कोयला खदान और सांसद जी की ब्लैकमेलिंग

प्रकाश चन्द्र पारख | अुनवादः दिनेश कुमार मालीः कोयला मंत्रालय के सचिव का दायित्व संभालते ही मेरे सामने बड़ी चुनौती थी, देश में कोयले की कमी को पूरा करना. तापीय संयंत्रों में कोयले के अभाव ही वजह से हाहाकार मचा हुआ था. इस समस्या का समाधान करने के लिए मैंने सभी कोल कंपनियों के अध्यक्षों की एक बैठक बुलाई, ताकि कोयले की आपूर्ति हेतु कोई ठोस रणनीति बनाई जा सके. बीसीसीएल और सीसीएल में बहुत सारे छोटे और छिछले डिपोजिट थे.

बैठक में एक सुझाव यह आया कि अगर इन छोटे-छोटे डिपोजिटों को खुली बोली के माध्यम प्राइवेट ठेकेदारों को दे दिया जाता है तो कोल इंडिया को छोटे-छोटे उपकरणों की खरीददारी में निवेश नहीँ करना पड़ेगा और प्राइवेट ठेकेदार कम समय में यह कोयला निकालकर सीआईएल को दे देंगे. दो डिपॉजिट के लिए खुली बोली द्वारा ठेकेदार निश्चित किए गए. एक सुबह इन खदानों का काम शुरू होने के बाद धनबाद के कांग्रेस के सांसद श्री चन्द्रशेखर दूबे का मेरे पास फोन आया. श्री दूबे कोयला मंत्री संसदीय समिति के सदस्य थे.


हमारी फोन पर जो बातचीत हुई वह इस प्रकार से थी-
दूबे- सेक्रेटरी जी, मेरी इजाजत के बिना अपने बीसीसीएल मे आऊटसोर्सिंग के आदेश कैसे दे दिए?
मैं- दूबे जी, यह कंपनी के हित में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर का फैसला है. मंत्रालय की इसमें कोई भूमिका नहीँ है.
दूबे – नहीँ, मुझे बताया गया है कि यह आपका निर्णय है.
मैं – यह सीआईएल का निर्णय है, जिससे मैं सहमत हूँ.
दूबे – मगर मेरी जानकारी के बिना सीआईएल यह निर्णय कैसे ले सकती है? मैं इस क्षेत्र का सांसद हूँ.
मैं – दूबे जी, यह कंपनी के प्रबंधन का निर्णय है. वे एरिया के सांसद को क्यों पूछेंगे? मैंने भी स्टेट लेवल की कई कंपनियों को संभाला है. मैंने कभी भी एम.एल.ए. और एस.पी. से नहीँ पूछा कि कंपनी कैसे चलाई जाए?
दूबे – ऐसा आपके आंध्रप्रदेश में हो सकता है. हमारे झारखंड में ऐसा नहीँ होता है. यहाँ का पत्ता भी हिलता है तो हमारी मर्जी से. मैं चाहता हूँ कि तुरंत आऊट सोर्सिंग बंद करें, अन्यथा मैं बंद कर दूँगा.

यह थी कोयला मंत्रालय के सेक्रेटरी यानि मेरी धनबाद के सांसद चंद्रशेखर दूबे की टेलीफोनिक बातचीत. कितने अहंकार और धमकी भरे शब्द थे दूबे के! क्या प्रशासन इतना निकम्मा हो चुका था कि ऐसे धमकी देने वाले सांसदों के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की जा सकती? बात एकदम सही थी. अपनी जुबान के अनुसार दूबे के समर्थकों ने दूसरे दिन खदान का काम बंद करवा दिया. बीसीसीएल के सीएमडी भट्टाचार्य ने मुझे बताया कि दूबे के समर्थक ठेकेदारों के कामगारों को भीतर नहीँ जाने दे रहे हैं.

मैंने झारखंड के मुख्य सचिव श्री शर्मा से बातचीत की और कहा कि जिलाधीश को आप निर्देश दें कि ठेकेदार के आदमी काम कर सकें. मगर मुख्य सचिव से बातचीत करने का कोई फायदा नहीँ हुआ. खदान का काम ऐसे ही बंद रहा, जिलाधीश भी कुछ नहीँ करवा पाए. उल्टा, धमकी भरे लहजे में श्री दूबे ने मुझे फोन किया और बोले, ‘‘सेक्रेटरी जी, मैंने काम बंद करवा दिया है. मुख्य सचिव को बोलने से कोई फायदा नहीँ है. झारखंड में न तो मुख्य सचिव की चलती है और न ही जिला मजिस्ट्रेट मेरे आदमियों को वहाँ से हटा सकता है.’’

आप समझ गए होंगे कितने खूँखार गुण्डे पाल रखे होंगे दूबे जी ने. जब जिला-प्रशासन और राज्य-प्रशासन ही असक्षम हैं उन्हें संभालने में तो सीआईएल प्रबंधन क्या कर सकता था? मैंने पहली बार अनुभव किया कि झारखंड में सिविल सर्विस का कोई भी अधिकारी, चाहे वह कितना भी सीनियर क्यों न हो, कोयला माफियाओं से टक्कर नहीँ ले सकता.

दूबे जी कि जिद्द के आगे किसी की नहीँ चली. दो-तीन हफ्तों तक खदानें बंद रही. बहुत सारा कोकिंग कोल जल कर बर्बाद हो गया. मुझे रह-रहकर अपने कलेक्टर वाले दिन याद आने लगे. क्या आंध्रप्रदेश में ऐसा कभी हो सकता था? ऐसे मामलों को निपटने के लिए कलेक्टर की शक्तियाँ ही पर्याप्त होती थी. जबकि झारखंड में एक अड़ियल सांसद और उसकी इतनी हिम्मत? राज्य का मुख्य सचिव भी उसके सामने बौना पड़ रहा था.

