स्वच्छता अभियान में निरंतरता जरूरी

नई दिल्ली | एजेंसी: प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन स्वागत योग्य कदम है. देश को यदि अगले पांच साल में गंदगी से मुक्त करना है तो काफी कुछ और काफी तेजी से करने की जरूरत है. विशेषज्ञों ने जहां प्रधानमंत्री के अभियान की सराहना की, वहीं कहा कि उन्हें स्वच्छता के लिए नई नीति लानी चाहिए.

टॉक्सिक वाच एलायंस के संयोजक गोपाल कृष्णा ने कहा, “स्वच्छ भारत मिशन में दृष्टि का अभाव है. स्वच्छता को चर्चा केंद्र में लाने के लिए मोदी की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब इस मिशन का विश्लेषण किया गया, तो पता चला कि इसमें कई खामियां हैं.”

उन्होंने कहा कि सरकार लगातार कचड़ा प्रबंधन को नजरंदाज कर रही है. सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो कि सफाई अभियान के बाद जो कचड़ा इकट्ठा हो उसे जलाया न जाए और न ही लैंडफिल के रूप में उसे कहीं दबाया जाए.

प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को वाल्मीकि नगर में झाड़ू लगाकर स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की.

कचरा प्रबंधन के लिए काम करने वाली संस्था चिंतन की निदेशक भारती चतुर्वेदी ने कहा कि देश में हर साल छह करोड़ टन कचरा पैदा होता है.

उन्होंने कहा, “सोच बदलने की जरूरत है. कूड़े को कचरा प्रबंधन की दृष्टि से नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन के लिए संसाधन के रूप में देखे जाने की जरूरत है.”

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने कहा कि पर्यावरणीय मुद्दे को एक-दो दिन में नहीं निपटाया जा सकता है. इसे सही तरीके से कार्यान्वित किए जाने की जरूरत है.

पाठक ने कहा, “ऐसा देखा गया है कि ये काम सिर्फ शुरू में तत्परता से किए जाते हैं. किसी भी अभियान को सफल बनाने के लिए सही मूल्यांकन के साथ प्रभावी कार्यान्वयन जरूरी है.”

स्वच्छता का अधिकार अभियान के राष्ट्रीय संयोजक राजेश उपाध्याय ने कहा कि इसमें खर्च की जाने वाली राशि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

उन्होंने कहा, “धन की कमी और ऐसे संस्थानों की सहभागिता की कमी सबसे बड़ी बाधा है, जो सरकारी नीतियों और कार्यान्वयन के बीच की खाई को भर सकते हैं.”

उन्होंने कहा कि बजटीय आवंटन से सिर्फ सफाईकर्मियों की संख्या नहीं बढ़ाई जानी चाहिए, बल्कि उसका उपयोग शिक्षा और जागरूकता फैलाने में भी किया जाना चाहिए.

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