नैगम अस्पतालों में मची है लूट

जेके कर
नैगम अस्पतालों में मजबूर हृदय रोगियों को मरीजों को जमकर लूटा जाता है. इसका खुलासा केन्द्र सरकार के द्वारा जारी आकड़ों से होता है. जब हृदयाघात या हृदय की समस्या को लेकर कोई मरीज भर्ती होता है तो इन अस्पतालों पर धन-वर्षा होने लगती है. इस तथ्य के सबूत के तौर पर केन्द्र सरकार के विभाग ने खुद के द्वारा कराये गये अध्धयन को हाल ही में जारी किया गया है.

उल्लेखनीय है कि हृदयाघात या हृदय के वाहिनियों में अवरोध उत्पन्न हो जाने पर वहां पर एक स्टेंट लगा दिया जाता है. जिससे खून बिना रुके आ-जा सके. सारी करामात और बाजीगरी इस धातु के बने स्टेंट की कीमत को लेकर होती है. यह दो प्रकार का होता है एक धातु की बनी जाली दूसरी इसमें दवा की पर्त चढ़ी हुई होती है. भारत में नैगम अस्पतालों में जिन स्टेंट का उपयोग किया जाता है उसमें से 60 फीसदी आयातित होती हैं. जिसमें एबॉट, मेडट्रोनिक तथा बोस्टन साइंटिफिक की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. इन्हें स्टेंट बाजार का ‘मार्केट लीडर’ कहा जाता है.


इस विदेशी कंपनी एबॉट द्वारा जिस मूल्य पर स्टेंट का विदेशों से आयात किया जाता है उसमें 68-140 फीसदी का मुनाफा जोड़कर उसे स्टेंट के थोक व्यापारी को बेच दिया जाता है. उसके बाद थोक व्यापारी द्वारा उसे 72-400 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को बेचा जाता है. अंतिम रूप में जिस दाम पर स्टेंट का विदेशों से आयात किया जाता है उससे 294-740 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को दिया जाता है. जबकि यही एबॉट कंपनी सरकारी अस्पतालों में इसे विदेशों से मंगाने के बाद 100-200 फीसदी मुनाफे पर सप्लाई करती है.

इसी तरह से मेडट्रोनिक नामक विदेशी कंपनी जिस दाम पर इसे विदेशों से आयात करती है उसमें 82-232 फीसदी मुनाफा जोड़कर इसे स्टेंट के थोक व्यापारियों को बेच देती है. जिसे थोक व्यापारी द्वारा इसे 170-325 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को दिया जाता है. इस तरह से जिस मूल्य पर इन स्टेंट को विदेशों से मंगाया जाता है उससे 498-854 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को दिया जाता है.

सरकार द्वारा कराये गये अध्धयन के अनुसार बोस्टन साइंटिफिक विदेशों से मंगाये गये स्टेंट को थोक व्यापारी को 43-105 फीसदी मुनाफा जोड़कर बेचती है. जिसे थोक व्यापारी 175-809 फीसदी मुनाफे पर मरीजों को देती है. कुल मिलाकर इस कंपनी द्वारा जिस मूल्य पर विदेशों से स्टेंट मंगाया जाता है उससे 464-1200 फीसदी ज्यादा मूल्य पर मरीजों को इसका दाम चुकता करना पड़ता है.

हमारे देश में ‘बोफोर्स डील’ में कथित तौर पर 64 करोड़ रुपयों की घूस लेने पर केन्द्र की सरकार को सत्ता से हटना पड़ता है. इसी तरह से ‘अगस्ता वेस्टलैंड’ घोटाले में कथित रूप से 350 करोड़ की रिश्वत लेने पर पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एसपी त्यागी को सीबीआई गिरफ्तार कर लेती है. परन्तु सालों से हृदय रोगियों से हर साल 500-1000 करोड़ लूटने वाले नैगम अस्पतालों का बाल भी बांका नहीं होता है. उल्टे उन्हें जनता की सेवा करना वाला माना जाता है. पुरस्कारों से भी नवाज़ा जाता है.

नेशनल इंटरवेंशनल काउंसिल के अनुसार साल 2015 में करीब 5 लाख मरीजों को स्टेंट लगाया गया है. वर्तमान में भारत में कारोनरी स्टेंट का बाजार 1,400 करोड़ रुपयों का है. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हर साल मरीजों से कितना धन लूटा जाता है.

वास्तव में होता यह है कि हृदयघात के बाद मरीज की जांच की जाती है तथा बताया जाता है कि अमुक-अमुक स्थानों पर धमनियों में अवरोध है. इसे बकायदा दिखाया भी जाता है. परन्तु स्टेंट नैगम अस्पताल खुद सप्लाई करते हैं. इसलिये मरीजों के परिजनों के पास मोल-भाव करने की कोई गुंजाइश नहीं होती है. मरीज तथा उसके परिजन तो यही सोचते हैं कि जान बची लाखों पाये. दरअसल, इसमें नैगम अस्पताल हजारों-लाखों की कमाई कर लेते हैं. इसे लूट का नाम दिया जाये तो गलत क्या है.

जबकि जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं पर सरकार के द्वारा मुनाफे की मार्जिन तय की हुई है. इसमें थोक व्यापारी को 8-10 फीसदी तथा खुदरा व्यापारी को 16-20 फीसदी तक ही मार्जिन दिया जाता है. जब दवाओं पर मार्जिन तय है तब क्यों मानव जीवन को बचाने वाले कारोनरी स्टेंट का मूल्य तथा उसकी मार्जिन तक नहीं किया जा रहा है. खबर है कि केन्द्र सरकार इस बारें में सचेत है तथा जल्द ही कारोनरी स्टेंट का मूल्य तथा मार्जिन तय कर दिया जायेगा.

हमारा सवाल है कि इतने दिनों तक जिन मरीजों को लूटा गया है उनके पैसे वापस कराने का कोई उपाय सरकार के पास है क्या? हम इससे ज्यादा नहीं बोलेंगे, बोलेंगे, तो बोलोगे कि यह बोलता है.

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