या इलाही ये माजरा क्या है

विष्णु खरे
एक भारतीय की हैसियत से 1952 से अपने सारे आम और विधान-सभा चुनाव देखता-सुनता आया हूँ,पत्रकार के रूप में उन पर लिखा भी है, जब से मतदाता हुआ हूँ, यथासंभव वोट भी डाला है, दिल्ली में 42 वर्ष रहा हूँ, लेकिन वहाँ से आज जो नतीज़े आए हैं वह विश्व के राजनीतिक इतिहास में अद्वितीय हैं और गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में तो दर्ज़ किए ही जाने चाहिए.

एक ऐसी एकदम नई पार्टी, अपनी पिछले वर्ष की राजनीतिक गलतियों के कारण जिसने देशव्यापी क्रोध,मोहभंग और कुंठा को जन्म दिया था और लगता था कि वह कहीं अकालकवलित न हो जाए,अपने जन्मस्थान में एक अकल्पनीय चमत्कार की तरह लौट आई है. पिछले एक वर्ष में ‘आप’ ने वह सब देख लिया और दिखा दिया है जिसके लिए अन्य वरिष्ठ पार्टियों को कई दशक लग गए. भारतीय परम्परा में मृत्यु या उसके मुख से छूट जाने की कई कथाएँ हैं लेकिन ‘आप’ ने ग्रीक मिथक के फ़ीनिक्स पक्षी की तरह जैसे अग्नि से पुनर्जन्म प्राप्त किया है.

निस्संदेह,सारा श्रेय ‘आप’ के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जाता है जिन्होंने इतने उतार-चढ़ाव के बावजूद पार्टी और अपने-आप में विश्वास बनाए रखा. लेकिन मेरे लिए दिल्ली के मतदाताओं के इस फ़ैसले को समझना बहुत सुखद और आश्चर्यजनक रूप से कठिन है. अभी पिछली मई में ही उन्होंने ‘आप’ को नकार दिया था और दिल्ली ‘भाजपा’ को सौंप दी थी. कहा जाता है कि भारतीय मतदाता के केन्द्रीय चुनाव के दाँत अलग होते हैं और विधान-सभाओं के अलग. लेकिन पिछले सिर्फ़ नौ महीनों में क्या हुआ कि उसने उन्हीं दाँतों से दिल्ली में ही ‘भाजपा’ को इस कदर चबा डाला ?

दिल्ली के मतदाता ने न सिर्फ़ ‘आप’ को लेकर अपने ग़ुस्से को वापस लिया बल्कि असाधारण वयस्कता और क्षमा-भाव का प्रदर्शन करते हुए उसे ऐतिहासिक विजय प्रदान की.लेकिन जो क्रोध अभी कुछ ही महीनों पहले उसे ‘आप’ पर था उससे कई गुना भयावह और क्रूर दंड उसने ‘भाजपा’ और काँग्रेस को दिया.दिल्ली के इतिहास में कांग्रेस पहली बार नेस्तनाबूद-सी हो गई. लेकिन मुझे लगता है कि उसी अनुपात में उसने ‘भाजपा’ को भी बेवुजूद कर डाला है. इसे किरण बेदी के ग़लत चुनाव, पार्टी की अंदरूनी कलह, खुली बग़ावत आदि के बहानों से नहीं टाला जा सकता. दिल्ली के अवाम ने ‘भाजपा’ को ज़िबह कर दिया है- कांग्रेस के साथ उसने जो किया है वह सिर्फ़ मरे हुए को मारने की तरह है.

दरअसल दिल्ली में ‘भाजपा’ की इस लज्जातीत पराजय का कूड़ेदान पूरे तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्रह-लाख की ब्रांडेड ‘बराक’ सूट-शैली पर उलटाया जा सकता है.’एनकाउंटर’ विशेषज्ञ अमित शाह की तो कोई दूसरी छवि अभी जनता में बन ही नहीं पाई है और दिल्ली के वोटर उनसे क्यों आतंकित होने लगे ? लेकिन पिछले कुछ महीनों मैं कस्बों में रहा हूँ और देश में हजारों किलोमीटर का सफ़र रेल और बस से किया है और स्पष्ट देखा-सुना है कि आम लोगों का मोहभंग नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार से हो चुका है. दरअसल केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी में बदलाव के अलावा जनता के जीवन में बेहतरी के लिए कोई बदलाव नहीं आया है. यदि बढ़ी है तो कथित हिन्दुत्ववादी ताक़तों की दबंगई और गुंडागर्दी बढ़ी है- भ्रष्टाचार, अपराध, महँगाई, ग़रीबी, नौकरशाही, नेताओं, सेठों और बिल्डरों की माफ़िआओं के साथ अफसरों और पुलिसकर्मियों की मिलीभगत आदि बदतर हुए हैं.

कानून और व्यवस्था को कोई डर किसी को नहीं है. कस्बों और छोटे शहरों में लगभग अराजकता का माहौल है. वहाँ के अखबारों को पढ़ना एक भयावह,आँखें खोल देने वाला अनुभव है. धर्म का सबसे पतित रूप सब जगह काबिज़ हो चुका है. हिन्दुत्ववादी ताक़तों और उनके कट्टर समर्थकों के अलावा कोई खुश नहीं है. लोग खुल्लमखुल्ला नरेंद्र मोदी की आलोचना और ठिठोली करने लगे हैं. इस जीत के साथ अरविन्द केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के हाथों वाराणसी में अपनी हार का हिसाब बराबर से भी ज़्यादा कर लिया है.

