जहां धान पर चलता है बेलन

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ के कई गांवों में आज भी किसानों को पारंपरिक तरीके से धान की मिंजाई करते देखा जा सकता है. खलिहानों किसान जब धान पर बेलन चलाते हैं तो पुराने दिन याद आ जाते हैं, जब बैलों के झुंड, दौंरी व बेलन से धान की मिंजाई की जाती थी.

गरीब तबके के लोग जहां दौंरी के माध्यम से धान मिंजाई करते थे, वहीं गांव के गौंटिया, मंडल व संपन्न किसान बेलन बनवाकर धान की मिंजाई करवाते थे. लेकिन वक्त का तकाजा देखिए कि राज्य के अन्य जिलों में अब हार्वेस्टर व थ्रेशर के माध्यम से खेत में ही धान की मिंजाई कर सीधा धान घर में लाया जाता है.


भाटागांव के बुजुर्ग सुकालु राम बताते हैं कि खेत में धान बोने से पहले व कटाई से पहले गांव के डीही डोंगर, ठाकुर देवता आदि की पूजा की जाती है. फसलों की रखवाली के लिए पहले किसान देवी-देवताओं के भरोसे रहते थे, इसलिए विभिन्न त्योहारों में फसलों की पूजा की जाती है.

धान पकने के समय खलिहान तैयार किए जाने के बाद ही फसल की कटाई की जाती थी तथा खलिहान में हर शाम को घर की महिलाएं दिया जलाती थीं. ऐसी मान्यता भी थी कि खलिहान में देवी-देवताओं का वास होता है और खलिहान में धान मिंजाई करने से धान का उत्पादन अच्छा होता है.

धान उड़ाने के बाद धान को घर लाने से पहले खलिहान में धूप-दीप जलाकर नारियल फोड़कर पूजा के बाद धान को काठा से नापा जाता था. उसके बाद धान को घर लाकर कोठी में रखा जाता था. सालभर कोठी भरी रहती थी. लेकिन अब किसान धान को खेत से सीधे मंडी या खरीदी केंद्र ले जाकर बिक्री करते हैं.

आजकल ज्यादातर गांवों में भी शहरी आबो-हवा और आधुनिक खेती का चलन हो गया है. कम समय में ज्यादा से ज्यादा धान मिंजाई के लिए किसान हार्वेस्टर व थ्रेशर का उपयोग करने लगे हैं. इसके चलते गांवों में अब धान मिंजाई की पुरानी पद्धति कम ही देखने को मिलती है.

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