छत्तीसगढ़ सरकार परीक्षा में फेल

रायपुर | विशेष संवाददाता:  छत्तीसगढ़ में अंततः चार साल बाद ही सही पीएससी 2008 के मुख्य परीक्षा परिणाम पर लगी रोक हट ही गई.गड़बड़ियों को लेकर कुछ उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. अब ताजा परिणाम के बाद पीएससी 2008 की लंबे अरसे से रूकी प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी. इससे उम्मीदवारों ने राहत की सांस ली है. लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि 2008 की परीक्षा का परिणाम निकल भी जाये तो भी दूसरी परीक्षाओं के परिणाम कब निकलेंगे ?

राज्य बनने के बाद से ही छत्तीसगढ़ में प्रतियोगी परीक्षाएं बिना विवाद के कभी पूरी नहीं हो पाई और राज्य में कांग्रेस और भाजपा की सरकारें परीक्षा लेने में फेल ही रही हैं. खास कर छग में पीएससी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों ने पूरे देश में छत्तीसगढ़ को शर्मशार कर रखा है. हर बार यह बात होती है कि अगली बार पीएससी की परीक्षा में कड़ाई बरती जायेगी लेकिन पीएससी में बैठे जिम्मेवार लोग ‘दाग अच्छे हैं’ की तर्ज पर हर बार भयावह गड़बड़ियां करते हुये हजारों युवाओं के सपनों को तार-तार कर देते हैं.

पीएससी ने युवाओं से किया खिलवाड़
राज्य लोक सेवा आयोग की कारगुजारियों से प्रदेश के युवाओं में निराशा छाती जा रही है. राज्य बनने के 12 साल बाद अभी तक सिर्फ चार बार परीक्षाएं आयोजित की जा सकी हैं, और वह भी विवादों में घिरी हैं. परीक्षाएं विलंब से लेने और मामले हाईकोर्ट में लंबित होने के कारण कई प्रतियोगियों की उम्र निकल गई है तो कईयों की अंतिम आयु सीमा पार होने वाली है. राज्य के सिविल सर्विसेज परीक्षा से अब तक लगभग 400 युवाओं को ही नौकरी मिल सकी है.

राज्य बनने के तीन साल बाद आयोग ने 2003 में पहली सिविल सर्विसेज परीक्षा ली. 199 पदों के लिए राज्य के हजारों युवाओं ने फार्म भरे. लेकिन आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा में भूगोल, लोक प्रशासन और विधि के पूरे प्रश्न मध्यप्रदेश पीएससी से रिपीट कर दिए. मुख्य परीक्षा में जब उम्मीदवारों ने सूचना के अधिकार के तहत उत्तर पुस्तिकाएं निकलवाई तो अंकों की विसंगतियां सामने आ गई. मामला हाईकोर्ट चला गया. आयोग के अध्यक्ष अशोक दरबारी पर सवालिया निशान लगे. उन्हें बर्खास्त भी कर दिया गया.

2005 की पीएससी परीक्षा का भी यही हाल रहा. विवादों के बाद प्रारंभिक परीक्षा का दुबारा रिजल्ट निकालना पड़ा. डीएसपी की आयु सीमा भी विवादों के घेरे में आई. आयोग ने पहले निकाले जारी विज्ञापन में डीएसपी की उम्र सीमा 28 से 25 कर दी. साथ ही आयोग के अध्यक्ष खेलनराम जांगड़े और सदस्य अनमोल सलाम पर साक्षात्कार के पहले ही कुछ उम्मीदवारों को प्रश्न बता दिए जाने का आारोप भी लगा. प्रतियोगियों ने गड़बड़ी की शिकायत करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी.

2008 में पैटर्न बदलने के बाद भी परीक्षा प्रणाली नहीं सुधरी. पीएससी द्वारा एक फरवरी 2009 को 2008 की प्रारंभिक परीक्षा ली गई, लेकिन परीक्षा के विज्ञापन से लेकर परीक्षा विवादों के घेरे में हैं. सबसे पहले आयोग ने अपने नोटिफिकेशन में सभी उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा 37 साल कर दी. बाद में इसे केवल राज्य के उम्मीदवारों के लिए ही सीमित किया गया.