दिल्ली के परिणामों ने निस्संदेह मोदीशाही और हिन्दुत्ववादियों की नींद हराम कर दी है. यह तूर्यनाद-सन्देश सिर्फ़ दक्षिण एशिया को नहीं,सारे विश्व को गया है कि “मोदीशाह से कौन डरता है?” और यह कि उन्हें एक साल के भीतर ही राष्ट्र की राजधानी में उनके पूरे तंत्र और राजनीतिक हर्बे-हथियारों के जेरे-साये इस बुरी क़दर हराया जा सकता है कि पीने को पानी न मिले. पचास वर्ष काबिज़ रहने के हिटलरी मंसूबे पचास हफ़्ते तक टिक न सके. मोदीशाह का मुलम्मा इतनी जल्दी उतर जाएगा ऐसी उम्मीद उनके कट्टरतम बुरा चाहने वालों को भी नहीं रही होगी. विचित्र संयोग है कि आज ही यदि विदेशों में करोड़ों रुपए की लूट को छिपा कर रखने वाले डाकू नंगे कर दिए गए हैं तो इसी दिन दिल्ली की जनता ने हमारे राजा का सूट भी एक झटके में मुल्क के सामने उतार दिया है.

‘आप’ की विजय और मोदीशाह की शिकस्त के दूरगामी राष्ट्रीय और वैश्विक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं यदि आगामी चुनावों में ग़ैर-भाजपाई पार्टियाँ अपनी आत्महत्या न दुहराएँ और एक प्रबुद्ध तालमेल,समझौता और रणनीति बनाकर चलें.’आप’ को यथाशीघ्र प्रत्येक राज्य में अपने दफ्तर और काडर खड़े करने होंगे– वह हो भी रहे थे. अब तो ‘आप’ का जनाधार और मज़बूत होगा.दिल्ली के इस चुनाव में जिस तरह ‘आप’ को अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों ने लगभग एकमुश्त वोट दिया है, इससे देश की राजनीति में एक अलग ही युग की शुरूआत की संभावना देखी जा सकती है.

‘आप’ की दिल्ली विजय,और ‘आप’ से पहले संसद-स्तर पर भाजपा की विजय-दोनों का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर कम ध्यान दिया गया है और वह यह कि दोनों चुनाव हिंदी के माध्यम से लड़े और जीते गए.अंग्रेज़ी लगभग पूर्णरूपेण अनुपस्थित थी-हालाँकि यहाँ यह भी देखना होगा कि कौन-सी हिंदी ने पिछले वर्ष भाजपा को जिताया और किस हिंदी ने आज दिल्ली में भाजपा को हराया और ‘आप’ को सत्तारूढ़ किया. ‘आप’ को चाहिए कि दिल्ली से अपना एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अविलम्ब शुरू करें. मैं समझता हूँ कि कॉंग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों की वर्तमान दयनीय स्थिति का एक बड़ा कारण धीरे-धीरे उनका हिंदी-निरक्षर होते जाना है.

ग़ैर-हिंदी प्रदेशों की राजनीति का काम हिंदी के बिना (भी/ही) चल सकता है. हिंदी और समसामयिक प्रादेशिक और राष्ट्रीय राजनीति के जटिल रिश्तों की गहरी पड़ताल होनी चाहिए. लेकिन यह सही लगता है कि सिर्फ़ अंग्रेजीदाँ पार्टियों और ‘’नेताओं’’ के दिन अब लद चुके. शशि थरूर जैसों को दुःख होता होगा कि राजनीति अब मवेशी श्रेणी से भी पतित होकर गोबरपट्टी-शैली तक गिर चुकी है.

आज के दिल्ली के नतीज़ों के महत्व को अतिरंजित करना जितना नामुमकिन है, उन्हें समझना भी उतना ही कठिन है.वोटरों ने जिस तरह से ‘आप’ को क्षमा ही नहीं पुरस्कृत भी किया है यह उनकी प्रौढ़ता का परिचायक तो है ही,किरण बेदी,अमित शाह,नरेंद्र मोदी और समूची भाजपा पर उन्होंने जिस तरह से कशाघात किया है और उनसे भयमुक्त किया है वह एक ऐसी सूझ-बूझ और निर्भयता का प्रमाण है जो अभी हमारे राजनीतिक विश्लेषकों और आरामकुर्सी-बुद्धिजीवियों के पास नहीं हैं.

अण्णा हज़ारे को भी इसमें पुनर्चिन्तन के लिए बहुत-कुछ है. यह यह भी बताता है कि सामान्यजन के मन-मस्तिष्क और देश की सियासत के बारे में भी अखबारों और चैनलों द्वारा अब फ़ौरी फ़तवे नहीं दिए जा सकते. वर्तमान कठिन परिस्थितियों में दिल्ली के वोटर देश के लिए इससे ज़्यादा और क्या कर सकते थे ?

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