नक्सल गढ़ में तनाव से मरते जवान

नई दिल्ली | संवाददाता: पिछले पांच साल में नक्सली इलाकों में सीआरपीएफ के 870 जवान तनाव के कारण मारे गये हैं. इसकी तुलना में नक्सलियों द्वारा मारे गये सीआरपीएफ के जवानों की संख्या 323 है. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के सांसद मोतीलाल वोरा द्वारा पूछे गये सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी ने बताया कि 2009 के जनवरी माह से 2013 के दिसंबर माह तक नक्सली इलाकों में तैनात सीआरपीएफ के 642 जवान हृदयाघात से मारे गये तथा 228 ने अवसाद के कारण आत्महत्या कर ली. इसी अवधि में मलेरिया से मरने वाले जवानों की संख्या 108 है.

उल्लेखनीय है कि हृदयाघात तथा अवसाद के लिये तनाव को मुख्य कारण माना जाता है. क्या कारण है कि चिकित्सीय मानकों के अनुसार फिट सीआरपीएफ के जवान हृदयाघात से मारे जाते हैं. यदि हृदय की बीमारी किसी अन्य कारणों जैसे वसा के अधिक जमाव के कारण होती है तो उस जवान को निश्चित तौर पर उच्च रक्तचाप की बीमारी होनी चाहिये. इसके अलावा अनियंत्रित डायबिटीज भी हृदय रोग का कारण हो सकता है. दोनों ही स्थिति में उच्च रक्तचाप तथा अनियंत्रित डायबिटीज वाले सीआरपीएफ के जवान चिकित्सीय जांच में फिट नहीं बताये जा सकते हैं. जाहिर है कि हृदयाघात से मौतों तथा आत्महत्या से होने वाली मौतों के लिये तनाव जिम्मदार है.

इसी के साथ सवाल किया जाना चाहिये कि आखिर क्यों नक्सल इलाकों में जाते ही जवान तनावग्रस्त हो जाते हैं. यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि नक्सली इलाकों में सीआरपीएफ तथा पुलिस की पोस्टिंग को ‘पनिशमेंट’ के रूप में देखा जाता है. कई नक्सल प्रभावित इलाकों में खाने की कौन कहे पीने के पानी तक की ठीक से व्यवस्ता नहीं होती है.

केन्द्र और राज्य सरकारों का दावा है कि हृदय रोग की महामारी की रोक-थाम के लिये कई कदम उठाये जा रहें हैं ऐसे में नक्सल इलाकों में तैनात किये जाने वाले सीआरपाएफ के जवान कैसे इससे अछूते रह गये यह भी एक बड़ा सवाल है. जाहिर है कि सीआरपीएफ के जवानों को जीवन शैली के कारण होने वाली इन बीमारी से बचाना सरकारों का कर्त्वय है.


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