छत्तीसगढ़ी लोक संगीत बहुत व्यापक

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ी लोक संगीत का दायरा इतना व्यापक है कि उस पर एक दिन में चर्चा नहीं हो सकती. विगत लगभग पांच दशकों से छत्तीसगढ़ी लोक नाटकों और लोक गीतों के क्षेत्र में काम कर रहे वयोवृद्ध संगीतकार खुमान साव ने कहा कि छत्तीसगढ़ी लोक संगीत का दायरा बहुत व्यापक है. उसे बताने के लिए पांच-दस मिनट तो क्या पांच दिन और पांच महीने भी कम होंगे. पुरखौती मुक्तांगन में तीन दिवसीय रायपुर साहित्य महोत्सव के तीसरे दिन आज अपरान्ह मुकुटधर पाण्डेय मंडप में छत्तीसगढ़ के लोक संगीत पर अत्यंत सुरूचिपूर्ण विचार गोष्ठी आयोजित की गयी.

इसमें प्रदेश के समृद्ध लोकरंग मंच, लोक गीत और लोक संगीत से जुड़े प्रसिद्ध कलाकारों ने अपने विचार व्यक्त किए. सर्वश्री खुमान साव, लक्ष्मण मस्तूरिया और श्रीमती ममता चन्द्राकर ने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत और श्री बलबीर सिंह कच्छ ने बस्तर अंचल के लोक गीतों के बारे में वक्तव्य दिया. सूत्रधार के रूप में लालराम कुमार सिंह ने परिचर्चा की शुरूआत की. सभी वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों और लोक संगीत के संरक्षण तथा संवर्धन की दिशा में सरकार के साथ-साथ समाज और कला जगत के संगठित सहयोग की जरूरत पर बल दिया.


दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित प्रसिद्ध सांस्कृतिक संस्था ‘चंदैनी गोंदा’ के संगीतकार साव ने आगे कहा छत्तीसगढ़ी लोक संगीत में रिदम अथवा ताल स्वाभाविक रूप से शामिल हैं. यहां के लोक गीतों के सुर और ताल शास्त्रीय संगीत वालों को भी आश्चर्य चकित कर देते हैं. इस सिलसिले में उन्होंने गौरा गीतों का उदाहरण दिया और कई दिलचस्प प्रसंग भी सुनाए.

लक्ष्मण मस्तूरिया ने इस बात पर चिन्ता जताई कि आज के समय में छत्तीसगढ़ी लोक गीत और लोक संगीत के नाम पर समाज में जो कुछ भी परोसा जा रहा है, उसमें मौलिकता नहीं है. वास्तव में देखा जाए, तो वह छत्तीसगढ़ का असली लोकगीत और लोकसंगीत नहीं है. मस्तूरिया ने कहा कि लोकगीत और लोक नृत्य केवल देखने की नहीं बल्कि अनुभव करने और जीवन में उतारने की चीज है.

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के लोगों को अपनी लोक संस्कृति, अपने लोक गीत और लोक संगीत को लेकर आत्म गौरव होना चाहिए. लक्ष्मण मस्तूरिया ने छत्तीसगढ़ी के पारम्परिक लोक गीतों को नया स्वरूप देने और उन्हें लोकप्रिय बनाने में चंदैनी गोंदा संस्थापक स्वर्गीय श्री रामचंद्र देशमुख के योगदान को विशेष रूप से याद किया.

ममता चन्द्राकर ने छत्तीसगढ़ के पारम्परिक सुआ गीतों पर अपने विचार व्यक्त किए. बस्तर से आए बलवीर सिंह कच्छ ने पुरखौती मुक्तांगन में साहित्य महोत्सव के आयोजन और मुक्तांगन परिसर में बस्तर अंचल की लोक संस्कृति के सुरूचिपूर्ण प्रदर्शन की तारीफ करते हुए इसके लिए राज्य सरकार को धन्यवाद दिया. बलवीर सिंह कच्छ ने बस्तर अंचल के लोक गीतों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला. उन्होंने वहां के प्रसिद्ध लोक कवि स्वर्गीय श्री रघुनाथ महापात्र की रचनाओं को भी याद किया.

सूत्रधार के रूप में लालराम कुमार सिंह ने सभी प्रतिभागियों का परिचय दिया. लालराम कुमार सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ का लोक संगीत अथाह सागर की तरह है. यहां जन्म से मृत्यु तक सभी रीति-रिवाजों में इसकी अनुगूंज सुनायी देती है. लालराम कुमार सिंह ने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत को लोक प्रिय बनाने में स्वर्गीय दाऊ रामचंद्र देशमुख और स्वर्गीय दाऊ महासिंह चन्द्राकर के योगदान का भी उल्लेख किया.

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