इंसेफ्लाइटिस ने छीना बचपन

मुजफ्फरपुर | एजेंसी: इंसेफ्लाइटिस ने कई बच्चों का बचपन छीन लिया है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के गोपालपुर गांव की किरण अपनी साढ़े तीन वर्षीय बेटी अंजलि का बचपन लौटाने के लिए अस्पताल, मंदिर-मस्जिद से लेकर झाड़फूंक करने वाले ओझाओं के दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है, लेकिन अंजलि दो महीने से ज्यादा समय से अपनी बचपन वाली ठिठोली और चंचलता को भूल गई है.

अंजलि उन बच्चों में से एक है जिसे एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम ने अपनी चपेट में ले लिया था. वैसे केवल अंजलि की मां किरण ऐसी महिला नहीं है, जिसका बच्चा बीमारी से ठीक तो हो गया है, लेकिन वह मानसिक रूप से कमजोर हो गया है.

बिहार के मुजफ्फरपुर, सारण, सीवान जिले के कई बच्चे ऐसे हैं जिन्हें एइएस ने कमजोर बना दिया है. अंजलि की मां किरण कहती हैं कि 11 अप्रैल को अंजलि को मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल इलाज के लिए ले जाया गया था और उसे 24 अप्रैल को छुट्टी दे दी गई.

अंजलि को तो घर ले आए परंतु उसकी स्थिति ठीक नहीं हुई. दूसरे ही दिन अंजलि की हालत एकबार फिर खराब हो गई. घर वाले उसे आखिरकार निजी चिकित्सा केंद्र ले गए, परंतु इलाज का खर्च वहन करने में वे सक्षम नहीं है. ऐसे में वे ओझा-गुणी के पास भी अंजलि को लेकर गए परंतु यहां भी उन्हें अंजलि को भला-चंगा करने का कोई उपाय नहीं मिला.

यही हाल औराई प्रखंड औलीपुर के रिंकी कुमारी की है. रिंकी वैसे तो अभी भी एसकेएमसीएच में एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम से लड़ रही है परंतु वह मानसिक रूप से कमजोर हो गई है. रिंकी की मां सुशीला देवी कहती हैं, “बच्ची लीची बगान गई थी और वहीं से यह बीमारी लेकर आ गई. शाम को वह बगान से लीची खाकर आई और रात में भोजन नहीं किया और देर रात बेहोश हो गई. जब होश आया तब वह मानसिक रूप से कमजोर नजर आने लगी.”

एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम से निपटने के लिए प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी भले ही राज्य सरकार बीमारी से निपटने का दावा कर रही हो, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि अगर सरकार पिछले कई वषरें से कोशिश कर ही रही है तब फिर इस बीमारी से आज भी बच्चों का बचपन क्यों छीन रहा है.

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की विशेषज्ञों की टीम तथा पुणे की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की टीम एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चों के आसपास के बच्चों के भी खून की जांच के लिए नमूना लेने का निर्णय लिया है. इधर, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ़ हर्षवद्र्घन ने बिहार और उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाई है.

एसकेएमसीएच के चिकित्सक डॉ़ गोपाल शंकर साहनी भी कहते हैं कि इस बीमारी से उबरने वाले बच्चों को बौने होने या विकलांग होने की पूरी संभावना होती है तथा मानसिक रूप से कमजोर होने का डर बना रहता है. साहनी के मुताबिक संक्रमण के बाद बीमारी इलाज मौजूद नहीं है, फिर भी बीमारी का प्रारंभ में पता चल जाए तो पीड़ित की जान बचाई जा सकती है.

गौरतलब है कि 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं, और मरने वाले बच्चों में से अधिकांश की उम्र एक से सात साल के बीच है.

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष अब तक 44 से ज्यादा बच्चों की मौत एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम से हो गई है. मृतक के परिजनों को सरकार ने 50-50 हजार रुपये सहायता राशि देने की घोषणा की है.

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