छत्तीसगढ़ सबसे गरीब क्यों?

रायपुर | जेके कर: सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार छत्तीसगढ़ देश का सबसे गरीब राज्य है. छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का आंकड़ा 39.93 फीसदी है(साल 2011-12). छत्तीसगढ़ के गांवों में यह 44.61 फीसदी तथा शहरों में 24.75 फीसदी है. 1993-94 में छत्तीसगढ़ में यह 50.9 फीसदी था जोकि कम हुआ है. राष्ट्रीय स्तर पर यह आकड़ा 21.9 फीसदी का है (साल 2011-12) जबकि यह आंकड़ा 1990 में 47.8 फीसदी का था. जाहिर है कि छत्तीसगढ़ में गरीबी उस अनुपात में कम नहीं हुई है, जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर तथा अन्य राज्यों में हुआ है.

छत्तीसगढ़ की तुलना में पड़ोसी मध्य प्रदेश में यह 31.65 फीसदी, ओडिशा में 32.59 फीसदी, बिहार में 33.74 फीसदी तथा झारखंड में 36.96 फीसदी है. छत्तीसगढ़ को मिलाकर 9 राज्य ऐसे हैं, जिनमें राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का आंकड़ा ज्यादा है.

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उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य है. बिलासपुर रेलवे जोन देश का सबसे ज्यादा माल ढोने वाला जोन है, जो भारतीय रेलवे को उसके कुल वार्षिक राजस्व का छठवां हिस्सा देता है. छत्तीसगढ़ खनिज राजस्व की दृष्टि से देश में दूसरा बड़ा राज्य है. छत्तीसगढ़ वन राजस्व की दृष्टि से तीसरा बड़ा राज्य है.

संसाधनों से भरपूर छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में देश का 38.11 फीसदी टिन अयस्क, 28.38 फीसदी हीरा, 18.55 फीसदी लौह अयस्क और 16.13 फीसदी कोयला, 12.42 फीसदी डोलोमाईट, 4.62 फीसदी बाक्साइट उपलब्ध है. छत्तीसगढ़ में अभी देश का 38 फीसदी स्टील उत्पादन हो रहा है. सन 2020 तक हम देश का 50 फीसदी स्टील उत्पादन करने लगेंगे.

छत्तीसगढ़ में अभी देश का 11 फीसदी सीमेन्ट उत्पादन हो रहा है, जो आगामी वर्षों में बढ़कर 30 फीसदी का हो जायेगा. राज्य में अभी देश का करीब 20 फीसदी एल्युमिनियम उत्पादन है, वह निकट भविष्य में बढ़कर 30 फीसदी हो जायेगा. छत्तीसगढ़ में भारत का कुल 16 फीसदी खनिज उत्पादन होता है अर्थात साल भर में खनिज से बनने वाली हर छठवीं चीज पर छत्तीसगढ़ का योगदान होता है.

छत्तीसगढ़ में देश का लगभग 20 फीसदी लौह अयस्क है, यानी हर पांचवें टन आयरन ओर पर छत्तीसगढ़ का नाम लिखा है. इन सब के बावजूद छत्तीसगढ़ का देश का सबसे गरीब राज्य होना इस बात का घोतक है कि विकास आम छत्तीसगढ़िया के दरवाजे तक नहीं पहुंच पा रहा है.

प्राकृतिक संपदा की लूट- डॉ. संकेत ठाकुर
इसकी मूल वजह यहाँ के बहुसंख्य किसानों और वनवासियों को उनकी मेहनत का वाजिब मूल्य नही मिल पाना है. यह आबादी प्रदेश की नैसर्गिक सम्पदाओं की सदियो से रक्षक है जिसने अपनी आजीविका को बिना प्रकृति को नुकसान पहुचाये सुनिश्चित किया है. लेकिन खेती और वनोपज को आधुनिक विकास के मॉडल में सम्मिलित नही करके ओद्योगिक विकास को तरजीह दी गई. औद्योगीकरण के नाम पर उद्योग घरानों को प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर भारी पैसा बनाने की छूट मिली हुई है. प्राथमिक कृषि उपज और वनोपज कौड़ियो के मोल बिक रहे है और सीमेंट लोहा बिजली आदि जैसे ओद्योगिक उत्पाद निरन्तर महंगे होते जा रहे है. छत्तीसगढ़ के लोगों ने अकूत खनिज सम्पदा को सहेजकर रखा लेकिन इन पर आधारित उद्योगों में ग्रामीणों को किसी भी तरह की हिस्सेदारी नही मिली बल्कि सस्ती कीमत पर जमीन खरीदकर उनको बेदखल कर दिया गया.