देश में छत्तीसगढ़ पहला ऐसा राज्य रहा जिसने पीएससी का पैटर्न ही बदल दिया. इसमें प्रारंभिक के साथ ही साथ मुख्य परीक्षा भी वस्तुनिष्ठ प्रणाली पर लेने का फैसला किया गया लेकिन प्रारंभिक परीक्षा में ही आयोग की कार्यप्रणाली की कलई एक बार फिर से खुल गई. परीक्षा में 11 प्रश्नों पर सवालिया निशान लगे. हाईकोर्ट को एक बार फिर से पीएससी की परीक्षा में हस्तक्षेप करना पड़ा. मुख्य परीक्षा के ठीक एक हफ्ते पहले हाईकोर्ट ने परीक्षा की तिथि 15 दिनों के लिए निलंबित कर दी.

परीक्षाएं जो रहीं विवादों में
प्रदेश में अब तक 2003, 2005, 2008 में आयोजित पीएससी, 2006 में सब इंस्पेक्टर, 2007 में मंडल संयोजक, 2009 में सहायक प्राध्यापक, 2010 में सीएमओ की परीक्षा ली गई. पीएससी की लापरवाही से यह सभी मामले हाईकोर्ट में लंबित हैं.

उम्मीदवारों की निकल गई उम्र
पीएससी द्वारा परीक्षाएं विलंब से लेने और मामले हाईकोर्ट में लंबित हो जाने के कारण कई प्रतियोगियों की उम्र निकल गई है तो कईयों की अंतिम आयु सीमा पार होने वाली है. दूसरी ओर शिक्षित बेरोजगार नवयुवकों के अभिभावकों ने अब तक लाखों रुपए अपने बच्चों की अच्छी नौकरी की चाहत में लगा दिए हैं. इसमें कोचिंग, किताबें सहित अन्य बहुत से खर्चे हैं. युवाओं ने कई दफा मोर्चा खोलते हुए राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा. आयोग ने हजारों उम्मीदवारों के सपनों के साथ खेला है. अगर वार्षिक कैलेंडर का पालन हुआ होता तो 12 साल में 12 परीक्षा आयोजित कर हजारों उम्मीदवारों को राज्य की प्रशासनिक सेवा करने का अवसर अब तक मिल गया होता.

सहायक प्राध्यापक पद पर भर्ती अटकी
पीएससी ने 2009 में सहायक प्राध्यापक के 828 पदों के लिए परीक्षा ली. भर्ती नियमों की विसंगति के कारण 100 से अधिक उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट में अर्जी लगाई है. मामला तीन सालों तक कोर्ट में रहा. पिछले दिनों हाईकोर्ट ने मामले पर अंतिम फैसला देते हुए भर्ती प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया.

सीएमओ भर्ती में विवाद
2009-10 में सीएमओ के 74 पदों के लिए 70 हजार युवा उम्मीदवारों ने परीक्षा दी थी. भर्ती नियम और प्रश्नपत्रों में गड़बड़ी की शिकायतों के बाद मामला हाईकोर्ट चला गया. इससे पहले सीएमओ परीक्षा में 2000 से ज्यादा लोगों के फार्म निरस्त किए गए और विकलांग वर्ग की आयुसीमा में छूट के मामले में हाईकोर्ट ने पहले ही परिणामों को बाधित कर दिया है, जहां अभी तक प्रकरण विचाराधीन है.

सीएमओ भर्ती परीक्षा के मॉडल आंसर में छत्तीसगढ़ के संबंध में भी सही जानकारी नहीं दी गई. पंडवानी गायिका ऋतु वर्मा, कृषि व सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राज्य में बायोमास व पवन चक्की की अनुपलब्धता के संबंध में गलत जानकारी वाले उत्तर तैयार किए गए. यहां तक कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के संबंध में छत्तीसगढ़ संबंधी प्रश्न और राजस्व संहिता व भारतीय दंड संहिता संबंधी प्रश्नों के उत्तर भी गलत लेने के आरोप लगे हैं.

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