प्रेरक भूमिका में मुख्यमंत्री

दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की नौकरशाही पर पकड़ भले ही ढीली हो पर इसमें दो राय नही कि राजनीति की तंग गलियों से गुजरने के बावजूद संवेदनशीलता एवं सामाजिक दायित्व के मामले में वे अद्वितीय हैं. उन्हें स्कूली बच्चों को पढ़ाते हुए देखना-सुनना बहुत सुखद है. देश में शायद ही ऐसा कोई मुख्यमंत्री होगा जो अपने व्यस्ततम समय में से कुछ पल, कुछ घंटे स्कूली बच्चों के बीच बिताता हो, उन्हें पढ़ाता हो, उन्हें सीखाता हो, उनकी सुनता हो तथा उनकी जिज्ञासाओं का शमन करता हो और उनकी पीठ थपथपाता हो.

रमन सिंह ऐसा करते हैं. यकीनन ऐसा करना उनके सरकारी कामकाज का हिस्सा नही है, पर शिक्षा के प्रति उनका प्रेम तथा उनकी सामाजिकता उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है. इसके पीछे राज्य में खूली शिक्षा की दयनीय हालत भी एक प्रमुख कारण है. लेकिन कोई मुख्यमंत्री अपने प्रवास के दौरान अचानक किसी सरकारी स्कूल की ओर रुख करें तो अचंभा स्वाभाविक है, प्रशंसनीय है, प्रेरक है.


मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बने 15 वर्ष हो गए हैं, 16वां चल रहा है यानी वह जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका है. पर प्राथमिक शिक्षा के मामले में अभी भी बच्चा ही है, ऐसा बच्चा जो दुर्भाग्य से पैदाशयी विकलांग है. राज्य में 27 जिले हैं जिनमें 11 से अधिक नक्सल प्रभावित है. इन जिलों में जिनमें बस्तर संभाग शामिल है, शिक्षा बेहद दयनीय हालत में है. बस्तर ने वर्ष 2007 से 2010 के दौरान नक्सली आतंक का चरम देखा है जब 210 से अधिक स्कूल भवनों को बम से उड़ा दिया गया था और सरकार ने शालाएं बंद कर दी थी. दो साल तक पढ़ाई – लिखाई ठप रही. बाद में जैसे-तैसे शुरु हुई. वर्ष 2010 के तुलनात्मक दृष्टि से हिंसात्मक घटनाएं भले ही कम हुई हो पर स्कूली शिक्षा उसी बदतर हालत में है.

वर्षों से कानून एवं व्यवस्था की समस्या से जूझ रहे इस इलाके को छोड़ भी दिया जाए तो शेष छत्तीसगढ़ में स्थिति क्या है? उसी हालत में. 19-20 का फर्क. हालांकि सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा गुणवत्ता अभियान, विद्यांजलि कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों के बावजूद स्थिति में कोई खास अंतर नहीं आया है. सरकारी स्कूलों में अध्ययन-अध्यापन का कैसा बुरा हाल है इसकी झलक खुद मुख्यमंत्री ने पेश की है.

मई 2016 में लोक सुराज अभियान के समापन के बाद मुख्यमंत्री ने मीडिया के सामने अपने अनुभव बांटते हुए कहा था कि गांव के स्कूलों में बच्चे तो बच्चे, शिक्षकों तक को पहाड़ा नहीं आता. शिक्षा गुणवत्ता अभियान में शिक्षा अधिकारियों द्वारा स्कूलों के निरीक्षण के दौरान जो तथ्य सामने आए हैं उसके अनुसार कई शिक्षकों को हिन्दी वर्णमाला का सही ज्ञान नही है. दिनों की स्पेलिंग और अंग्रेजी महीनों के क्रम का भी पता नही.

