फसल बीमा में फिर ठगे जायेंगे किसान

रायपुर | विशेष संवाददाता: फसल बीमा में फिर किसान ठगे जा सकते हैं. पिछले कई दिनों से छत्तीसगढ़ में हुई बारिश के कारण कई इलाकों में पकी हुई धान की फसल बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है. धमतरी जैसे इलाकों में धान की फसल खेतों में गिरी पड़ी है और खेतों में पानी भरा हुआ है. किसान परेशान हैं. लेकिन इस बार भी किसानों को फसल बीमा की रक़म नहीं मिलने का खतरा बना हुआ है. दरअसल, खड़ी फसल के मामले में स्थानीय आपदा जैसे ओलावृष्टि, भूस्खलन एवं जलप्लावन तथा फसल कटने के बाद 14 दिनों के अंदर चक्रवात, चक्रवाती वर्षा एवं ओले पड़ने से यदि किसी ग्राम पंचायत के 25 फीसदी से कम क्षेत्र में हानि होने पर जो नियम है वह किसानों पर भारी पड़ सकता है. इस नियम की जानकारी के अभाव में किसानों को कोई मुआवजा नहीं मिलेगा.

इस नियम में कहा गया है कि ऐसा स्थिति में प्रभावित किसान को इसकी सूचना सीधे क्रियांवयन बीमा कंपनी अथवा स्थानीय राजस्व/ कृषि अधिकारी, संबंधित बैंक अथवा जिला कृषि पदाधिकारी/ अनुभागीय दंडाधिकारी/ तहसीलदार को 48 घंटे के अंदर लिखित में सूचना देगी. सूचना मिलने पर क्रियांवयन बीमा कंपनी फसल हानि का अनुमान लगाने के लिये हानि निर्धारक को भेजेगी तथा उसके बाद नियमानुसार पे आउट निर्धारित किया जायेगा.

आम आदमी पार्टी के छत्तीसगढ़ के संयोजक तथा कृषि मामलों के जानकार रायपुर में रहने वाले डॉ. संकेत ठाकुर ने सीजीखबर से कहा कि मैं खुद यह नियम आप से सुन रहा हूं कि किसी प्रभावित इकाई में 25 फीसदी के कम क्षेत्र में ओलावृष्टि, चक्रवात तथा जलप्लावन से हानि होने पर खुद किसान को 48 घंटे के अंदर इसकी लिखित में सूचना देनी पड़ेगी. जब किसान को इस नियम की जानकारी ही नहीं होगी तो वह कैसे इसकी सूचना देगी. यह तो किसान को बीमा के नाम पर धोका देने के समान है.

उन्होंने कहा कि आमतौर पर ग्राम पंचायत में खेती 1000 से 1500 या 2000 एकड़ में होता है. जिसका अर्थ यह हुआ कि कम से कम 250 एकड़ की फसल बर्बाद होने पर भी किसान को ही खुद खबर देनी होगी. यह तो सरासर अन्याय है. सबसे बड़ी बात है कि जिस गाजे-बाजे के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की घोषणा की गई तथा प्रचार किया गया, उसी तरह से किसानों को इसके नियमों की जानकारी देना भी सरकार का कर्त्वय है. अन्यथा भले ही किसी गांव में 250 एकड़ की फसल बर्बाद हो जाये किसान को उसका बीमा क्लेम नहीं मिलेगा.

इसी तरह से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले तथा मुंगेली क्षेत्र में किसानी करने वाले आनंद मिश्रा से जब सीजीखबर ने यह पूछा कि क्या आपकों यह 48 घंटे के अंदर लिखित में सूचना देने के नियम की जानकारी है तो उन्होंने लगभग चौंकते हुये कहा कि मैं तो यह पहली बार सुन रहा हूं. यह तो सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि इस भयावह नियम की जानकारी किसानों को पहले से ही दे कर रखे अन्यथा जानकारी के अभाव में फसल की हानि होने के बाद भी किसान इंतजार करता रह जायेगा तथा बीमा कंपनी नियमानुसार 48 घंटे के अंदर सूचना न मिलने की बिना पर क्लेम नहीं देगा.

आनंद मिश्रा ने कहा दरअसल, नियमों को सरल बनाया जाना चाहिये जिससे प्रभावित किसानों को नुकसान की स्थिति में उसकी भरपाई हो सके. उन्होंने सवाल किया कि यह नियम किसने बनाया है ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ के योजनाकारों ने या बीमा कंपनी ने? यदि बीमा कंपनी इस तरह के नियम बनाती है तो उस कंपनी के बजाये दूसरे कंपनी से बीमा करवाना चाहिये. यदि सरकार के योजनाकारों ने ही इस नियम को बनाया है तो उनका उद्देश्य क्या है? किसानों को मुआवजा देना या नियमों के आड़ में बीमा कंपनी को ‘ना’ कहने का मौका देना.

वहीं, कृषि मामलों के जानकार तथा छत्तीसगढ़ बचाओं आंदोलन के नंदकुमार कश्यप ने कहा कि जब किसी के घर चोरी होती है तो उसकी सूचना उसी को देनी पड़ती है पर यहां पर बात चक्रवात से, वर्षा से या ओलावृष्टि से खड़ी या रखी फसल के खराब हो जाने का मामला है. स्थानीय आपदा के कारण होने वाले नुकसान की सूचना किसान द्वारा 48 घंटे के अंदर देने का नियम दरअसल मामले को और उलझा देगा. ज्यादातर किसानों को इसकी जानकारी ही नहीं है. इस तरह से उनकों स्थानीय आपदा के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो सकेगी.

जाहिर है कि जिस तरह से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का प्रचार किया जा रहा है उस तरह से किसानों को मुआवजा नहीं मिलने जा रहा है. इस बात की फौरी आवश्यकता है कि इसके नियमों तथा उप नियमों की जानकारी किसानों के घर-घर तक पहुंचाई जाये तभी जाकर वे इसका लाभ उठा सकते हैं. अन्यथा जानकारी के अभाव में वे ठगे से रह जायेंगे. वैसे भी छत्तीसगढ़ में किसानों को इस योजना के तहत महज कुछ रुपयों का मुआवजा मिलने की खबरे आ चुकी हैं.

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