छत्तीसगढ़: रेडी-टू-ईट की असलियत

कांकेर | अंकुर तिवारी: छत्तीसगढ़ में रेडी-टू-ईट की असलियत बस्तर जाने पर पता चलता है. कुपोषण दूर करने के नाम दिये रहे रेडी-टू-ईट में सड़े तथा कीड़े लगे अनाज का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है. जाहिर है कि कुपोषण दूर करने के नाम पर शासन ने जो पहलकदमी की है उससे कुपोषण दूर होने के बजाये बीमार पड़ने की संभावना ज्यादा है. आदिवासी बाहुल्य कांकेर जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों पर भले ही बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं के लिए पौष्टिक आहार देने का दावा किया जा रहा हो, लेकिन हकीकत कुछ और है. दरअसल यहां केंद्र पर दिया जाने वाला रेडी-टू-ईट फूड सड़े अनाज से बनाया जा रहा है. अनाज में कीड़े लगे हैं और बदबू भी उठ रही है. जहां पोषण आहार का निर्माण कार्य किया जा रहा था उसके चारों ओर गंदगी का आलम था. यह आलम तब है जब आदिवासी इलाके से कुपोषण मिटाने के लिए जिला प्रशासन आंगनबाड़ी केंद्रों की मॉनिटरिंग करने की बात कह रहीं है.

शनिवार को पखांजूर के ग्राम पीव्ही 69 में आंगनबाड़ी केंद्र की पड़ताल की गई. जहाँ अनाज बेहद खराब हालत में मिला. ऐसे में बच्चों को दिए जाने वाले पौष्टिक आहार का अंदाजा लगाया जा सकता है. जाहिर है कि अधिकारियों ने यहां की कभी सुध ही नहीं ली है.

यहाँ के राधा गोविंद निर्माण समूह के द्वारा रेडू टू ईट फूड बनाने के लिए गुणवत्ता को दरकिनार कर सड़े अनाज से पौष्टिक आहार बनाया जा रहा था. जिस गेहूं और चना का इस्तेमाल पोषण आहार बनाने में किया जा रहा था, वह पहले से ही बारिश के पानी में भीगा हुआ था. बोरे फटे हुए थे तथा अनाज जमीन पर बिखरा हुआ था. इसके साथ ही उसमें कीड़े बिलबिला रहे थे.

इस तरह की घटिया सामग्री से पौष्टिक आहार का निर्माण बच्चों की सेहत के लिए घातक साबित हो सकता था. ऐसा अनाज विषैला हो सकता था तथा इसके सेवन से बच्चों को पेट में बीमारियाँ हो सकतीं थी.

समूह के सदस्यों ने बताया कि यही अनाज पीडीएस के राशन दुकान से दिया गया है. इसलिए हम इसी से पोषण आहार बना रहे हैं. वहीं, खाद्य निरीक्षक हरिहरन क्षत्री का कहना है कि गेहूं व चना खाने के योग्य नहीं हैं. इसका इस्तेमाल करना हानिकारक हो सकता है, कब से इस तरह का घटिया सामान उपयोग किया जा रहा था इसकी जांच की जायेगी.

गौरतलब है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में दिए जाने वाले रेडी-टू-ईट की गुणवत्ता पर पहले भी सवाल उठते रहें है. उल्लेखनीय है कि कुपोषण दूर करने के लिए गर्भवती, शिशुवती तथा आंगनबाड़ी के बच्चों को रेडी-टू-ईट का वितरण किया जाता है. आशंका है कि घटिया पोषण आहार हितग्राहियों का स्वास्थ्य सुधारने की बजाय उनकी सेहत खराब कर सकता है.

दरअसल पीडीएस के राशन दुकान से लेकर आंगनबाड़ी केंद्रों तक गुणवत्ता को ताक पर रखकर पौष्टिक आहार का निर्माण किया जा रहा है. जिम्मेदारों की लापरवाही तथा उदासीनता के कारण आज भी इलाके के आदिवासी कुपोषण के शिकार है. शासन-प्रशासन भले ही बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं की सेहत सुधारने के लिए बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन इन तमाम दावों की पोल आये दिन खुल रही है.

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