओवादी) का पार्टी कार्यक्रम ‘राजनीतिक सत्ता को सषस्त्र संघर्श द्वारा हथियाने’ को अपना प्रमुख और बुनियादी कार्य मानता है. आज के भारतीय माओवादियों का यह कार्यक्रम अपने पूर्ववर्ती नक्सलियों के कार्यक्रम से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं है. पीडब्ल्यूजी और एमसीसी के विलय से बनी भाकपा (माओवादी) का माओवाद से कुछ भी लेना-देना नहीं है और वह माओ के व्यवहार को विकृत रुप में पेश करती है.

सशस्त्र क्रांति पर आधारित छत्तीसगढ़ के माओवादियों की गलत रणनीति का नतीजा उनके तथाकथित आधार क्षेत्रों में आदिवासियों को भुगतना पड़ रहा है, जो मासूम और निर्दोष होने के बावजूद माओवादी हिंसा और राजकीय दमन के दो पाटों के बीच पिस रहे हैं. सत्ता केन्द्र पर बैठे लोगों को डराने के लिए वे छोटे कर्मचारियों, छोटे राजनैतिक कार्यकर्ताओं एवं निर्दोश ग्रामीणों को पुलिस मुखबिर बताकर हत्या कर रहे हैं.

माओवादी जन अदालतों में आज यही हो रहा है. इस रणनीति का स्पष्ट संदेश है- “जो हमारे साथ नहीं है, वे वर्ग शत्रु हैं.’ इस रणनीति से आतंक तो फैल सकता है, बदलाव नहीं हो सकता. बड़े जमींदार, पूंजीपति, खनन माफिया, जंगल ठेकेदार, कार्पोरेट क्षेत्र व पूंजीवादी राजनेता- ये सभी उनके वित्त पोषण का कार्य कर रहे हैं.

यही है छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के माओवाद का फर्क जिसमें नेपाल का माओवाद एक तर्कसंगत मुकाम तक पहुंत गया जबकि छत्तीसगढ़ का माओवाद जंगलों में भटकने वाला गिरोह बनकर रह गया है.

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