बालोद जिले के गुण्डरदेही ब्लॉक के प्रायमरी स्कूल के शिक्षा कर्मी को ब्लेक बोर्ड पर स्पेलिंग गलत लिखते पाया गया था. राजधानी रायपुर के धरसींवा ब्लॉक के एक प्रायमरी स्कूल में एक शिक्षक अंग्रेजी की किताब में ‘राम इज ए बॉय’ का उच्चारण नहीं कर पाया. राज्य के स्कूलों में तीन हजार से अधिक शिक्षक ऐसे हैं जो डीएड की परीक्षा में 6 बार फेल हो चुके हैं. इन घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है राज्य में प्राथमिक शिक्षा का स्तर कैसा है. जब शहरी क्षेत्रों के स्कूलों का यह हाल है तो आदिवासी इलाकों के स्कूलों की स्थिति की कल्पना की जा सकती है.

पिछले वर्ष 7 अक्टूबर 2015 को डा. रमन सिंह ने डा. एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान की शुरुआत की थी. विशेषकर रविशंकर विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में उन्होंने जन-प्रतिनिधियों एवं सरकारी अधिकारियों से अपील की थी कि शिक्षा के स्तर को दुरुस्त करने वे समय निकालकर स्कूलों में जाएं एवं बच्चों की क्लास लें. उनकी अपील के बाद 8 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक राज्य के मंत्री, विधायक, सांसद तथा लगभग 8 हजार अधिकारियों ने 15 हजार 866 प्राथमिक माध्यमिक शालाओं का निरीक्षण किया. कक्षाओं में गए.

मुख्य सचिव विवेक ढांढ यह अनुभव लेकर लौटे कि 6वीं के विद्यार्थी को तीसरी कक्षा का ज्ञान नही है और 8वीं का छात्र 5वीं की किताब नहीं पढ़ सकता. अब सरकार एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान के दूसरे चरण में इस वर्ष स्कूलों में शिक्षकों के अध्यापन एवं छात्रों पर उसके असर का आकलन करेगी. यानी छात्रों के परफार्मेंस के आधार पर शिक्षकों की जवाबदेही तय की जाएगी. जिन स्कूलों में 75 प्रतिशत छात्रों का परफार्मेंस ठीक होगा, वहां के शिक्षक बेहतर माने जाएंगे. इससे कम नतीजे देने वाले शिक्षकों का ज्ञानवर्धन किया जाएगा. लेकिन सवाल है ऐसे शिक्षक जिनके ज्ञान का स्तर बेहद निम्न है, के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी? क्या उन्हें नौकरी से निकाला जाएगा? स्कूली शिक्षा विभाग इस सवाल पर खामोश है.

बहरहाल सरकार प्रयत्न कर रही है. खुद डा. रमन सिंह समय निकालकर स्कूलों का निरीक्षण कर रहे हैं. अभी हाल ही में 11 जून को वे राजधानी के संजयनगर, टिकरापारा स्थित प्राथमिक शाला गए तथा बच्चों की क्लास ली. उन्होंने प्रेरक कहानियां सुनाई, बच्चों को योग का महत्व बताया. उनसे सवाल पूछे, जवाब लिए. दरअसल राज्य में विद्यांजलि कार्यक्रम की तैयारी की जा रही है. केंद्र सरकार ने सरकारी स्कूलों में जन भागीदारी बढ़ाने के लिए पूरे देश में इस कार्यक्रम को शुरु करने का निर्णय लिया है. इसके तहत 19 राज्यों के 2000 स्कूलों का चयन किया गया है.

छत्तीसगढ़ के 27 में से 8 जिलों के 200 स्कूलों में यह अभियान चलेगा. जन भागीदारी बशर्ते वह हो, कितनी प्रभावी सिद्ध होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा. लेकिन शिक्षा में राजनीति एवं व्यवस्था के अन्य दोषों को दूर किए बिना सरकारी स्कूलों की दशा सुधरेगी, प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षा के स्तर में कोई गुणनात्मक परिवर्तन आएगा, सोचना मुश्किल है. फिर भी एक राजनेता के रुप में मुख्यमंत्री को शिक्षक की भूमिका में देखना अच्छा लगता है. उम्मीद की एक लौ जलती हुई तो दिखती है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!