किसानों का भरोसेमंद है हंसिया

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में खेती के दौरान काम आने वाले विभिन्न प्रकार के औजार आज भी कृषकों के लिए बेहद भरोसेमंद है. टंगली, बंसला, हंसिया, कसना, गैंती आदि आजकल रेडिमेड और मशीनों से बनाया हुए मिल जाते हैं, लेकिन गांव में आज भी लोहार किसानों के प्रमुख सहायक के रूप में काम करते हैं.

महसमुंद जिले के बलौदा क्षेत्र के अंतिम छोर खोखेपुर में ऐसा ही एक लोहार मनबोध आस-पास के गांव के किसानों के लिए टंगली, बंसला, हंसिया, कसना, गैंती आदि की मरम्मत और धार करते हैं. उनका काम आज के महंगे युग के हिसाब से कमजोर है, लेकिन मनबोध और उनके बेटे किसी तरह अपनी जीविका इसी लोहारी के काम से चला रहे हैं. खेती के पहले और धान कटाई के दिनों में उनके पास काफी काम रहता है. दिन में लगभग 200 रुपये कमा लेते हैं.

65 वर्षीय मनबोध ने बताया कि टंगिया, कसना आदि में धार बनाने के लिए 10 रुपये, हंसिया, गैंती, के लिए 30 रुपये की दर तय है. धुकनी चलाने के लिए उन्हें कोयला कहां से मिलता है पूछने पर उन्होंने बताया कि जो लोग लकड़ी जलाते हैं उसमें बनने वाला कोयला वे खरीदते हैं. स्कूलों में मध्यान्ह भोजन में जलने वाली लकड़ी के बाद जली लकड़ी का कोयला खरीद कर वे अपना काम चलाते हैं. खाली समय या काम नहीं होने पर आजीविका के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि माटी बोहने खेत में जाता हैं या फिर मनरेगा में काम करते हैं.

किसी तरह उनकी गाड़ी चल जाती है. वे अपने काम से तथा किसान उनके काम से संतुष्ट हैं. बहुत से गांवों के बीच ये लोहार किसानों के भरोसे के रूप में बैठे हैं. इसी तरह दुर्ग, कवर्धा और बिलासपुर जिले में के लोहार भी अपनी पुस्तैनी व्यवसाय के प्रति सजग हैं. इनके बनाए परंपरागत औजारों पर लोगों का भरोसा आज भी कायम है.

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