छत्तीसगढ़ में मनरेगा का काम तमाम

संजय पराते
मनरेगा केन्द्र और राज्य दोनों के हमले के निशाने पर है. छत्तीसगढ़ इसकी सबसे बड़ी मिसाल है कि केन्द्र स्तर पर ‘अव्वल राज्य’ कैसे ‘फिसड्डी’ बनता है. छत्तीसगढ़ सरकार के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जारी आंकड़ों का ही विश्लेषण करें तो यह बात औऱ साफ हो जाती है. वर्ष 2014-15 में 17.48 लाख परिवारों को (जबकि काम पाने योग्य पंजीकृत परिवार लगभग 40 लाख हैं) 5.56 करोड़ मानव दिवस रोजगार उपलब्ध कराया गया- यानि प्रति परिवार 32 दिन सालाना.

इस वर्ष 1800 करोड़ रुपये खर्च किये गये (और आबंटित बजट से कम!) इतनी राशि से सभी मजदूरों का भुगतान हो जाना चाहिए था, लेकिन लगभग 45 लाख मजदूरों का लगभग 600 करोड़ रुपयों की मजदूरी का भुगतान बकाया था और इसमें लाखों मजदूर ऐसे हैं, जिनका तीन माह से ज्यादा का भुगतान लंबित था. यदि प्रतिदिन औसत मजदूरी 150 रुपये भी मान लें, तो 1800 करोड़ की राशि में से केवल 234 करोड़ रुपये ही मजदूरी के मद में वितरित किये गये हैं. अब भाजपा सरकार को जवाब देना है कि क्या 1550 करोड़ रुपयों से ज्यादा की निर्माण सामग्री ही खरीद ली गई? स्पष्ट है कि कैग के इस आरोप की पुष्टि होती है कि मनरेगा में व्यापक भ्रष्टाचार है.


इस भ्रष्टाचार का एक नमूना पहले उजागर हुआ था कि किस प्रकार कांकेर जिले में कृषि भूमि के समतलीकरण के नाम पर 50 करोड़ रुपये डकार लिए गये और आज तक यह सरकार किसी को भी कोई सजा नहीं दिलवा पाई. कांकेर के बाद दूसरा उदाहरण है धमतरी- जहां पिछले 9 सालों के भाजपाई राज में 100 करोड़ रुपये खर्च करके 4000 तालाबों का निर्माण व गहरीकरण करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन अधिकांश तालाबों में पानी ही नहीं भरता. धमतरी ही वह जिला भी है, जहां आप पायेंगे कि भूमि समतलीकरण के कार्य को मात्र 32 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर पर होना दिखाया गया था. यह उसी वर्ष हुआ था, जिस वर्ष कांकेर का घोटाला उजागर हुआ था. लेकिन इतने व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद यह बात तो मान्य है कि मनरेगा में रोजगार देने के मामले में यह प्रदेश अग्रणी राज्यों में एक रहा है.

लेकिन मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कह दी है कि वे मनरेगा को पसंद नहीं करते. पूरी भाजपा और उसका प्रशासन तुला है कि इसे रोजगार आधारित कानून की बजाय राहत आधारित सामान्य योजना में बदल दिया जाये. वर्ष 2014-15 के लिए मनरेगा के मद में केन्द्रीय बजट आबंटन मात्र 34000 करोड़ रुपये था, जबकि राज्यों ने 62000 करोड़ रुपयों की मांग की थी. वर्ष 2015-16 के बजट में भी कोई वृद्धि नहीं की गई, जबकि मजदूरी और सामग्री पर खर्च की जाने वाली राशि के अनुपात को बदलकर बराबर-बराबर कर दिया गया था. कांग्रेस के शासन में मनरेगा का औसत बजट आबंटन 38000 करोड़ रुपये था. वर्ष 2013-14 में कुल 10 करोड़ परिवारों को रोजगार दिया गया था. लेकिन घटे हुए बजट आबंटन के साथ मनरेगा की रोजगार सृजन क्षमता में 40 प्रतिशत की कमी हो गई.

रिजर्व बैंक का सर्वे बताता है कि मनरेगा के कारण ग्रामीण मजदूरों की औसत मजदूरी में 10 प्रतिशत का उछाल आया है. मनरेगा के खात्मे से उनकी सामूहिक सौदेबाजी पर भी बुरा प्रभाव पड़ने जा रहा है और ग्रामीण सामंती प्रभुवर्ग चाहता भी यही है.

इस रोजगार विरोधी नीति का स्पष्ट असर छत्तीसगढ़ पर पड़ा है. मनरेगा के मद में सरकार ने मांगे थे 2500 करोड़ रुपये, लेकिन आबंटित किये गये केवल 1500 करोड़ रुपये ही. पिछले साल की बकाया मजदूरी भुगतान के बाद सरकार के पास वास्तविक बजट 900 करोड़ रुपये ही उपलब्ध होगा, जिसमें से लगभग 450 करोड़ रुपये ही वह मजदूरी में खर्च कर पायेगी.

इतने पैसों से तो वह केवल 3 करोड़ रोजगार दिवसों का ही सृजन कर पायेगी और पंजीकृत परिवारों के हिस्से में औसत रोजगार दिनों की संख्या 7 से ज्यादा नहीं होगी. अब मोदी की पसंद रमन सिंह की नापसंदगी तो नहीं हो सकती. इस वित्तीय वर्ष के पहले 3 महीनों में इस सरकार ने केवल 1.86 लाख मानव दिवस रोजगार का ही सृजन किया है.

और सूखे के वर्ष में तालाब गहरीकरण व निर्माण पर जोर दिया जायेगा!! प्यास लगने पर कुआं खोदने से और अकाल पड़ने पर तालाब खोदने से आम जनता का भला नहीं हो सकता इसमें कितना गहरा भ्रष्टाचार होगा और किनकी तिजोरियां भरेंगी, सब समझ सकते हैं. लेकिन जोर से यह नारा तो लग ही सकता है- जय श्रीराम, हो गया काम. तब बाबरी मस्जिद का काम तमाम हुआ था, अब मनरेगा का काम तमाम होगा!!

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