फेक न्यूज़ और ट्रोल्स के दौर में सब कल्चर

दिनेश श्रीनेत | फेसबुक: हालात बुरे तो हैं पर इतने भी बुरे नहीं हैं. फेक न्यूज़ और ट्रोल्स के इस दौर में इसी सोशल मीडिया ने एक सब-कल्चर का निर्माण किया है. इस सब-कल्चर के जरिए हम रचनात्मकता के एक नए दौर में प्रवेश करते हैं. जहां नए किस्म की अभिव्यक्तियां हैं.

जहां यूट्यूब पर अपनी शायरी और कविताएं सुनाने वाले मौजूद हैं. छोटे से रेस्टोरेंट या किताबों की दुकान में स्टैंडअप कॉमेडी के जरिए अपने समय के विरोधाभासों में पर कटाक्ष करने वाले हैं. जहां हमख़याल लोगों के लिए कुछ नए ठिकाने हैं- वो कहीं जमीनी हैं तो कहीं वर्चुअल. चाहे वह भिलाई का नु्क्कड़ कैफे हो- जहां ट्रांसजेंडर आपको कॉफी सर्व करते मिल जाएंगे या फिर पाकिस्तान की प्रोग्रेसिव लड़कियों का ग्रुप ‘गर्ल्स एट ढाबाज़’ हो.


‘द डॉन’ के अपने कॉलम में दुपट्टे से डॉयलॉग करती युवा लेखिका युसरा अमजद हो, सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाते भारत के असीम त्रिवेदी हों या इसलामिक कट्टरपंथ के खिलाफ अपनी फिल्मों के जरिए बात रखने वाली नार्वे की दिया खान. छोटे-छोटे आंदोलन हैं. मुट्ठी भर लोग हैं. उनकी ही आवाजें हैं. मगर ये आवाजें मिलकर एक गूंज़ पैदा कर रही हैं. कभी वह लाहौर का ‘चांद रात आवारगी’ है तो कभी दिल्ली की ‘मेरी रात मेरी सड़क’ है.

यह सब कुछ क्लासिक नहीं है. यह तात्कालिक है. बस अभी-अभी उठे ख़्याल हैं, अभी कही जाने वाली बात है, अभी बोली जाने वाली कविता है. उसमें निखार या तराश के लिए वक्त ही नहीं है. वह अभी तंदूर की आग से निकली गर्म रोटी की तरह है. वह कच्ची है, वह जली हुई है… मगर भूख को उसके सोंधेपन, उसकी खुशबू, उसकी गरमाहट की जरूरत है.

पाकिस्तान में स्टैंडअप कॉमेडी करने वाली औरतों के ग्रूप ‘ख़वातून’ और ‘औरतनाक’ हों या फिर भारत की अदिति मित्तल या वासु प्रिमलानी हों. चाहे पुरानी दिल्ली के कहवाघर से लेकर इंदौर और लखनऊ में होने वाले ओपेन माइक सेशन हों. जहां लड़के-लड़कियों को उनकी डायरी में चुपके से लिखी जाने वाली कविताएं या शायरी के श्रोता मिल जाते हैं.

यह झूठी खबरों से दूर सच्चाई की तासीर समझने की नई कोशिशें हैं. आज बहुत से लोगों के पास कहने के लिए कुछ है. आज उनको सुनने वाले कुछ लोग भी हैं. कला का अभिजात्य टूट रहा है. अभिव्यक्ति खुद एक अनजान भविष्य की तरफ बढ़ रही है. पता नहीं आने वाले दिन कैसे होंगे? शायद आने वाले दिन किसी उत्सव की तरह होंगे. जब सड़को पर लोग गाते-बजाते निकल पड़ेंगे.

किसी भी गोली या लाठी की परवाह किए बगैर…

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