78 साल लंबी यह रेल पटरी

सरगुजा संवाददाता

अंबिकापुर: चिरमिरी-बरवाडीह के इलाके से रेलगाड़ी गुजरने की खबर जिन लोगों ने अपने बचपन में सुनी थी, उनमें से अब शायद ही कोई जिंदा हो. 78 साल पहले यह रेल लाइन बननी शुरु हुई थी. जिन लोगों ने रेल पटरी बिछानी शुरु की और जिन्होंने रेल गाड़ी पर सवार होने का सपना देखा, वे सब के सब मर-खप गये. लेकिन यह इंतजार अब जा कर कहीं खत्म हुआ है.

इस साल के रेल बजट में जिन इलाकों में रेल पटरी बिछाने की योजना को स्वीकृति मिली है, उनमें छत्तीसगढ़ के चिरमिरी से लेकर झारखंड के बरवाडीह तक का हिस्सा भी शामिल है. चिरमिरी-बरवाडीह रेल लाइन के विस्तार के बाद 21 लाख की आबादी वाला जनजातीय बाहुल्य सरगुजा का क्षेत्र सीधे मुंबई, हावड़ा से जुड़ जाएगा. अन्य मार्गों की अपेक्षा इस मार्ग से मुंबई-कोलकाता की दूरी चार सौ किलोमीटर कम हो जाएगी.

हालांकि ऐसा मानने वालों की संख्या भी अधिक है, जिनकी राय है कि चिरमिरी-बरवाडीह रेल लाइन का काम यात्रियों की सुविधाओं के लिये नहीं, खनिजों के परिवहन के उद्देश्य से किया जा रहा है. प्राकृतिक संसाधनों पर नजर रखने वालों की सुविधाएं प्राथमिक होंगी, यात्रियों की नहीं खनिज संपदा से भरे इस क्षेत्र में कोयला व बाक्साइट प्रचुर मात्रा में हैं. मैनपाट और सामरी जैसे पिछड़े इलाकों में जहां खनिज हैं, रेल मार्ग के विस्तार के बाद वहां से खनिज संसाधनों के परिवहन में सुगमता होगी.

182 किलोमीटर इस रेल लाइन का विस्तार अंबिकापुर से शुरू होगा क्योंकि चिरमिरी तक पहले से लाइन बिछी हुई है. 2007 में इस संबंध में जो सर्वे रिपोर्ट पेश की गई थी, उसमें परियोजना पर करीब छह सौ करोड़ खर्च होने का अनुमान था. करीब छह साल में लागत दोगुनी हो गई है. अब परियोजना पर 1137 करोड़ खर्च आएगा. अधिकारियों का कहना है कि तेजी से काम हुआ तो तीन-चार साल में रेल मार्ग का विस्तार हो जाएगा.

चिरमिरी बरवाडीह रेल लाइन की मंजूरी लंबे संघर्ष का परिणाम है. द्वितीय विश्व युद्ध को देखते हुए अंग्रेजों ने 1935-36 में यह परियोजना शुरू की थी. मकसद था जबलपुर-कटनी रेल लाइन को रांची बडक़ाकाना, बरवाडीह से जोडक़र मुंबई व कोलकाता के बीच की दूरी अन्य रेल मार्गों की अपेक्षा चार सौ किलोमीटर कम करना. बरवाडीह से बलरामपुर के सरना तक अर्थ वर्क के अलावा कई जगहों पर पुल-पुलियों के काम भी कराए गए. चनान और कन्हर नदी पर इसके पुल भी बन चुके थे, जो आज भी देखे जा सकते हैं. इसी बीच दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और परियोजना का काम प्रभावित होने लगा. अंग्रेजों ने आगे चलकर इस ओर से ध्यान हटा लिया.

भारत के पहले प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरु ने 1947-48 में इस रेल पथ की उपयोगिता को समझा और निर्माण कार्य को स्वीकृति दे दी. लेकिन 1950 के आस-पास वित्तीय कठिनाइयों के कारण इसे बंद कर दिया गया. 60 के दशक में तत्कालीन रेल मंत्री जगजीवन राम ने क्षेत्रवासियों की मांग पर परियोजना को स्वीकृति दी लेकिन इस बार भी परियोजना पूरी नहीं हुई. 1964 के आते तक काम एक बार फिर बंद हो गया. चीन और पाक के साथ युद्ध के कारण परियोजना प्रभावित रही.

बाद में इस इलाके में रेल लाइन विस्तार को लेकर विभिन्न संगठनों की 434 दिनों की अबतक की सबसे बड़ी क्रमिक भूख हड़ताल चली. बिश्रामपुर से अंबिकापुर तक करीब 20 किलोमीटर रेल लाइन आने में काफी समय लग गया. 2006 में अंबिकापुर तक रेल लाइन आने के बाद बरवाडीह की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया. कई बार आंदोलन हुए. आंदोलन का सिलसिला हर साल बजट से पहले चला. लेकिन अब जा कर 78 साल बाद परियोजना की मंजूरी से लोगों में हर्ष है.

इस रेल मार्ग में कई रेलवे स्टेशन प्रस्तावित हैं. इनमें चिरमिरी-बरवाडीह रेल मार्ग में अंबिकापुर से आगे परसा, बरियों, राजपुर रोड, कर्रा, पस्ता, झलरिया, दलधोवा, सरनाडीह शामिल हैं. जबकि झारखंड के बरगढ़, नौकी, बिंदा, पारो, हुतार व बरवाडीह स्टेशन होंगे. बरवाडीह झारखंड के पलामू, गढ़वा और लातेहार जिले का पहले से ही एक महत्वपूर्ण स्टेशन है. छत्तीसगढ़ में इस रेल लाइन का विस्तार अंबिकापुर से होगा क्योंकि चिरमिरी तक पहले से लाइन बिछी हुई है.

उम्मीद की जा रही है कि आज के जो बच्चे 2013-14 के रेल बजट में चिरमिरी-बरवाडीह रेल लाइन बनने और उस पर रेल गाड़ी दौड़ने की बातें सुन रहे हैं, किशोरावस्था में वे इस मार्ग पर दौड़ने वाली रेलगाड़ियों में सफर भी कर सकेंगे.

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