राज्य सरकार ने खनिज राजस्व एवम् वन राजस्व से प्राप्त आय को वहाँ की निवासियो के आर्थिक विकास में लगाने के स्थान पर शहरी विकास में लगाना बेहतर समझा. परिणामस्वरूप वनवासी गरीब रह गए और गांव उजड़ते जा रहे है शहरों की ओर पलायन जारी है. कोयला घोटाला, खनिज पट्टो की लीज, जमीन अधिग्रहण आदि के जरिये मूल निवासियों का हक छीना जा रहा है. यह छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सम्पदा की सरेआम लूट का मामला है.

विस्थापन की भरपाई नहीं हो रही- बादल सरोज
छत्तीसगढ़ की गरीबी का कारण ढूंढना है तो चिकित्सा विज्ञान की भाषा में समझना ठीक होगा. प्राकृतिक सम्पदा की भरमार अगर छत्तीसगढ़ के रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन्स, आरबीसी, डब्लूबीसी मान लिए जाएँ तो यह खतरनाक सच उभर कर आता है कि बेहद तेज रफ़्तार से यह शक्तिशाली रक्त छत्तीसगढ़ की धमनियों से निकाला जा रहा है. निरंतर यह प्रक्रिया जारी है – मगर उससे होने वाली रिक्ति की पूर्ती के लिए या तो कुछ भी नहीं किया जा रहा है.

यदि पूंजी निर्माण और पूंजी निवेश के ही आंकड़े देख लिए जाएँ तो यह यथार्थ सामने आ जाता है. यदि पूंजी निवेश का प्रति करोड़ रूपये निवेश और रोजगार सृजन का अनुपात देख लिया जाए तो असल में जो दर निकल कर आती है वह नकारात्मक ही है. स्पष्ट है कि यह दौर छत्तीसगढ़ को रक्ताल्पता की स्थिति में पहुंचाने का, अनेमिक बनाने का दौर है.

कथित औद्योगिकीकरण या उत्खनन अपने द्वारा किये जा रहे विस्थापन या रोजगार ह्रास तक की भरपाई नहीं कर पा रहा. नए रोजगार के सृजन की तो बात ही अलग रही. इसी के साथ इतना ही महत्त्वपूर्ण यह तथ्य है कि जो रोजगार सृजित हो रहा उसकी क्वालिटी अनेक दशक पहले बने भिलाई या एनटीपीसी जमनीपाली या किरंदुल या उस दौर में खुदी कोयला खदानों की श्रम शक्ति के रोजगार की गुणवत्ता के मुकाबले में सभी जगह, यहां तक कि खुद इन्ही उद्योगों में, एकदम नकारात्मक है. रोजगार की गुणवत्ता आमदनी में श्रमशक्ति की हिस्सेदारी से तय होती है.

गरीबों की आय नहीं बढ़ी- संजय पराते
प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग के आधार पर 1962 में एक कार्यकारी समूह ने गरीबी के पैमाने को निर्धारित करने का प्रयास किया था. तब उसने प्रति व्यक्ति प्रति माह 20 रूपये न्यूनतम आवश्यकता बताई थी. यदि इस पैमाने को ही माना जाए और महंगाई की औसत दर 10% ही मान ली जाएं, तो आज 2015 में यह पैमाना कम-से कम 3500 रूपये प्रति माह बनता है. तब पांच व्यक्तियों के एक परिवार के लिए न्यूनतम मजदूरी 17000 रूपये मासिक तय होनी चाहिए. लेकिन आप जानते हैं कि हमारे प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी 5000 रूपये मासिक भी नहीं हैं. सरकारी रिपोर्ट कहती है कि हमारे देश में 80 फीसदी लोग प्रतिदिन 20 रूपये भी खर्च करने की स्थिति में नहीं है.

