धान के ढ़ोल की पोल

संजय पराते:
छत्तीसगढ़ की विडम्बना है कि सरकारी उत्साह व जमीनी हकीक़त में जमीन-आसमान का अंतर होता है. अब धान खरीदी के सवाल को ही लें. छत्तीसगढ़ अकाल की भयंकर चपेट में है और 150 में से 117 तहसीलों की सरकारी आनावारी रिपोर्ट 50 पैसे से भी कम है, लेकिन रमन सरकार ने 70 लाख टन धान खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस प्रदेश में धान का औसत उत्पादन लगभग 115 लाख टन होता है. स्पष्ट है कि अकाल के कारण इस बार इसकी आधी पैदावार भी नहीं हुई है, लेकिन खरीदी का लक्ष्य कुल उत्पादन से भी ऊंचा है!! जाहिर है कि धान को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार जो ढ़ोल पीट रही है वह हकीकत से कोसों दूर है.

सरकार द्वारा धान खरीदी के घोषित आंकड़े यही बता रहे हैं. ढाई माह की खरीदी अवधि के प्रथम चरण में अभी तक 8.453 लाख टन धान की ही प्रदेश में खरीदी हुई है. खरीदी की यदि यही रफ़्तार रही, तो अधिकतम 40 लाख टन धान की ही खरीद की जा सकेगी. यह अनुमान भी वास्तविक धान उत्पादन की मात्रा के संगत में नहीं है.

लेकिन इस संभावित खरीदी के रास्ते में भी सरकार की नीतियां ही सबसे बड़ी बाधा है. अकाल राहत के नाम पर अभी तक कोई समुचित कदम नहीं उठाये गए हैं. इस प्रदेश में ऋणग्रस्तता किसानों की सबसे बड़ी समस्या है और एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में हर किसान परिवार पर औसतन 7.5 लाख रुपयों का क़र्ज़ चढ़ा हुआ है. यह क़र्ज़ देश में सबसे ज्यादा है. यह क़र्ज़ संस्थागत भी है और महाजनी भी. लेकिन क़र्ज़ मुक्ति तो दूर की बात, क़र्ज़ वसूली में राहत के लिए भी अभी तक कोई कदम नहीं उठाये गए हैं.

नतीजा यह हैं कि सहकारी समितियां किसानों से जबरन क़र्ज़ वसूल रही है. उत्पादन कम होने के कारण प्रत्याशित रकम किसानों के हाथों में नहीं आ रही है और इसलिए वे समितियों में धान बेचने से इनकार कर रहे हैं, भले ही वहां न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी हो. इसलिए निश्चित है कि सरकार अपने लक्ष्य का आधा भी धान इस वर्ष खरीद नहीं पाएगी.

लेकिन नीतिगत रूप से तो सरकार धान खरीदी व सार्वजनिक वितरण प्रणाली की झंझट से ही छुटकारा पाना चाहती है. इसलिए उसे कोई परेशानी नहीं है. परेशान तो वह किसान है, जिसे मंडियों या बाज़ार में लागत मूल्य भी नसीब नहीं, जिसका धान 1000 रूपये प्रति क्विंटल से ऊपर बिचौलिए देने को तैयार नहीं है. संस्थागत क़र्ज़ की अदायगी से बचने के लिए वह बाज़ार में लुटने को तैयार है, क्योंकि ‘ महाजनी क़र्ज़ ‘ के डंडे से उसे कोई निजात नहीं है. अकाल का मौसम महाजनों और साहूकारों के लिए ‘ अच्छे दिन ‘ लेकर आता है और इस वर्ष वे पूरे उत्साह से ‘ अकाल-उत्सव ‘ मनाने की तैयारी कर रहे हैं.

जो किसान सूखे की मार से कमोबेश कम प्रभावित हुए हैं, वे भी सुखी नहीं हैं, क्योंकि उनकी सरकारी खरीद पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध लगा हुआ है. राज्य सरकार ने यह नियम बनाया है कि किसी भी किसान से प्रति एकड़ 15 क्विंटल से ज्यादा धान ख़रीदा नहीं जाएगा, जबकि सिंचित क्षेत्र में उन्नत कृषि के कारण धान की औसत पैदावार 25 क्विंटल से ऊपर चली गयी है. ऐसे किसान भी बाज़ार में लुटने को तैयार बैठे हैं. इस प्रतिबन्ध को हटाकर सरकारी खरीद की मात्रा बढाने में इस सरकार की कोई रूचि नहीं है.

इन्हीं नीतियों का नतीजा है कि हर तीसरे दिन प्रदेश में एक किसान आत्महत्या कर रहा है. पिछले ढाई माह में दो दर्ज़न से ज्यादा किसानों की आत्महत्या व भुखमरी के कारण मौतें हो चुकी हैं. आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं में और तेज़ी आएगी.

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