#AjitJogi ममता बनर्जी बन पायेंगे ?

त्वरित टिप्पणी | अन्वेषा गुप्ता: अजीत जोगी ने कहा था, “हां, मैं सपनों का सौदागर हूं. मैं सपने बेचता हूं.” छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद अजीत जोगी ने यह बात कही थी. अजीत प्रमोद जोगी 1 नवंबर 2000 से लेकर 7 दिसंबर 2003 तक कुल 3 वर्ष 36 दिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे. इन 3 सालों में उनका कईयों से 36 का आकड़ा रहा तो इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की एक लंबी फौज का गठन किया जो पार्टी से ज्यादा उनके प्रति वफ़दार हैं. शायद उन्हीं के बल पर अजीत जोगी आज छत्तीसगढ़ के कोटमी में कांग्रेस आलाकमान तथा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के संगठन के नेताओं के ख़िलाफ़ ताल ठोकेंगे.

अजीत जोगी कांग्रेस से अलग होने का फैसला ले सकते हैं उनमें इसका माद्दा है परन्तु उससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या वे कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस के समान सफल हो सकेंगे. इतिहास गवाह है गांधी-नेहरु परिवार के ईर्द-गिर्द घूमने वाले कांग्रेस को जिसने भी छोड़ा वह राजनीति के अंधेरे गलियारे में खो गया या फिर से कांग्रेस का दामन थाम लिया. ममता बनर्जी इसकी अपवाद जरूर है.


पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने न केवल कांग्रेस छोड़ी बल्कि वह काम कर दिखाया जो असंभव माना जाता था. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब्दुल गनी खान चौधरी यह दावा करके-करते अतीत में खो गये कि वामपंथियों को बंगाल की खाड़ी में फेंक देंगे परन्तु उसे कर दिखाया ममता बनर्जी ने. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने तीन दशकों से ज्यादा समय तक बंगाल में सत्तारूढ़ रहने वाली वामपंथी सरकार को अब तक के सबसे कम सीटों पर सीमित कर दिया है.

ममता ने इसके लिये सिंगूर में जमीन बेदखली के खिलाफ़ लंबा अनशन किया तथा वहीं से वामपंथ की जड़े खोदना शुरु किया. कहने का तात्पर्य यह है कि ममता ने वामपंथ के उस बुनियाद ‘जमीन जोतने वाले की’ को हिलाकर रख दिया जिसके बल पर उन्होंने तीन दशकों तक राज किया था. याने ममता बनर्जी ने न केवल मुद्दे की बात उठाई बल्कि उस मुद्दे को चुनाव का मुद्दा बनाकर वामपंथियों को हराकर दम लिया.

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के पास ऐसे कौन से मुद्दे हैं जिनके बल पर वे कांग्रेस व भाजपा का विकल्प पेश कर सकते हैं. उनके पुत्र अमित जोगी द्वारा केवल यह कह देना कि जनता का समर्थन उऩकी सबसे बड़ी संपत्ति है कह देना आज के राजनीतिक दौर में नाकाफ़ी है. जनता उसे वोट देती है जिसमें उसे अपनी बेहतरी की उम्मीद होती है.

रमन सिंह या भूपेश बघेल की आलोचना करना उन्हें 2018 के विधानसभा में वोट नहीं दिला सकता है. जोड़-तोड़ करके तो हरगिज भी 90 सदस्यीय छत्तीसगढ़ विधानसभा में बहुमत हासिल नहीं किया जा सकता है. आज पूरे देश की नज़र अजीत जोगी के कोटमी में हो रहे सम्मेलन पर लगी रहेंगी कि वह कौन सी घोषणायें करते हैं. क्या नई पार्टी बनाने की घोषणा आज ही कर दी जायेगी या उसकी नींव रखकर आलाकमान से मोलभाव किया जायेगा. ममता बनर्जी के बारें में कहा जाता है कि वह अपने धुन की पक्की है एक बार जिस राह पर निकल जाती है उसमें मुकाम हासिल करने के बाद ही रुकती है.

सबसे महत्वपूर्ण होगा जोगी की रणनीति जिस पर उन्हें अपने संगठन को आगे ले जाना है. उऩके पास ऐसी कौन सी योजनायें हैं जिसके बल पर वे छत्तीसगढ़ की जनता को सपने दिखा सकते हैं. आज देखना है कि अजीत जोगी कितने सपनें बुनते हैं तथा उन्हें कहा तक छत्तीसगढ़ की जनता को बेच सकते हैं. जनता के लिये सपनें बुनना, उन्हें हकीकत में बदलने की चाह पैदा करना तथा उसके बल पर सत्तारूढ़ होना जोगी के सामने चुनौती है.

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