दिल्ली सल्तनत का वारिस कौन?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को दिल्ली विधानसभा भंग करने की उपराज्यपाल की सिफारिश मंजूर कर ली है. ऐसे में दिल्ली विधानसभा की सल्तनत का वारिस कौन होगा इसकों लेकर कयासों का बाजार गर्म हैं. सभी पार्टियों को जिसमें भाजपा, कांग्रेस तथा आप शामिल है परोक्ष रूप से दावा कर रहीं हैं कि उन्हें बहुमत मिलने वाला है. जाहिर सी बात है कि युद्ध की रणभेरी बजने के बाद कौन सेनापति होगा जो अपने सैनिकों को हार स्वीकार करने के लिये कहेगा.

दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग दिल्ली सल्तनत ने तीनों दावेदार पार्टियों से चर्चा करने के बाद अपनी रिपोर्ट भेजने वाले थे. दरअसल, कैबिनेट ने यह निर्णय दिल्ली में सरकार बनाने से सभी पार्टियों के इनकार के बाद लिया गया. दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग ने यहां सरकार गठन की संभावनाएं तलाशने के लिए सोमवार को भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को बुलाया था. सभी पार्टियों ने दिल्ली में सरकार बनाने से इनकार करते हुए यहां नए सिरे से चुनाव कराने की बात कही थी.

लुटियन की दिल्ली कई शहंशाहों तथा उनके वारिसो की गवाह है. इस बार दिल्ली का ताज किस पार्टी के सिर पर होगा इसको लेकर सभी के अपने-अपने दावें हैं. बहरहाल, इस सब दावों के बीच में कुछ तथ्यों तथा आकड़ों पर गौर करना गैर वाजिब नहीं होगा.

विधानसभा चुनाव 2013
वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा में भाजपा को 31, आम आदमी पार्टी को 28, कांग्रेस को 8, शिरोमणी अकाली दल को 1, जदयू को 1 तथा निर्दलीय को 1 सीटों पर विजय मिली थी. यदि पार्टियों को मिले मतदान के कुल मतों को देखा जाये तो भाजपा को 33.07 फीसदी, कांग्रेस को 24.55 फीसदी, आप को 29.49 फीसदी, बसपा को 5.35 फीसदी, शिरोमणी अकाली दल को 0.91 फीसदी तथा जदय़ू को 0.87 फीसदी मत मिले थे. जाहिर है कि भाजपा को सबसे ज्यादा फीसदी मत मिले थे उसके बाद आप को तथा उससे कम कांग्रेस को मिले थे.

ऐतिहासिक भूल
दिल्ली विधानसभा में भाजपा के पास सबसे ज्यादा संख्या बल होने के कारण उसने सरकार बनाने से इंकार कर दिया तब कांग्रेस के बाहरी समर्थन से आप की सरकार बनी तथा अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने. अपने शुरुवाती कामों से आप की सरकार ने जनता को किये गये वादों को लाइन से अमल में लाना शुरु कर दिया. जिसके तहत मुफ्त पानी तथा बिजली के बिल कम करने का तथा लोकपालपाल कानून लाना था. आप की सरकार ने चंद दिनों में ही दिल्ली वासियों को 700 लीटर पानी देने के वादे पर अमल करना शुरु कर दिया था. इसी के साथ बिजली वितरण कंपनियों के ऑडिट करवाने के लिये कदम उठाये गयें.

आप के द्वारा किये गये कार्यों से मोहित जनता का सपना 49 दिनों से ज्यादा न चल सका तथा अरविंद केजरीवाल की सरकार ने लोकपाल के मुद्दे पर इस्तीफा दे किया. जाहिर सी बात है कि जिस आप की सरकार पर जनता उम्मीदें लगाई बैठी थी उसे इस प्रकार का दुस्साहस पसंद नहीं आया. जिसके परिणाम आम आदमी पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनाव में भुगतने पड़े.

दिसंबर 2013 में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों से लगने लगा था कि कांग्रेस काफी पिछड़ गई है तथा भाजपा से मुकाबला करने की कुव्वत केवल आप में ही है. ऐसे हालात में जब जनता का एक बड़ा वर्ग जो कांग्रेस से नाखुश था, आप को एक विकल्प के रूप में देखने लगा था. इतनी सकारात्मक परिस्थिति के बावजूद आप की सरकार ने इस्तीफा देकर जो ‘ऐतिहासिक भूल’ की है उस पर उसके नेता अब तक पछता रहें हैं.

लोकसभा चुनाव 2014
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली के सातों लोकसभा सीटों पर कब्जाकर लिया तथा सभी में आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रह गई. 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को यदि विधान सभावार देखा जाये तो 70 विधानसभाओं में से 60 में आगे रही तथा आप केवल 10 विधानसभ सीटों पर आगे रही. जाहिर है कि लोकसभा चुनाव आते-आते दिल्ली की जनता का मूड बदल चुका था तथा आप को अपने ‘ऐतिहासिक भूल’ पर अफसोस करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

2014 के लोकसभा चुनाव के नजीतों से स्पष्ट है कि भाजपा ने दिल्ली में अपनी जमीन को मजबूत किया है तथा आप के किलेबंदी में कमजोरी दिखाई दे रही है. उल्लेखनीय है कि भाजपा ने 2013 में ही सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद भी स्पष्ट बहुमत न होने के कारण सरकार बनाने से इंकार कर दिया था. गौरतलब है कि राजनीति में जो कुछ जुबान पर होता है उससे रणनीति का अंदाज लगाना आसान नहीं होता है. आखिरकार विपक्षी भाजपा तथा बाहर से समर्थन देने वाली कांग्रेस ने पुराने पहलवान के समान जो हर दांव से वाकिफ होता है, ऐसा रवैया अख्तियार किया कि 49 दिन बाद केजरीवाल ने दिल्ली की सल्तनत को राम-राम कह दिया.

अब दिल्ली विधानसभा के लिये फिर से चुनाव होंगे. चुनाव के साथ ही सवाल भी है कि इस बार दिल्ली की सल्तनत किसको मिलेगी. जाहिर है कि सभी अपने आप को दिल्ली की सल्तनत का वारिस बता रहें हैं परन्तु आकड़ें तो कुछ और ही कहते है.

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