महिलाओं को बराबरी का अभाव

डॉ.चन्द्रकुमार जैन | समाज में पितृसत्तामक मूल्यों के चलते महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं मिल पा रहा है. पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का घट रहा अनुपात पहले से ही चेतावनी दे रहा था लेकिन 2011 की जनगणना के अनुसार यह सूचना, कि 0 से 6 वर्ष समूह के लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 71 लाख कम है, एक बेहद खतरनाक भविष्य की ओर संकेत करने लगी है. 2001 की जनगणना में यह कमी 60 लाख की, तथा 1991 की जनगणना में 42 लाख की थी. जन्म से लेकर मृत्यु तक आचार-संहिताओं की हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़ी हुई स्त्री पर अब जन्म से पूर्व ही अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है.

विज्ञान और तकनीक, जो मनुष्यता की मुक्ति का साधन बन सकते थे, समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मूल्यों के चलते स्त्रियों के, और इस तरह पूरे समाज के, विनाश का साधन बना दिए जा रहे हैं. लेकिन इस प्रवृत्ति के खिलाफ कोई भी संघर्ष तब तक कामयाब नहीं होगा जब तक कि उन मूल्यों और सोच को निशाना न बनाया जाए जो स्त्री के प्रति किसी भी तरह की बराबरी के भाव को अस्वीकार करते हैं.

जाति व्यवस्था की तरह ही पितृसत्तात्मक मूल्य भी हमारे समाज के जेहन और आदतों तक में काफी गहराई तक धंसे हुए हैं. यहां स्त्री आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक शोषण की भी शिकार है. घर के दायरे में कामों के बंटवारे का स्वरूप सामाजिक स्तर पर जातियों के बीच कामों के बंटवारे से मेल खाता है. यहां पुरुष सवर्ण तथा स्त्री दलित या शूद्र की भूमिका में होती है. जो काम तुच्छ और गंदे माने जाते हैं वे स्त्री के जिम्मे होते हैं. लेकिन इन्हीं कामों में से जो काम समाज में आर्थिक तौर पर लाभकारी हो जाते हैं, जैसे खाना पकाना, तो वहां पुरुष स्त्री को विस्थापित करके स्वयं विराजमान हो जाता है.

स्त्री के लिए सदियों से ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ से लेकर ‘ताड़न के अधिकारी’ तक सभी उद्धरण जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किए जाते रहे हैं, जो हमारे समाज के अवसरवादी और पाखण्डी स्वरूप को उजागर करता है. और कहना न होगा कि ऐसे मुद्दों की एक लंबी फेहरिस्त है जिसमें समाज का यह पाखण्ड बार-बार उजागर होता है.

शैशव से ही एक धार्मिक-सांस्कृतिक संरचना स्त्री का एक अलग व्यक्तित्व बनाने के, बल्कि उसके स्वाभाविक मानवीय व्यक्तित्व के हरण के, काम में लग जाती है. मूल्यों, आदर्शों और आचरण-व्यवहार के अलग मानदंड उसके व्यक्तित्व को रूपाकार देने लगते हैं और पल-प्रतिपल उसका पीछा करते रहते हैं, ताकि उसमें जीवन और उत्साह-उमंग का नामोनिशान भी मिटा दें.

विनय, कोमलता, शील, सौंदर्य, क्षमा आदि उसके लिए घोषित आभूषण उसकी हथकड़ियां-बेड़ियां बनकर उसके यत्किंचित प्रतिरोध को भी तोड़ देने की जुगत में लगे रहते हैं, ताकि वह कमजोर, निस्सहाय, निरुपाय लता बनकर हमेशा किसी पुरुष के आश्रय के लिए अभिशप्त हो. वह पुरुष पिता, भाई, पति या पुत्र कोई भी हो सकता है. इसके बावजूद अगर प्रतिरोध की कोई चिनगारी बच जाती है तो सभी शोषित-उत्पीड़ित समूहों की तरह स्त्री पर भी बलप्रयोग निर्णायक हथियार का काम करता है.

स्त्री पुरुषवादी सत्ता के साथ-साथ जातिवाद और पूंजीवादी बाजारवाद की भी शिकार है. ये सभी मिलकर एक जटिल जाल बुनते हैं जिसमें फंसी स्त्री को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता. जातिवाद भारतीय स्त्री की समस्या को एक ऐसा जटिल आयाम देता है जो दुनिया के अन्य हिस्सों से अलग दृष्टिकोण और संघर्ष की रणनीति तय करने की मांग करता है. इस दिशा में हीला हवाला अब ठीक नहीं. सही कदम उठाने में ही महिला दिवस मानाने की सार्थकता होगी.

(प्राध्यापक,दिग्विजय पीजी कालेज,राजनांदगांव. मो.9301054300)

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