रेलवे में एफडीआई ही क्यों?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: इस लाख टके के सवाल पर मंथन आवश्यक है. रेल मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने गुरुवार को संवाददाताओं को बताया कि रेलवे ने बड़ी परियोजनाओं के लिए सैद्धांतिक रूप से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, एफडीआई को अनुमति देने का फैसला कर लिया है. उन्होंने संवाददाताओं से आगे कहा कि इस बारे में उनकी वाणिज्य मंत्रालय से बातचीत शुरू हो गई है और अगले तीन चार दिन में इस बारे में स्पष्ट फैसला हो जाएगा.

गौरतलब है कि रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने भी रेलवे में एफडीआई के संकेत दिए हैं. मनोज सिन्हा के मुताबिक परिचालन, सुरक्षा, कैटरिंग को छोड़ हर क्षेत्र में निवेश संभव है. छोटे स्टेशनों पर रेक प्वाइंट, वेयरहाउस बनेंगे और कई इलाकों में एफडीआई संभव है. इससे रेलवे के विकास में मदद मिलेगी. देश की आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिये रेलवे प्रमुख क्षेत्र है और इसमें जीडीपी में एक प्रतिशत वृद्धि करने की क्षमता है.


दोनों मंत्री महोदय के बातों से स्पष्ट है कि रेलवे बहुत कुछ करना चाहती है जिसके लिये उसे धन की आवश्यता है. इसके अलावा रेलवे की करीब 5 लाख करोड़ रुपयों की परियोजना फंसी हुई है. इसमें पहले यह जान ले कि यह रकम हमारे देश के सकल घरेलू उत्पादन के 5 फीसदी के ही करीब का है. रकम बड़ी है इसलिये इसे निवेश के माध्यम से सुलझाया जाने वाला है.

ऐसा कौन है जो रेलवे में विकास नहीं चाहता है परन्तु लाख टके का सवाल यह है कि क्या पैसा केवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से ही आ सकता है. क्या भारत के उद्योगपतियों के पास इतना धन नहीं है कि वे अपने देश के रेलवे में निवेश कर सके. अभी बुधवार को ही खबर आई थी कि अकेले मुकेश अंबानी ही अगले 2-3 वर्षो में देश में 1.80 लाख करोड़ रुपयों का निवेश करने जा रहें हैं. तो क्या देश के अन्य उद्योगपति मिलकर रेलवे में निवेश नहीं कर सकते हैं.

एक बात हम आपको पहले ही स्पष्ट कर देते हैं कि यहां पर बहस का मुद्दा निजीकरण की इजाजत देनी चाहिये कि नहीं, वह नहीं है. हम बहस की शुरुआत केवल इस बिन्दु पर ही केन्द्रित रखना चाहते हैं कि निवेश सरकार को विदेशी ही क्यों चाहिये ? हालांकि, निजीकरण के अपने गुण-दोष हैं जिस पर हमें संदेह नहीं है. इस निजीकरण से जुड़ा हुआ एक और सवाल है कि आखिरकार निवेश के लिये सरकार स्वंय सक्षम क्यों नहीं है ? अर्थ व्यवस्था के इस दूसरे पहलू पर फिर कभी मंथन किया जा सकता है.

अभी मंथन का विषय यह है कि केन्द्र सरकार की प्राथमिकता में देशी उद्योगपति हैं या विदेशी उद्योगपति ? इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिये कि भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा नौकरी देने वाला उद्योग है. लाखों भारतीय इसमें नौकरी करके अपना पेट चलाते हैं. रेलवे से कमाई नहीं होती है यह कहने से काम नहीं चलने वाला है. अभी बुधवार को ही खबर आई थी कि भारतीय रेलवे ने अप्रैल से मई 2014 के दौरान कुल 18.063 करोड़ टन उपभोक्ता वस्तुओं की ढुलाई से अपने राजस्व में 7.05 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 16,405.26 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है.

बजट में घाटा दिखाना या मुनाफा दिखाना बही-खाते की बाजीगरी से कम नहीं है. गौर करने वाली बात यह है कि लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहते मुनाफे का बजट बताया जाता रहा है और ममता बनर्जी के रेल मंत्री बनते ही उसे घाटे का सौदा करार दिया जाता है. सवाल है केन्द्र सरकार के प्राथमिकताओं का. यदि निवेश की इजाजत देनी है तो देश के अद्योगपति क्या बुरें हैं. उन्हें निवेश की इजाजत देने से निवेश से होने वाला मुनाफा देश में ही रह जायेगा, विदेश नहीं जायेगा. इससे देश के औसत प्रति व्यक्ति आय में भी बढ़ोतरी होगी. देश की अर्थव्यवस्था भी सुधरेगी.

हमें यह सोचकर तकलीफ होती है कि भारतीय रेल से प्राप्त मुनाफे को विदेशी झपटकर ले जायें. आपका ख्याल है जनाब !

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