आपातकालः सम्माननिधि और सहूलियतें

सुनील कुमार
मराठी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय हार्डिकर की 1978 की पुस्तक ‘जनाचा प्रवाहो चालिला’ आपातकाल पर प्रामाणिक टिप्पणी समझी जाती है. अभी इसी हफ्ते एक खबर आई है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान जेल में गए लोगों के लिए भाजपा की महाराष्ट्र सरकार की पेंशन पेशकश न लेने का फैसला किया है. उन्होंने कहा कि सरकार का (पेंशन का) फैसला विभिन्न कारणों से अनैतिक है.

एक खबर के मुताबिक-उन्होंने कहा, मैंने पेंशन नहीं लेने का फैसला किया है. मैं मानता हूं कि इस फैसले का राजनीतिक पक्ष है जो भाजपा अध्यक्ष के संपर्क फॉर समर्थन अभियान का हिस्सा जान पड़ता है. मैं उसमें फंसना नहीं चाहता. लेखक ने कहा कि आपातकाल लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन करने वाली शिवसेना अब राज्य सरकार में घटक है अतएव पेंशन की यह पेशकश अनैतिक है.


हार्डिकर ने कहा, सरकार को कुछ मुद्दों पर सफाई देनी चाहिए. पहला, जेल में गुजारे गए समय के अनुसार लोगों के बीच भेदभाव क्यों? उन्होंने कहा, जो जेल में डाले गए थे, वे दो प्रकार के लोग थे. ऐसे लोग, जिन्होंने सत्याग्रह किया (और जिन्होंने गिरफ्तारी दी थी) तथा ऐसे लोग जिन्हें किसी विरोध-प्रदर्शन से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था. इसमें मुस्लिम लीग और आनंद मार्ग जैसे सांप्रदायिक संगठनों के कार्यकर्ता भी थे. कुछ नक्सली भी हिरासत में लिए गए थे. क्या वे भी इस उदार पेंशन के हकदार हैं? उन्होंने सवाल किया, आपातकाल में जेल में डाल दिए गए अन्य लोगों की तुलना में आरएसएस के कार्यकर्ता अधिक थे. क्या सरकार उन्हें नकद पुरस्कार देना चाहती है. क्या यह नैतिक है क्योंकि आरएसएस को गैर-राजनीतिक संगठन होने का दावा करता है.

हार्डिकर ने कहा- मैं आपातकाल खत्म और लोकतंत्र की बहाली चाहता था. मैं चाहता था कि इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र के साथ जो ज्यादती की, उसके लिए उन्हें दंडित किया जाए. मेरे दोनों ही लक्ष्य मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव के साथ हासिल हो गए.

इस हफ्ते की शुरुआत में महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़णवीस की भाजपा सरकार ने आपातकाल के दौरान एक महीने से ज्यादा समय तक जेल में बंद रहे लोगों के लिए 10 हजार रुपये महीने की पेंशन योजना शुरू करने की घोषणा की है. योजना के तहत जो लोग एक महीने से कम वक्त तक जेल में रहे उन्हें पांच हजार रुपये का पेंशन दिया जाएगा. मुख्यमंत्री फड़णवीस ने कहा था कि मौजूदा वक्त में लगभग 7-8 राज्यों में आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा है, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी शामिल हैं.

आपातकाल और इंदिरा गांधी
आपातकाल
हालांकि महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले के पहले ही इस पर विवाद शुरू हो गया. इस फैसले का विरोध कर रहे लोग का कहना है कि इसके जरिये आपातकाल के दौरान जेल गए आरएसएस के लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देने का विचार किया जा रहा है.

