नोटबंदी और घरेलू महिलाएं

निकहत प्रवीन
8 नंवबर 2016 को एक ऐसा फैसला सामने आया जिसने लोगो की रातों की नीदें उड़ा दी. फैसला था नोटबंदी का जिसके अनुसार 500 और 1000 के नोट की वैधता भारतीय बाजार में समाप्त कर दी गई. इस फैसले को 50 दिन से ज्यादा का समय गुजर चुका है उम्मीद थी कि 50 दिन के बाद सबकुछ सामान्य हो जाएगा. हालांकि दूर-दूर तक सामान्य स्थिति दिखाई नही दे रही है.

निसंदेह इस फैसले ने हर वर्ग के लोगो को हैरान परेशान किया लेकिन घर का मैनेजमेंट संभालने वाली घरेलू महिलाओं के जीवन पर नोटबंदी ने क्या प्रभाव डाला है? इस बारे में दिल्ली के इंद्रलोक में रहने वाली 32 वर्षीय शाहीन शमीम कहती हैं “एक तो दिल्ली में किराये के मकान में रहना उपर से दो छोटे बच्चों को संभालते हुए घर की सभी जरुरतें पूरी करना आसान नहीं है. बड़ी बेटी के लिए स्कूल की सारी चीजों का इंतजाम करना होता है तो छोटी के लिए दवा, बेबी फुड, और कई चीजों का ख्याल रखना पड़ता है. ऐसे में रोज कुछ पैसे की जरुरत होती है लेकिन नोट बंदी के कारण खुदरे पैसे की सबसे ज्यादा दिक्कत आ रही है और बच्चों के सामान और घर चलाने में कहां कमी करुं कहां नही समझ नही आता. काले धन को बाहर लाने के लिए सराकर का फैसला सही है लेकिन इसे लागू करने से पहले जो तैयारी होनी चाहिए थी वो नाकाफी दिखाई दे रही है”.


बिहार की राजधानी पटना की सत्या भामा बताती हैं “पति प्राईवेट कंपनी मे जॉब करते हैं. कुछ दिन पहले ही काम के कारण पटना रहने आई हूं. मुझे अपने बेटे का इंग्लिश मीडियम स्कूल में एडमिशन कराना था लेकिन सोच रही हूँ कि सारे पैसे एडमिशन और कॉपी- किताब में लग जाएंगे तो महिने भर घर कैसे चलेगा. नौबत यहां तक आ गई है कि कोई उधार तक देने तो तैयार नही. हां अगर इस नोटबंदी के कारण स्कूलों- कॉलेजों में लोग डोनेशन लेना बंद कर दें तो हम जैसे लोगों को कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन ऐसा होगा कि नहीं भगवान ही जाने”.

गुजरात में रहने वाली निहारिका के अनुसार “मेरे ससुराल में कुल 14 सदस्य हैं. संयुक्त परिवार में रहने के कारण खाना-पीना और रोज की बहुत सारी चीजें होती हैं जो घर परिवार चलाने के लिए खरीदनी ही पड़ती है. घर में बड़े- बुजुर्ग हों तो दवाओं का खर्च सबसे ज्यादा आता है. छोटे-मोटे कारोबार से घर चल रहा है. घर के मर्द अपने अपने काम पर चलें जाते हैं लेकिन इतने बड़े परिवार को चलाने के लिए जितने पैसों की जरुरत पड़ती है उसके लिए हम औरतें ने ही बैंक का चक्कर लगा-लगा कर पैसे निकालें ताकि महिने भर का काम निकल आए”.

दिल्ली के रजौरी गार्डन मे रहने वाली तब्बसुम आफरीन अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती हैं “पति ने कुछ दिन पहले ही बैंक से लोन लेकर अपना कारोबार शुरु किया है. लेकिन नोटबंदी के कारण मार्केट बिल्कुल डॉउन हो गया है. लोन भी जल्द पूरा करना है और बच्चों की पढ़ाई लिखाई का भी मसला है. अल्लाह ही जाने सब कैसे होगा. मैं कितनी भी कटौती कर लूँ जो जरुरी चीजें हैं वो तो लेनी ही पड़ेगी न”.

बिहार के गया जिले की 55 वर्षिय महिला ने बताया “पति किराने की दुकान पर काम करते हैं बस इतना कमा लेते हैं कि किसी तरह खर्चा पूरा हो जाता है. दिंसबर में बेटी का निकाह किया जब सबकुछ तय किया था तब नोटबंदी की कोई बात नहीं थी फिर अचानक से ये सबकुछ हो गया. क्या बताउं कितनी मुश्किल से एक एक चीज जोड़ा है. शादी-बियाह मे खर्च तो होता है न बेटी, बिना पैसे के भी कोई सामान देगा. किस मुसीबत से बेटी की शादी की है मैं ही जानती हूँ”.

लखनऊ की मारिया साफीया कहती हैं “कुछ दिन बाद घर में शादी है अभी सोने-चांदी के दाम काफी कम चल रहें हैं, हालात पहले जैसे होते तो ढेर सारे गहनें खरीदती लेकिन फिलहाल घर अच्छे से चल जाए यही बहुत है. चलो अच्छा भी है इस नोटबंदी के कारण कुछ फिजूलखर्ची करने का मौका नहीं मिल रहा है”.

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि नोटबंदी से महिलाओं को कई आशएं भी हैं जिस कारण वो हालात से समझौता कर घर-परिवार को हर रोज नई उम्मीदों के साथ चलाने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि बदले में अंततः उन्हें कुछ मिलेगा या नहीं ये कहना थोड़ा मुश्किल है.

(इनपुट- चरखा फीचर्स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!