छत्तीसगढ़ से पलायन बढ़ेगा

रायपुर | जेके कर: छत्तीसगढ़ से रोजगार की तलाश में दिगर में होने वाला पलायन रुकना मुश्किल है. भले ही वहां जाकर छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों को बंधुवा मजदूर बना लिया जाता हो या उन्हें प्रताड़ित किया जाता हो. इसका कारण है कि एक तो लगातार दो साल से पड़ रहे सूखे के कारण यहां किसानी का काम कम हो रहा है दूसरे केन्द्र सरकार की ग्राम्रीणों को उनके गांव में रोजगार दिये जाने की योजना नाकाम साबित हो रही है. जाहिर है कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं.

हाल ही में केन्द्र सरकार ने साल 2015-16 का राज्यों के प्रदर्शन का रिपोर्ट कार्ड पेश किया है. जिसके अनुसार छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत औसतन हर परिवार को महज 47 दिनों का ही रोजगार इस योजना के तहत उपलब्ध करवाया जा सका है.


जहां तक गांवों के लोगों को उनके गांव में ही साल में 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध करवाने की बात है तो वह भी केवल 11 फीसदी परिवारों को ही उपलब्ध करवाया जा सका है. यह 11 फीसदी रोजगार उन परिवारों को उपलब्ध करवाया जा सका है जिन्होंने इस योजना के तहत रोजगार मांगा था पूरे गांव को नहीं.

इन परिवारों को प्रतिदिन 152.80 रुपयों की रोजी मिली है. इस तरह से औसतन हर परिवार को साल में 7,181.60 रुपये तथा जिन्हें 100 दिनों का रोजगार मिला उन्हें 15,280 रुपये की रोजी मिल सकी है. अब भला साल में 15 हजार रुपये की कमाई से एक परिवार का भरण-पोषण कैसे संभव है. जाहिर है कि वे अधिक रोजगार तथा रोजी की तलाश में पलायन करते रहेंगे.

साल 2015-16 में 100 दिनों से ज्यादा रोजगार तो महज 10.9 फीसदी परिवारों को ही मुहैय्या करवाया जा सका है.

उल्लेखनीय है कि मार्च 2015 में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के सवाल के जवाब में राजस्व विभाग के मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने बताया था, ” वर्ष 2012 से 2015 तक 95,924 लोगों ने राज्य से पलायन किया है.” उन्होंने बताया था कि वर्ष 2012-13 में 22,149 मजदूरों ने, वर्ष 2013-14 में 27,830 मजदूरों ने और वर्ष 2014-15 में 45,945 मजदूरों ने छत्तीसगढ़ से दूसरे राज्यों में पलायन किया है. मंत्री ने बताया था कि वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के मध्य राज्य के जांजगीर चांपा जिले से 29,190 मजदूरों ने, बलौदाबाजार जिले से 23,005 मजदूरों ने, महासमुंद जिले से 16,378 मजदूरों ने, बेमेतरा जिले से 10,180 मजदूरों ने, राजनांदगांव जिले से 9,419 मजदूरों ने, मुंगेली जिले से 6,346 मजदूरों ने, रायगढ जिले से 625 मजदूरों ने, बिलासपुर जिले से 456 मजदूरों ने, बालोद जिले से 145 मजदूरों ने, जशपुर जिले से 118 मजदूरों ने तथा कोरबा जिले से 62 मजदूरों ने पलायन किया था.

जाहिर है कि इस तरह से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों से रोजगार के लिये दिगर राज्यों की हो रहें पलायन को रोका नहीं जा सकता है. कम से कम जन कल्याणकारी सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन से ग्रामीण छत्तीसगढ़ को कुछ राहत तो दी ही जा सकती है.

मनरेगा जैसी योजनाओं की आलोचना करने वाले कह सकते हैं कि आखिरकार इस तरह के योजनाओं की जरूरत क्यों आन पड़ी? उनका यह आरोप भी सही है कि विकास की किरणें गांवों तक नहीं पहुंची है जिसके लिये देश पर लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी जिम्मेदार है. इसी के साथ यह सवाल भी किया जाना चाहिये कि उस समय आप क्या कर रहें थे. क्या आपके पास कोई वैकल्पिक योजना है.

अब तक जितनी नई योजनाओं को लांच किया गया है जैसे मेक इन इंडिया, डिजीटल इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, दुर्घटना बीमा, जीवन बीमा, अटल बीमा योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीअ कौशल योजना, आवास योजना उनमें से किसी से भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ने जा रहे हैं.

लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच छत्तीसगढ़वासियों को किस तरह से राहत पहुंचाई जाये यह लाख टके का सवाल है.

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