छत्तीसगढ़: विकास का फायदा किसको?

रायपुर | विशेष संवाददाता: छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा विकास में सबसे ज्यादा खर्च करने के बाद भी छत्तीसगढ़िया विकास से कोसों दूर हैं. एक तरफ भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि छत्तीसगढ़ अपने विकास मूलक कार्य पर देश में सबसे ज्यादा खर्च करता है. यह खर्च छत्तीसगढ़ के जीडीपी का 21.4 फीसदी है. दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ विधानसभा में मंत्री बयान देते हैं कि पिछले तीन साल में छत्तीसगढ़ से करीब एक लाख लोगों ने आजीविका की खोज में पलायन किया है. कैसी विडंबना है कि विकास पर सबसे ज्यादा खर्चा करने वाले राज्य के बाशिंदों के द्वार तक विकास की छाया भी नहीं पहुंच पाती है. इसे कहते हैं खर्चा काफी पर उससे फायदा कुछ नहीं याने आमदनी अठन्नी खर्चा रुप्या. इससे संबंधित सवाल यह है कि फिर विकास के नाम पर किये जा रहें खर्च से किसे फायदा हो रहा है.

उल्लेखनीय है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी रपट में कहा है, ” छत्तीसगढ़ अपने कुल विकासमूलक व्यय जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में 21.4 प्रतिशत के साथ देश में पहले स्थान पर है, जबकि सभी राज्यों का औसत 13 प्रतिशत है. तेलांगाना, बिहार और उड़ीसा क्रमशः द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ स्थान पर हैं.”


इसी रपट में कहा गया है ” इसी तरह कुल ऋणभार और ब्याज भुगतान का प्रतिशत में भी छत्तीसगढ़ पहले पायदान पर है. छत्तीसगढ़ का कुल ऋणभार जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में 15.2 प्रतिशत है, जबकि सभी राज्यों का औसत 24.3 प्रतिशत है. ब्याज भुगतान भी छत्तीसगढ़ 0.9 प्रतिशत के साथ पहले स्थान पर है. ब्याज भुगतान के मामले में अन्य राज्यों का प्रतिशत 1.7 हैं.” इसका अर्थ है कि छत्तीसगढ़ को ब्याज भुगतान पर अन्य राज्यों से सबसे कम खर्चा करना पड़ता है.

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ से पिछले तीन सालों में लगभग एक लाख लोगों ने बेहतर आजिविका के साधन के लिए पलायन किया है. विधानसभा में विपक्ष के नेता टीएस सिंहदेव के सवाल के जवाब में राजस्व विभाग के मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने बताया कि वर्ष 2012 से 2015 तक 95924 लोगों ने राज्य से पलायन किया है.

उन्होंने कहा कि इनमें से ज्यादातर ऐसे मजदूर हैं जिन्होंने जो ज्यादा वेतन के कारण दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं. उन्होंने बताया कि वर्ष 2012-13 में 22149 मजदूरों ने, वर्ष 2013-14 में 27830 मजदूरों ने और वर्ष 2014-15 में 45945 मजदूरों ने छत्तीसगढ़ से दूसरे राज्यों में पलायन किया है.

मंत्री ने बताया कि वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के मध्य राज्य के जांजगीर चांपा जिले से 29190 मजदूरों ने, बलौदाबाजार जिले से 23005 मजदूरों ने, महासमुंद जिले से 16378 मजदूरों ने, बेमेतरा जिले से 10180 मजदूरों ने, राजनांदगांव जिले से 9419 मजदूरों ने, मुंगेली जिले से 6346 मजदूरों ने, रायगढ जिले से 625 मजदूरों ने, बिलासपुर जिले से 456 मजदूरों ने, बालोद जिले से 145 मजदूरों ने, जशपुर जिले से 118 मजदूरों ने तथा कोरबा जिले से 62 मजदूरों ने पलायन किया है.

भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ” छत्तीसगढ़ का विकास कार्यों पर व्यय अन्य राज्य की तुलना में सबसे अधिक है. छत्तीसगढ़ खाद्यान्न सुरक्षा, कृषकों को ब्याज मुक्त ऋण, कृषि के लिए निःशुल्क बिजली, मुख्यमंत्री ग्राम सड़क एवं ग्राम गौरव पथ योजना, वृहद, मध्यम एवं लघु सिंचाई योजनाएं, लाईवलीहुड कॉलेज, स्वास्थ्य बीमा, नोनी सुरक्षा जैसी विकास मूलक योजनाओं पर अपने संसाधनों से अधिकतम व्यय करने वाला राज्य हैं इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में व्यय जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसूचित जाति एवं जनजाति विकास, महिला एवं बाल विकास आदि शामिल है, में छत्तीसगढ़ देश में दूसरे स्थान पर है. सामाजिक क्षेत्र में व्यय जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में 14.7 प्रतिशत है, जो राज्यों की औसत 8.5 प्रतिशत से काफी अधिक है. विकासमूलक तथा सामाजिक क्षेत्र में अधिकतम व्यय के फलस्वरूप विगत दस वर्षों में राज्य के सामाजिक विकास सूचकांक जैसे शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर और बच्चों में कुपोषण के प्रतिशत में उल्लेखनीय कमी आई है.”

दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया करवाने के लिये केन्द्र द्वारा शुरु किये गये मनरेगा का बुरा हाल है. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार मागने वालों में से महज 5 फीसदी को ही यह नसीब होता है. छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है, “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, मनरेगा के तहत चालू वित्तीय वर्ष 2014-15 में अब तक छत्तीसगढ़ के 17 लाख ग्रामीणों को उनकी मांग के आधार पर रोजगार दिया जा चुका है. योजना के तहत सत्यासी हजार से भी अधिक मजदूर परिवारों को 100 दिन से लेकर 150 दिन तक का रोजगार प्राप्त हुआ. इसमें से 46 हजार 865 परिवारों को 100 दिवस और 40 हजार 845 परिवारों को 101 से 150 दिवस का रोजगार मिला. प्रदेश के 15 हजार 011 निःशक्त व्यक्तियों को भी रोजगार मुहैया कराया गया है.”

केन्द्र सरकार के आकड़े भी यही बयां करते हैं. केन्द्र सरकार के आकड़ों के अनुसार साल 2014-15 में 20 लाख 38 हजार 010 परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार की मांग की थी जिनमें से 17 लाख 42 हजार 042 परिवारों को रोजगार उपलब्ध करवाया जा सका है. जहां तक बात 100 दिनों के रोजगार उपलब्ध करवाने की बात है छत्तीसगढ़ में 47 हजार 019 परिवारों को ही 100 दिनों का रोजगार दिया जा सका है.

इसके अलावा पिछले साल छत्तीसगढ़ के आंगनवाड़ी जाने वाले 6.66 लाख बच्चे कुपोषित थे. छत्तीसगढ़ के आंगनवाड़ी केन्द्र के 32 फीसदी बच्चे कुपोषित थे. जी हां, छत्तीसगढ़ के 6 वर्ष तक के 20.84 लाख बच्चे आंगनवाड़ी जाते हैं उनमें से 32 फीसदी बच्चों अर्थात् 6.66 लाख का वजन अपने उम्र के लिहाज से कम है जिसे चिकित्सीय भाषा में कुपोषण माना जाता है. इस बात की जानकारी आंगनवाड़ी योजना पर जारी किये गये स्टेटस रिपोर्ट से मिलती है. गौरतलब है कि आंगनवाड़ी केन्द्रों से एकत्र किये गये आकड़ें अन्य किसी आकड़ें की तुलना में हकीकत के ज्यादा करीब है.

जाहिर है कि छत्तीसगढ़ में विकास मूलक कार्यो पर खर्च किये जाने का लाभ आम छत्तीसगढ़िया तक नहीं पहुंच पा रहा है तथा वह बकौल मंत्री अधिक वेतन के लिये पलायन कर रहा है. छत्तीसगढ़ में मनरेगा अपने घोषित उद्देश्यों के काफी दूर है. मनरेगा को शुरु ही इसलिये किया गया था कि इससे ग्रामीणों को उनके गांव में ही साल में 100 दिनों का रोजगार मिल सके जबकि जमीनी सच्चाई इससे कोसों दूर है. वहीं बच्चे कुपोषित हैं जो इस बात का परिचायक है कि आने वाली पीढ़ी शारीरिक तथा मानसिक रूप से कमजोर रहने वाली है. अब जरूरत आन पड़ी है कि विकास का फायदा आम छत्तीसगढ़िया तक पहुंचाया जाये.

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