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बहुत समय से बीसीसीएल में अवैध कब्जेदारों ने मकान दबाए हुए थे. न केवल अवैध कब्जा, बल्कि बीसीसीएल के कर्मचारियों की तरह उन्हें सारी सुविधाएँ मिलती थी जैसे फ्री बिजली, पानी आदि. कोयला माफियाओं और राजनैतिक संरक्षण मिलने के कारण कंपनी उन्हें खाली नहीँ करवा पा रही थी. दूबे जी को भी बीसीसीएल का एक मकान चाहिए था. दूबे जी सांसद थे, यह क्या कम था मकान पाने के लिए? मगर श्री भट्टाचार्य ने उनका यह अनुरोध अस्वीकार कर दिया.

बुरी तरह से खफा हो गए दूबे जी. भट्टाचार्य को बेइज्जत करना और उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाना शुरू कर दिया उन्होंने. देखते-देखते दूबे अवैध कब्जेदारों का संरक्षक बन गया. सीएमडी भट्टाचार्य ने मुझे दूबे की सारी गतिविधियों एवं उनकी अवैध मांगों के बारे में पत्र लिखा. यह पत्र पढ़कर आप आराम से इस निष्कर्ष पर पहुँच जाएँगे कि किस तरह एक सांसद अपने आपको कानून के ऊपर समझने लगता है.

दूबे जी का ही नहीँ, भारत के हर कोने में यही हाल है. सरकार लाचार है, असमर्थ है कानून व्यवस्था लागू करने में.

हर स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधि कांट्रेक्ट मैनेजमेन्ट में दखलंदाजी करने लगे हैं. सरकार के कामों में ही नहीँ, सरकारी उपक्रमों में ही नहीँ, वरन् प्राइवेट कंपनियों में भी अनवरत हस्तक्षेप करने लगे हैं. ये प्रतिनिधिगण सब हफ्ता वसूल करने वाले बन गए हैं. अपराध और समानांतर इकोनोमी में उनकी अहम भूमिका रहती है.

धनबाद में कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए कोयला माफियाओं और उनके राजनैतिक संरक्षकों से समझौता करना पड़ता है.

रिटायर होने के बाद मुझे एक अंडर ग्राउंड खान में हुई दुर्घटना की इंक्वारी के सिलसिले में धनबाद जाना पड़ा था. पता चला कि कलेक्टर का दूबे जी के साथ युद्ध चल रहा था. एक दिन दूबे जी ने कलेक्टर के ऑफिस पर ताला लगा दिया. कलेक्टर के ऑफिस पर ताला? कितनी बड़ी बात थी? यह तो साफ-साफ कानून का उल्लंघन था. उन्हें तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए था. मगर हुआ क्या? उसकी गिरफ्तारी के बदले में कलेक्टर का तबादला कर दिया गया.

अब सोचिए, यह है हमारा जिला प्रशासन, जो खुद ही सुरक्षित नहीँ रह पाता है तो दूसरों को क्या सुरक्षा प्रदान करेगा? वे दिन अब लद गए, जब पुराने जमाने में मुख्यमंत्री अपने अधिकारियों का बचाव करते थे. मधु कोड़ा जैसे मुख्यमंत्री से कोई कलेक्टर या पुलिस अधीक्षक यह आशा लगाए कि कोयला माफियाओं से टक्कर लेने में वह उसे बचाएगा तो यह सोचना निरर्थक है.

बीसीसीएल में ई-ऑक्शन की सफलता ने कोयला माफियाओं को पूरी तरह परेशान कर दिया था. अगर ई-ऑक्शन कोल इंडिया की सारी कंपनियों में फैल गया तो माफियाओं और उनके राजनैतिक संरक्षकों के लिए अवैध आय वसूलना मुश्किल हो जाएगा. कोयला माफियाओं में मची खलबली के कारण मुझे मंत्रालय से हटाने की कोशिश की जाने लगी.

दूबे जी मुझसे खफा थे क्योंकि बीसीसीएल के सीएमडी को मैं कंपनी के कामों में स्वच्छता लाने के लिए भरपूर सहयोग कर रहा था. दूबे जी ने नवंबर की शुरूआत में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि स्विस बैंक में मेरा एकांउट है और बीच-बीच में मैं स्विट्जरलैंड जाता रहता हूँ. सीबीआई या संसदीय समिति मेरे संदिग्ध कारनामों की जाँच करे. ये हैं हमारे सांसद, कुछ अच्छा काम करने जाओ तो आपके पीछे ऐसे लगते हैं जैसे किसी अरण्य में विक्रमादित्य के पीछे बैताल.

दूबे जी के पत्र के जवाब में कैबिनेट सचिव को स्पष्ट शब्दों में मैंने लिखा कि आप सीबीआई या अन्य एजेंसी द्वारा जाँच करवाएँ, किन्तु यदि आरोप सत्य नहीँ पाए जाते हैं तो दूबे को कानूनन खामियाजा भुगतना होगा क्योंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी की इज्जत का सवाल है. मैंने उनसे यह भी गुजारिश की कि दूबे के अनुचित व्यवहार को उचित कार्यवाही के लिए लोकसभा के स्पीकर के ध्यान में भी लाया जाए.

दूबे का पत्र अभी थमा ही नहीँ था कि एक सांसद गिरधारी यादव ने भी ऐसा ही एक पत्र लिखा.

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