छत्तीसगढ़ में टीबी के 25 हज़ार मरीज

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ में 25 हजार क्षय रोग (टीबी ) के मरीज हैं और यह संख्या बढ़ती चली जा रही है. हालांकि डॉट्स से काफी हद तक बीमारी पर नियंत्रण पाया गया है.

25 हजार वे मरीज हैं, जो सामान्य रूप से इस बीमारी के शिकार हैं, जबकि 250 से अधिक मरीज गंभीर रूप से पीड़ित हैं, जिन्हें मल्टी ड्रग रजिस्टेंट (एमडीआर) कहा जाता है. इनके इलाज के लिए रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जांच सुविधाएं और भर्ती सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई हैं. इसके बाद भी बीमारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.


राज्य टीबी कार्यक्रम अधिकारी डॉ. टीके अग्रवाल का कहना है कि प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्र में दवाइयां पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, मॉनीटरिंग भी की जा रही है.

24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है. 1819 में रॉबर्ट जोश नामक वैज्ञानिक ने टीबी के जीवाणु माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस की खोज की थी. आज विश्व में करीब 84 लाख मरीज इस बीमारी से लड़ रहे हैं, जिनमें से 13 लाख लोगों की मौत इस बीमारी से हुई है. अकेले भारत में 15 लाख लोग इस बीमारी के शिकार हैं. प्रति वर्ष 1 हजार लोगों की मौत होती है.

टीबी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बीमारी से गरीब तबके के लोग पीड़ित रहते हैं, विशेषकर खदानों में काम करने वाले, ड्रग्स का सेवन करने वाले और सेक्स वर्कर. अगर व्यक्ति एचआईवी पीड़ित हैं तो टीबी होने की संभावना 50 फीसदी तक बढ़ जाती है.

सीएमएचओ डॉ. केआर सोनवानी कहते हैं कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक जीवाणु से फैलती है और यह जीवाणु सीधे फेफड़ों में हमला करता है. अगर सही समय पर इसका इलाज नहीं किया गया तो यह भयावक रूप ले सकती है. इसका इलाज प्रत्येक शासकीय चिकित्सालयों में उपलब्ध है. डॉट्स की दवाइयां दी जाती हैं. इसका पूरा एक कोर्स होता है.

अगर खांसी सप्ताहभर से अधिक है तो तत्काल बलगम की जांच करवानी चाहिए. समय पर चिकित्सकीय सलाह नहीं ली गई तो फिर बीमारी तीसरी-चौथी स्टेज में पहुंच जाती है. फिर दवाइयां भी असर नहीं करतीं, जिसके बाद मरीजों को एमडीआर-टीबी सेंटर में भर्ती करवाया जाता है और दी जाने वाली दवाइयों का प्रभाव देखा जाता है.

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