घोषणापत्र में जुगलबंदी

रायपुर | कनक तिवारी: छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों के लिए कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्र राजधानी रायपुर में जारी किए गए हैं. दोनों घोषणापत्र अर्द्ध-सरकारी भाषा में बाबूगिरी के लेखन का नमूना नज़र आते हैं. दोनों पार्टियों की राजनीतिक प्रकृति, नीतियां और विचार प्रणालियां कई मुद्दों पर अलग अलग नस्ल की हैं.

दोनों का दावा है कि उनमें देशभक्ति का जज़्बा कुलांचे भर रहा है. दोनों विचारधाराएं विरोध और मुकाबिले के बावजूद इतिहास में समानान्तर बह रही हैं. घोषणापत्रों में जो संवेदन, गंभीरता, चिंताएं और प्रतिबद्धताएं होनी चाहिए उनका केवल पोचारा भर फेरा गया है. इसके उलट जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी वगैरह ने संविधान सभा की कार्यवाहियों में जो भाषण दिए हैं, उनमें से आज भी इंसानी गरिमा और वैचारिक ऊष्मा झरती दिखाई देती है.


कमोबेश दोनों घोषणापत्र जानकारियों, विवरणों, सांख्यिकी और टिप्पणियों से लबरेज़ हैं. उनमें संवैधानिक दृष्टि की आंख मुंदी है. प्रादेशिक सरकारों का गठन प्रशासनिक नहीं संवैधानिक भाष्य है. सातवीं अनुसूची के अनुसार 66 विषयों में केवल राज्य को विधायन, प्रशासन और अनुपालन करना है. 47 विषय समवर्ती सूची में होने के कारण उनमें भी प्रदेश का क्षेत्राधिकार है. इन शताधिक मुद्दों से कई नागरिक-संदर्भ बेचैन होकर पिछले तिरेसठ वर्षों से कुलबुला रहे हैं. प्रदेश का उनकी ओर कोई ध्यान नहीं है. घोषणापत्रों में भी नहीं है.

लोकप्रशासन की बुनियादी इकाइयां पंचायतें और नगरपालिकाएं हैं. उन्हें संवैधानिक दर्जा देते हुए क्रमषः ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची में नए क्षेत्राधिकार जोड़े गए हैं. इनके लिए अनुसूची 243 के अनुसार राज्यों को मौजूदा स्वायत्तषासी अधिनियमों में संशोधन करना है. संभवतः केरल और कर्नाटक के अतिरिक्त अविभाजित मध्यप्रदेश में निचले स्तर की योजनाओं को स्वायत्त संस्थाओं को देने का संशोधन हुआ. फिर भी सरकारों के मंत्री और संचालक आज तक उन पर हावी हैं. ये घोषणापत्र चुप हैं कि वे कब और कैसे पंचों और पार्षदों को लोकतंत्र का पुर्ज़ा समझकर उन्हें कलेक्टरों के चंगुल से मुक्त करेंगे.

जनता को खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक रुपए किलो चावल और मुफ्त का नमक देते हुए राजशाही मुद्रा में भिक्षा दिए जाने का दम्भ पुनरावृत्त हो रहा है. नागरिक रियाया नहीं हैं जिन्हें खैरात की ज़रूरत है. उन्हें संविधान में उसका निर्माता अर्थात ‘हम भारत के लोग‘ कहा गया है. गांवों में गरीब घरों की महिलाएं पुरुषों की शराबखोरी के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन करती हुई शराब ठेकेदारों के पंडों और अपने पतियों तक के मुंह नोंच रही हैं. इस बड़ी सामाजिक परिघटना को लेकर घोषणापत्रों में कोई उल्लेख नहीं है.

हर आबकारी मंत्री को यह गर्व होता रहता है कि वह नशाखोरी बढ़ाकर राज्यकोष में सबसे ज़्यादा राजस्व इकट्ठा कर रहा है. राष्ट्रपिता की पार्टी के कर्णधार इसी धंधे में गला तर कर रहे हैं. नए राष्ट्रगौरव प्रधानमंत्री पद के कोलम्बस हैं, लेकिन कभी नहीं कहते कि भाजपाशासित राज्यों में शराबबंदी होनी चाहिए. युवा पीढ़ी को लैपटॉप और टैबलेट बर्थडे गिफ्ट की तरह दिए जा रहे हैं. रिटर्न गिफ्ट के बतौर वोट मांगे जा रहे हैं. उनके लिए नौकरियों और रोजगार की प्रतिबद्धताओं का कोई ब्यौरा घोषणापत्रों में नहीं है.