दूसरी तरफ कल ही छत्तीसगढ़ में यहां के एक पुराने भाजपा-परिवार के नेता सच्चिदानंद उपासने ने अपने बनाए एक संगठन, लोकतंत्र सेनानी संघ, की ओर से एक प्रेस कांफ्रेंस में आपातकाल की सालगिरह पर, उसकी याद में, उसके खिलाफ एक कार्यक्रम की घोषणा की है. और इसी मौके पर उन्होंने यह जानकारी दी है कि छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश के मीसाबंदियों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के समान सुविधाएं देने की घोषणा करके 2008 से ही सम्माननिधि दे रही है. उपासने आपातकाल में मीसाबंदी हुए लोगों के वारिसों में आते हैं, और वे खुद भी मीसाबंदी रहे हैं, और अपने तबके को वे स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर स्थापित करने के अभियान में लंबे समय से लगे हुए हैं.

मीसाबंदियों को लेकर दो तरह की सोच सामने आई है, जिसमें से पहली सोच महाराष्ट्र के एक मीसाबंदी लेखक की है जो कि मीसाबंदियों की पेंशन के खिलाफ हैं. दूसरी तरफ मीसाबंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों की तरह पेंशन दिलवाने का अभियान छत्तीसगढ़ में चल रहा है. अब सवाल यह उठता है कि क्या एक राजनीतिक आंदोलन में, या आपातकाल जैसे काले दौर के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले लोगों को किसी पेंशन की उम्मीद करनी चाहिए, या पेंशन का हक रहना चाहिए? क्या लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए जिन लोगों ने एक नागरिक आंदोलन में हिस्सा लिया, या जिन्हें उस वक्त की इंदिरा-संजय की सरकार ने गिरफ्तार किया, क्या उन्हें अलग से ऐसा दर्जा और अलग से ऐसी पेंशन दी जानी चाहिए?

यह सवाल जरूरी इसलिए है कि किसी भी किस्म की सरकारी पेंशन आखिर जनता के पैसों से ही जाती है. और छत्तीसगढ़ वह प्रदेश है जहां पर रमन सरकार जब से एक रूपए किलो चावल दे रही है, तब से गरीबी की रेखा के नीचे का तबका दो वक्त पेट भर खा पा रहा है. क्या ऐसी गरीब जनता के पैसों से किसी को पेंशन लेनी चाहिए? खासकर ऐसे लोगों को जो कि आपातकाल के बाद किसी आर्थिक खतरे से नहीं गुजरे, जिन्होंने जेल में वक्त गुजारा, और उनका परिवार चल गया. इसमें ऐसे लोग भी आपातकाल में जेल में रहे होंगे जिनके परिवार की कमाई उस दौर की वजह से खत्म हो गई. ऐसे गिने-चुने लोगों को तो आर्थिक मदद देना ठीक है, लेकिन बाकी लोगों को सम्मान का एक दर्जा देना काफी नहीं है? और जो आपातकाल से उबरकर आज खाते-पीते हैं, उन्हें कोई भी आर्थिक सम्मान निधि क्यों लेनी चाहिए?

यह सोच कुछ उसी किस्म की है जिसके तहत हम लगातार आरक्षित तबकों के भीतर से फायदे के हक के मामले में मलाईदार तबके को हटाने की बात करते हैं. दलित-आदिवासी या ओबीसी, जो भी आरक्षित तबके हैं, उनके भीतर के अधिकतर फायदे उन तबकों के अपने, लेकिन सबसे ताकतवर, संपन्न, शिक्षित, सरकारी या दूसरे बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग, सांसद या विधायक, इन्हीं के बच्चे ले जाते हैं क्योंकि वे किसी भी मुकाबले के इम्तिहान में अपनी जाति के बाकी बच्चों के मुकाबले बेहतर तैयारी कर पाते हैं. इसलिए हम बार-बार मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदों से बाहर करने की बात लिखते हैं. लेकिन ऐसा हो इसलिए नहीं पाता कि जिन अफसरों को ऐसी नीति का खाका बनाना है, जिन सांसदों या विधायकों को सदन में ऐसा कानून पास करना है, और जिन जजों को ऐसे कानून के पहले या बाद इसे कानूनी कसौटी पर कसना है, उन सबके अपने बच्चों के हित इसी बात में है कि मलाईदार तबका आरक्षण का हकदार बने रहे.