इसे दूसरी तरह से लें. हमारे प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2014-15 में 64442 रूपये वार्षिक है. इसमें लगभग 10 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हो रही है. चार व्यक्तियों के परिवार के लिए वार्षिक आय होती है 2.58 लाख रूपये. सवाल है कि हमारे प्रदेश में कितने परिवार यह आय सुनिश्चित कर पाते हैं? सरकारी रिपोर्ट तो यह बताती है कि प्रदेश के 75 फीसदी ग्रामीण परिवारों की आय 60000 रूपये वार्षिक से कम है. सरकार के ही आंकड़े दिखाते हैं कि इस प्रदेश के 80 फीसदी किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है और कुल कृषि रकबे के 40 फीसदी से भी कम. सरकारी आंकड़ों से परे जाएं, तो 90 फीसदी प्रदेश की जनता गरीबी रेखा से नीचे जी रही है, जो सम्मानजनक जीवन-यापन करने लायक मजदूरी भी नहीं पाती. इसका सीधा अर्थ है कि हमारे प्रदेश की मेहनतकश जनता अपने खून-पसीने से जो उत्पादन कर रही है, उस जीडीपी का केवल 14 फीसदी ही उसके घरों में पहुंचता है, 84 फीसदी तो केवल 10 फीसदी धनकुबेरों की तिजोरियों में कैद हो रहा है. इसीलिए इस प्रदेश में जीडीपी के बढ़ने का मतलब है, आर्थिक असमानता का और बढ़ना. इसीलिए जीडीपी वृद्धि का विकास और मानव विकास सूचकांक से कोई संबंध नहीं है.

किसान केवल वोट के साधन- नंद कश्यप
मै यहा गरीबी के कारणों को सामजिक दृष्टीकोण से देखता हूँ ,यह सही है कि इस प्रदेश मे खनिज और जंगलो की बहुतायत के साथ साथ कुछ बडे उद्योग भी हैं परंतु सत्ताधारी वर्ग के लिये विकास के मायने इन संसाधनो और सस्ते श्रम का दोहन रहा है. इसलिये प्राकृतिक श्रोतो से होने वाली आय कभी भी इस प्रदेश की श्रमिक जनता के बेहतरी के लिये नही लगा वरन वह धन साधनसम्पन्न अमीरों के लिये आधारभूत ढांचा बनाने के लिये उपयोग हुआ. इतने गरीब प्रदेश मे यदि गृह निर्माण मंडल करोडों रुपये वाले फ्लैट बेचे तो यह बात स्वयम सिद्ध हो जाती है.

दूसरा कारण सत्ताधारी वर्ग की दकियानूसी सामाजिक सोच रही है जिसके तहत दलित और आदिवासी सस्ता श्रम उपलब्धी के साधन के रूप मे देखे जाते हैं. सम्पूर्ण मानवीय विकास मे उनकी भागीदारी अंतिम पायदान पर होता है और चूंकि प्रदेश मे आदिवासी और दलितो की संख्या ही लगभग 44 फीसदी है इसलिये अति गरीब भी लगभग उतने ही हैं.

तीसरा कारण इन्ही का विस्तार है यानी प्रदेश मे कभी भी जनता के बेहतरी और श्रम नियोजन को सामने रख औद्योगीकरण और निर्माण उपक्रम नही खडे किये गये वरन पूरे औद्योगीकरण के पीछे प्रदेश मे प्राप्त नैसर्गिक संसाधन हैं इसलिये इस प्रदेश मे निर्मित ऐसा कोई भी उत्पाद या उपभोग सामग्री राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है सिवाय बडी तादाद मे श्रमिको के पलायन के और चूंकि सरकारों को इन प्राकृतिक संसाधनो से इतना राजस्व मिल जाता है कि कृषि और किसान सिर्फ वोट के साधन बने हुए है. उनके विकास के कभी कोई ठोस योजना नही बनी जो भी सम्पन्नता कृषि क्षेत्र मे दिख रही है वह किसानो की अपनी मेहनत और बाज़ार की ताक़तो के कारण है. यहा तक कि प्रदेश निर्माण के15 साल बाद भी सिंचित भूमि के रकबे मे कोई उल्लेखनीय वृद्धी नही हुई है और एक प्राकृतिक विपदा से किसान आत्महत्या को मज़बूर है.

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