नोटबंदी ‘ऐतिहासिक भूल’?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: क्या नोटबंदी की तुलना ‘ऐतिहासिक भूल’ से की जा सकती है. नोटबंदी के एक माह पूरे के बाद इसका अहसास होने लगा है कि स्थिति के सामान्य होने में अभी वक्त लगेगा.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा अन्य अर्थशास्त्री भी मान रहे हैं कि नोटबंदी से मंदी आ सकती है. आर्थिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता ने नोटबंदी की तुलना इंदिरा गांधी और संजय गांधी के दौर के नसबंदी से की है. उनका मानना है कि इसका असर आगे जाकर दिखेगा. रिजर्व बैंक ने भी भारत की विकास दर के अनुमान को 7.6% से घटाकर 7.1% कर दिया है.


जिस काले धन को पकड़े जाने का दावा किया जा रहा था, वह भी अब फीका पड़ता नज़र आ रहा है. 8 नवंबर तक सर्कुलेशन में रहे 500 और 1000 के नोट 15.5 लाख करोड़ रुपये के थे. दो दिन पहले तक बैंकों में 11.5 लाख करोड़ रुपये जमा हो चुके थे. अभी भी तीन हफ्तों का समय है. ऐसा माना जा रहा है कि काली नगदी को ऐन-केन-प्रकारेण बैंकों में जमा करा दिया जा रहा है.

उधर, नये नोटों की तंगी से जूझ रहे जनता से कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने का आह्वान प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया है. अब सरकार का पूरा जोर कैशलेस लेनदेन पर आकर टिक गया है. जनता को समझ में ही नहीं आ रहा है कि काले धन को पकड़ने के लिये नोटबंदी की गई है या कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के लिये नोटबंदी की गई है या नोटबंदी के बाद नगदी की तंगी से निकलने के लिये कैशलेस लेनदेन की बात की जा रही है.

इस सब के बीच सोशल मीडिया से लेकर संसद तक प्रधानमंत्री मोदी तथा उनके नोटबंदी के फैसले का विरोध हो रहा है. वैसे उनके समर्थन करने वालों की संख्या भी सोशल मीडिया में किसी भी हाल में कम नहीं है.

9 नवंबर से ही ज्यादातर कारोबार ठंडे पड़े हैं. छोटे नोटों की कमी के कारण लोग अपनी खरीदारी की सूची में कटौती कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी जी के लिये पलके बिछा देने वाले व्यापारी अब खुलकर उनके नोटबंदी के फैसले की आलोचना करने लगे हैं. रोज अखबारों में अमक-अमुक कारोबार में कितने फीसदी की गिरावट आई है, उसके जमीनी आंकड़े पेश किये जा रहे हैं.

जब खुद के पेट पर वार होता है तो मुंह से निकलने वाली भाषा भी बदल जाती है. ऐसा कौन है जो घर फूंककर तमाशा देखना पसंद करता है. यह बात मुहावरे तक तो ठीक है पर जब खुद का घर जलने लगे तो कौन आपके पीछे झंडा लेकर चलेगा. ऐसी दबावपूर्ण परिस्थिति जनता को विकल्प की तलाश की ओर ले जाती है.

2014 को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाले मोदी जी अब जनता को पहले के समान करिश्माई नहीं लगते हैं. यदि मोदी जी करिश्मा कर सकते थे तो जनता को नोटबंदी की कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है. जनता ने जिस ‘सुपरमैन’ को अपने सर-आंखों पर बैठा लिया था, वो भी सामान्य मनुष्य निकला जो गलती कर सकता है, गलत फैसले ले सकता है.

नोटबंदी पर मोदी जी विदेश में जाकर हंसते हैं तो गोवा में आकर भावुक हो जाते हैं. कभी कहते हैं उनकी जान को खतरा है. कभी कहते हैं अपन तो फकीर हैं झोला लेकर निकल जायेंगे.

इन सब से जनता हतप्रद है कि आखिर हो क्या रहा है? जमीनी हकीकत यह है कि आज नोटबंदी से किसान, कामगार, व्यापारी, कर्मचारी, अधिकारी सब त्रस्त हैं. नोटबंदी ने देश की एक बड़ी आबादी को अपने चपेट में ले लिया है. अभी फिलहाल हर कोई अपना मुंह नहीं खोल रहा है, लोग विवाद में पड़ने से बचना चाहते हैं, लेकिन जब आने वाले समय में फिर से ईवीएम के बटन को दबाने का मौका आयेगा मिलेगा क्या तब भी लोग चुप बैठेंगे इसकी क्या गारंटी है?

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