भारत में लोकतंत्र जिंदा है

यह दूसरा मौका है जब देश की अदालत ने केन्द्र की भाजपा-मोदी सरकार को आईना दिखा दिया. राजनीति की भाषा में इसे भाजपा के लिए करारा झटका, हार या तमाचा कुछ भी कहा जा सकता है, कहें. लेकिन बड़ा सवाल यह कि क्या उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे हमारे राजनीतिक सूरमाओं को सत्ता के मोहपाश में इतना भी भान नहीं कि उनके फैसले कितने गलत, कितने सही?

उत्तराखण्ड के मामले में पहले ही केन्द्र सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो चुकी है और अब अरुणाचल प्रदेश का फैसला गले की फांस बन गया है. गंभीर सवाल उठ रहे हैं, उठने भी चाहिए क्योंकि अहम सवाल विश्व के सबसे लोकतंत्र के साथ इंसाफ का है. जब संवैधानिक रूप से इसके लिए जवाबदेह, मन माफिक फैसले लेने लगते हैं तो रास्ता सिर्फ न्यायालय की शरण का बचता है. गर्व होता है कि न्यायालय ने पहले भी कई मौकों पर दूध का दूध, पानी का पानी किया है.


निश्चित रूप से कांग्रेस खुश होगी, होना भी चाहिए, लेकिन सवाल यहां कांग्रेस का नहीं, भारत के असली लोकतंत्र का है और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय किसी दल की जीत या हार नहीं वरन लोकतंत्र का चीरहरण होकर भी बच गया जैसे है. अरुणाचल प्रदेश में 24 जनवरी को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. नबाम टुकी की सरकार को राज्यपाल ने इस बिना पर बर्खास्त कर दिया कि 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 47 में से 21 विधायकों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत की थी.

समूचे घटनाक्रम की शुरुआत बीते वर्ष दिसंबर में हुई जब कुछ कांग्रेस विधायकों के विद्रोह के बाद राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने स्वयं ही विधान सभा का सत्र आहूत किया. सत्र का आयोजन एक होटल में इसलिए कराया क्योंकि अध्यक्ष ने विधानसभा बंद करने के आदेश दिए थे. इस विशेष बैठक में विपक्षी विधायकों ने बगावतियों के साथ होकर मुख्यमंत्री टुकी और विधानसभा अध्यक्ष नाबम रोबिया को बर्खास्त कर दिया. इस तरह अरुणाचल प्रदेश में लोकतंत्र के साथ एक नया खेल खेला गया.

राज्यपाल ने अपनी कार्रवाई को न केवल सही बताया अपितु इसे संवैधानिक कहते हुए स्पीकर पर पक्षपात का आरोप जड़ा. राज्यपाल ने यह तर्क भी दिया कि चूंकि मुख्यमंत्री अपना बहुमत खो चुके हैं इसलिए सरकार की बर्खास्तगी ही एकमात्र रास्ता है और वो इसकी सिफारिश करते हैं. उधर दिल्ली में बैठी मोदी सरकार इसी चिट्ठी का इंतजार कर रही थी जिसने बिना किसी देरी के राज्यपाल की बात मानते हुए वहां राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी. इस बीच वहां कई सप्ताह तक राजनीतिक उठापटक का सियासी ड्रामा भी चला, अंतत: राज्यपाल राजखोवा ने कांग्रेस के बागी गुट के नेता कालीखो को भाजपा के 11 विधायकों के समर्थन के आधार पर 19 फरवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

इस सब के बीच विधानसभा सत्र बुलाए जाने के फैसले को तकनीकी आधार पर कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और वहां जस्टिस जेएस केहर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने बुधवार 13 जुलाई को अपने ऐतिहासिक फैसले में आदेश देते हुए पीड़ित पक्ष को सही ठहराया तथा राज्यपाल के फैसले को अवैध और असंवैधानिक करार देकर, 15 दिसंबर 2015 से पहले की स्थितियों को बहाल करने का आदेश दे दिया तथा विधानसभा के इसके बाद के सभी फैसलों को रद्द कर दिया.

सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा फैसला देश में पहली बार आया है जहां अदालत ने, मौजूदा सरकार को हटाकर पुरानी सरकार को बहाल करने का आदेश दिया और टिप्पणी में कहा है कि राज्यपाल का काम केन्द्र सरकार के एजेंट का नहीं बल्कि संविधान की रक्षा करना होता है. 9 दिसंबर के बाद के विधानसभा के सभी फैसले रद्द किए जाते हैं तथा 16-17 दिसंबर को बुलाए गया विधानसभा सत्र भी असंवैधानिक है. राज्यपाल के 9 दिसंबर 2015 के नोटिफिकेशन को भी रद्द कर दिया गया.

इस तरह वहां पर 7 महीने पुरानी कांग्रेस सरकार फिर से बहाल करने का आदेश दिया. 16 दिसंबर से 18 दिसंबर 2015 तक चले अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा के 6 वें सत्र में कार्यवाही के लिए राज्यपाल का आदेश देना अनुच्छेद 163 जिसे संविधान का अनुच्छेद 175 पढ़ा जाए, अतिलंघन है. अत: राज्यपाल का यह फैसला ही अमान्य है. इस तरह वहां 15 दिसंबर 2015 से पूर्व की स्थिति बहाल की जाए.

कुल मिलाकर पूरा परिदृश्य वैसा ही जैसा उत्तराखण्ड में था फर्क इतना कि वहां फ्लोर टेस्ट का आदेश हुआ और यहां मौजूदा सरकार को हटाकर पुरानी सरकार को बहाल करने का स्वतंत्र भारत का पहला आदेश. उत्तराखण्ड में धराशायी मुख्यमंत्री हरीश रावत ने विधान सभा के फ्लोर टेस्ट में न केवल बहुमत साबित किया बल्कि उम्मीद से ज्यादा 33 मत हासिल कर, भाजपा की बड़ी किरकिरी की. कमोवेश वैसी ही स्थिति अब फिर बन गई है. भाजपा में तमाम विधिवेत्ताओं की भरमार के बाद भी ऐसी स्थिति क्यों? सत्ता हथियाने, विरोधियों को पटखनी देने या जल्दबाजी में खुद ही औंधे मुंह गिरने की अंधी दौड़ नहीं तो क्या है? यह दौड़ कितनी खतरनाक होगी, इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे यह कम से कम अब तो भाजपा को सोचना ही होगा.

सर्वोच्च न्यायालय के कुछ ही अंतराल में इस दूसरे बड़े फैसले से खलबली मचेगी, निश्चित रूप से न्यायपालिका-कार्यपालिका-विधायिका का टकराव बढ़ेगा, बढ़े लेकिन लोकतंत्र जिन्दा रहे क्योंकि यही भारत की विश्व में बड़ी पहचान है.

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