देशद्रोह के कानूनन प्रावधान पर बहस

जेएनयू मामलें के बाद ‘देशद्रोह’ के कानूनी प्रावधानों पर बहस छिड़ गई है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों को देशद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किए जाने के बाद कानूनविदों औा बुद्धिजीवियों में इस बात लेकर चर्चा है कि क्या भरतीय दंड संहिता के इस विवादास्पद प्रावधान को हटा देना चाहिए? राजनीति शास्त्र की विद्वान नीरा चंडोक ने बुधवार को ‘कानून और देशद्रोह की राजनीति’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में कहा, “देशद्रोह वार्तालाप ठप्प करने वाला है. आप कश्मीर में दमन, जनजातीय इलाकों में क्या हो रहा है, सरकार के कामकाज और उसके वादे से पीछे हटने आदि के बारे में बात नहीं कर सकते हैं जबकि ये सब किसी भी तरह से देशद्रोही बातें नहीं हो सकती हैं.”

वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने कहा कि बोलने की स्वतंत्रता अन्य मौलिक अधिकारों के समान निरपेक्ष नहीं हैं. इसे कुछ आधारों जैसे विधि व्यवस्था, मानहानि और अदालत की अवमानना का ध्यान रखते हुए प्रतिबंधित किया जा सकता है.

उन्होंने कहा, “उपरोक्त में से कोई भी देशद्रोह की श्रेणी में आ सकता था, हालांकि इन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(2) से हटा दिया गया. परन्तु आईपीसी के उपबंध 124ए के तहत देशद्रोह का मामला बनता है, लेकिन इसकी व्याख्या पूर्णत: अदालत पर छोड़ दिया गया है. ”

उल्लेखनीय है कि आईपीसी की धारा 124ए में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि अगर कोई बोलकर या लिखकर या इशारों में या दृश्य प्रतिरूपों या अन्य तरह से घृणा फैलाता है या अवमनना करता है या सरकार के खिलाफ वैमनस्यता फैलाने का काम करता है तो इस उपबंध के तहत उसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है. जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में उसकी सजा तीन साल और बढ़ सकती है.

इस मुद्दे पर ओपी जिंदल विश्वविद्यालय, सोनीपत के प्रोफेसर विश्वनाथन ने कहा कि देशद्रोह वाला प्रावधान का प्रयोग विरोधियों के मुंह बंद करने और जेल में डालने के लिए नहीं होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि जेएनयू के छात्रों ने क्या कहा यह अदालत में साबित होना अभी बाकी है इसलिए आवेश में आने की जरूरत नहीं है. मीडिया के विशेषज्ञ सुहास ब्रोकर ने कहा कि देशद्रोह औपनिवेशिक काल की है. आधुनिक मुक्त समाज में इसकी कोई जगह नहीं है.(एजेंसी)

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