नक्सलवाद मिली जुली कुश्ती का अखाड़ा है. सलवा जुडूम दोनों पार्टियों का बहा हुआ पसीना. उसे सुप्रीम कोर्ट ने उसी अखाड़े में सुखा दिया है. दोनों पार्टियों के वैश्य कर्णधार आदिवासी इलाकों में लौह अयस्क, कोयला, पानी, वनोत्पाद वगैरह की खुलेआम लूट कर रहे हैं. उन्होंने आदिवासी नेताओं को अपना कारिंदा समझ लिया है. कुछ झूठे सच्चे मुकदमे बने भी. कोई पार्टी ऐलान नहीं करती कि वह उन्हे किसी निष्पक्ष जांच एजेंसी, न्यायिक आयोग या एस.आई.टी. वगैरह को सौंप देगी और रिपोर्ट के अनुसार मुकदमे भी चलाएगी.

राजनीति की कौरवसभा उसी को कहते हैं जिसमें पांडव तक अपनी पत्नी का शीलहरण होते देखते हैं और चुप रहते हैं. मीडिया भी पांडव-भूमिका में है. छत्तीसगढ़ में देश का सबसे लचर लोकायुक्त कानून है. उसके कारण नेता और वरिष्ठ नौकरशाह आसानी से बच रहे हैं. इस कानून को कांग्रेसी सरकार ने बनाया था. अनुकूल होने के कारण भाजपा उसे कायम रखे हुए है. दोनों पार्टियां एक स्वर में कहती हैं कि यह एक अच्छा कानून है.

कुछ महत्वपूर्ण विशेषज्ञ रिपोर्टों में छत्तीसगढ़ में कुपोषण, प्रदूषण, गंदगी, अशिक्षा, हिंसा, जच्चा बच्चा की अनदेखी आदि सूचकांकों की हालत बहुत खराब है. उनको लेकर सार्थक जनविमर्श नहीं करने दिया जाता. मीडिया के देश की राजधानी से आयातित सिकन्दर केवल आकर गाल बजाते हैं. ज़िन्दल, मित्तल, वेदांता, टाटा, एस्सार वगैरह अरबपतियों के छत्तीसगढ़ में विस्तार को लेकर अकाट्य सबूत होने पर भी विधायकों की आक्रमण-मुद्राएं समझौतापरस्त दिखती हैं. न्यायपालिका में दिल्ली, बम्बई और इलाहाबाद वगैरह उच्च न्यायालयों के तेवर पर्याप्त कानूनी गतिविधियों के बिना उग नहीं पाए हैं.

कुल मिलाकर यथास्थितिवाद, पारंपरिक बुद्धि और सियासी मलहम के ज़रिए बुनियादी समस्याओं को बारी बारी से निपटाने का शोशा छोड़ा जाता है. भारत की युवा पीढ़ी शिक्षित है. महत्वाकांक्षी है. भ्रष्ट नहीं होना चाहती. देशभक्त है. लेकिन उसके लिए ऐसा माहौल कुचक्र में रचा जा रहा है कि विदेशों में कैसी भी नौकरी पा लेने को वह जीवन का मोक्ष समझती है. राजनीतिक कार्यपालिका जैसी किसी संस्था का विकास भारत में नहीं हुआ है. गृहमंत्री को सुरक्षा विशेषज्ञ होना नहीं भाता.

शिक्षा मंत्रालय निजी प्रकाशकों से पुस्तकें छपवाने की गुणवत्ता और परिमाण में अपनी समृद्धि को ढूंढ़ना चाहता है. लोककर्म के प्रकल्प जनता को परलोक भेजने का साधन बन रहे हैं. संस्कृति का आशय लोक संस्कृति की फूहड़ नकल अथवा मुम्बइया कलाकारों के नाम पर गैर सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रदर्शन से होता है. कुल मिलाकर नागरिक जीवन को जो संवैधानिक गरिमा, अधिकार और दायित्व मिलने चाहिए, उनको लेकर राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे से भला ‘तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा साफ कहां है‘ कहती हुई बुनियादी मुद्दों के ऊपर लगी काई या फफूंद को ही साफ करती रहती हैं.

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