इस प्रत्यक्ष आय से किसान का क्या होगा?

देविंदर शर्मा
मैं नहीं जानता कि दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवारों को हर महीने सीधे मिलने वाले पांच सौ रुपये की आय 12 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को भयंकर कृषि संकट से उबारने में कैसे सक्षम होगी. और न ही मैं यह समझ पा रहा हूं कि यह मामूली-सी मदद किसानों की आत्महत्याओं को रोकने में कैसे सहायक होगी. नाबार्ड अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण 2016-17 के मुताबिक, किसानों की औसत आय 8,931 रुपये प्रति महीने होनी चाहिए. इसकी तुलना में और किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य के लिहाज से पांच सौ रुपये बहुत ही कम हैं.

अंतरिम बजट पेश करते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने किसानों की हताशा कम करने के लिए भारी उत्साह के साथ एक नई योजना की घोषणा की. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) नामक इस योजना की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि छोटे किसानों को प्रति वर्ष छह हजार रुपये प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिये दिए जाएंगे.


मौजूद वित्त वर्ष के लिए संशोधित बजटीय आवंटन करते हुए इसके लिए उन्होंने 20,000 रुपये देने की घोषणा की है. किसानों को आय में सीधी मदद करने वाली इस योजना के लिए प्रति वर्ष 75,000 करोड़ रुपये की बजटीय आवंटन आवश्यकता होगी. इस योजना का विचार संभवतः तेलंगाना से लिया गया है, जहां मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को उनकी प्रसिद्ध रायतु बंधु योजना का चुनावी लाभ मिला, जिसमें शुरू में किसानों को प्रति एकड़ 8,000 रुपये सालाना मदद दी जाती थी, जिसे बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दिया गया है.

पीएम-किसान के लिए सरकार ने 75,000 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान कर दिए हैं. वह चाहती तो इसे दोगुना कर सकती थी, जो कि किसानों की आय बढ़ाने में सार्थक रूप से मददगार होता. छोटे किसानों को 12,000 रुपये की मदद से बजटीय आवंटन को दोगुना करना पड़ता. जहां यह प्रश्न है कि इसके लिए पैसा कहां से आता, तो इसका जवाब यह है कि उद्योगों को 2008-09 की वैश्विक मंदी के बाद से दी जा रही 1,86 लाख करोड़ रुपये की वित्तीय मदद रोकी जाए.

दस साल बाद इस इस पैकेज का कोई आर्थिक औचित्य नहीं है. दस वर्षों में उद्योगों को 18.60 लाख करोड़ रुपये इस पैकेज के रूप में दिए गए हैं, लेकिन इसकी वजह से हुए वित्तीय असंतुलन को लेकर कोई सवाल नहीं करता. यह धन किसानों को क्यों स्थानांतरित नहीं किया जा सकता था?

तेलंगाना की तरह केंद्र ने प्रत्यक्ष आय मदद को ऐसे किसानों तक सीमित रखा है, जिनकी खुद की जमीन है. लेकिन रायतु बंधु में जमीन की कोई सीमा नहीं है, यानी यदि किसी किसान के पास दस एकड़ जमीन है, तो उसे उसी के अनुपात में मदद मिलेगी. केंद्र ने यह सीमा ढाई हेक्टेयर जमीन तक सीमित कर दी है. छोटे किसानों तक पहुंचने का यह निश्चित ही अच्छा तरीका है, लेकिन इसमें बटाईदार किसानों को छोड़ दिया गया है, खेतिहर आबादी में उनकी हिस्सेदारी 40 से 45 फीसदी है. प्रत्यक्ष आय मदद की राशि कम होने के बावजूद भूमिहीन किसान और खेतिहर मजदूर इसे लेकर आवाज उठा सकते हैं.

सरकार चाहती तो ओडिशा में चल रही ऐसी योजना से सीख ले सकती थी. इस योजना का नाम है, कालिया- कृषक असिस्टेंस फॉर लाइवलीहुड ऐेंड ऑग्मेंटेशन- यह योजना इस तरह तैयार की गई है, ताकि भूस्वामी और भूमिहीन, दोनों तरह के किसानों को वित्तीय, आजीविका और बीमायुक्त खेती संबंधी मदद मिले. तेलंगाना और ओडिशा में किसानों को जो मदद दी जा रही है, वह अधिकतम दस हजार रुपये सालाना है.

प्रत्यक्ष आय मदद आज आर्थिक सचाई बन चुकी है. सबसे पहले मैंने जब इसकी बात की थी, तो मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों ने इसे खारिज कर दिया था. लेकिन वर्षों बाद एहसास हुआ कि बाजार में किए गए सुधारों ने किसान समुदाय को नजरंदाज कर दिया. इसने मुझे स्मरण करा दिया कि किस तरह देवीलाल ने वृद्धावस्था पेंशन योजना शुरू की थी. इसकी शुरुआत डेढ़ सौ रुपये महीने से हुई थी और आज हरियाणा जैसे राज्य में यह 2000 रुपये महीने है. किसानों को दी जाने वाली प्रत्यक्ष मदद का प्रभाव आने वाले वर्षों में तेज विकास के रूप में दिखने की उम्मीद है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!