कुछ-कुछ इसी से मिलता-जुलता एक मामला है जिसमें लोग अपने आपको मीसाबंदियों के लिए सम्माननिधि का हकदार बताते हैं, और आपातकाल की कैद के एवज में नगद भी पा रहे हैं. चूंकि आपातकाल में जेल जाने वाले तकरीबन सारे ही लोग गैरकांग्रेसी थे, इसलिए गैरकांग्रेसी सरकारों ने, खासकर भाजपा की सरकारों ने जगह-जगह यह सम्माननिधि चालू की है जो कि आज के अतिसंपन्न लोग भी पा रहे हैं. हमारा मानना है कि ऐसी कोई भी सम्माननिधि उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिन्हें कि आर्थिक मदद की जरूरत हो. बाकी लोगों के लिए सम्मान काफी होना चाहिए. सरकार, यानी जनता के पैसों से जो भी रकम दी जाती है, वह उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जो कि उसके लिए जरूरतमंद हों. हमारा तो यह भी ख्याल है कि केन्द्र और राज्य सरकारें जितने किस्म के सम्मान देती हैं, उनके साथ सम्माननिधि तभी दी जानी चाहिए जब लोग उसके लिए जरूरतमंद हों.

जिस देश-प्रदेश में लोग एक रूपए किलो के चावल के बिना भुखमरी में जीते थे, उस देश-प्रदेश में सरकारी धन किसी को भी देने के पहले एक न्यायसंगत तर्क का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए. यह तो सरकारों की अपनी राजनीतिक सोच है कि वे किसे लोकतंत्र का कैसा सेनानी मानती हैं, लेकिन जब जनता के खजाने से खर्च की बारी आती है, तो महज सम्मान से सम्मान किया जाना चाहिए, और सम्माननिधि को जरूरतमंदों को ही देना चाहिए.

अभी पिछले हफ्ते एक खबर आई कि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बलरामजी दास टंडन ने बढ़ी हुई तनख्वाह लेने से मना कर दिया, और पहले से चलती आ रही तनख्वाह को अपने लिए काफी माना. हमारा ख्याल है कि सरकार, राजनीति, और दूसरे कई दायरों में जहां-जहां जनता के पैसों से भुगतान होता है, तमाम किस्म के लोगों से वेतन, भत्ते, सहूलियतें, और दूसरे खर्चों को छोडऩे की अपील उसी तरह की जानी चाहिए जिस तरह कि सरकार ने रसोई गैस सब्सिडी छोडऩे के लिए की थी. जब लोग खुद होकर सरकारी खर्च छोडऩा नहीं चाहते, तब सरकार को ऐसे लोगों को एक आईना तो दिखाना ही चाहिए. ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि दो दिन पहले ही कर्नाटक से एक खबर आई है कि वहां एक मंत्री ने 20 लाख रूपए की एक कार को अपने लायक आरामदेह न बताते हुए 35 लाख रूपए की कार की मांग की है. साथ में यह कहा है कि वे बचपन से ही बड़ी गाडिय़ों में बैठते आए हैं, और 20 लाख की यह कार उनके लिए कम अच्छी हैं. अब ऐसे अरबपतियों को सरकारी ओहदों के साथ मिले हुए खर्च क्यों नहीं छोडऩे चाहिए?

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने जो पहल की है, वह पहल इस राज्य के बाकी लोगों तक भी बढऩी चाहिए कि अगर जरूरत न हो तो सरकारी सहूलियतें न लें. लोग बिना जरूरत बड़े-बड़े सरकारी बंगले लेते हैं, और उन्हें दर्जनों एसी लगाकर लाखों रूपए महीने का खर्च जनता पर डालते हैं. ऐसे बहुत से नेता हैं, हमारे आसपास हैं, और उनकी यह सोच कागजों पर दर्ज भी है. ऐसे लोगों से जनता को चुनाव में भी हिसाब लेना चाहिए.
*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार और शाम के अखबार छत्तीसगढ़ के संपादक हैं.

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