विदेशी रिटेल कंपनियां डरी

नई दिल्ली | एजेंसी: भारत सरकार ने भले ही खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया हो, लेकिन वालमार्ट, टेस्को और केयरफोर जैसी विदेशी रिटेल कंपनियों के वर्ष 2014 के आम चुनाव से पहले यहां आने की उम्मीद कम ही है.

ऐसा राजनीतिक अनिश्चिंतता के कारण हो रह है. विदेशी रिटेल कंपनियां नही चाहती कि उन्हे आने के बाद वापस जाना पड़े. वे पुख्ता राजनीतिक परिस्थिति की प्रतीक्षा मे है. गौर तलब है कि मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और वामपंथी पार्टियां इस नीति के खिलाफ हैं. भाजपा ने तो यहां तक कहा है कि सत्ता में आने के बाद वह इस नीति को पलट देगी.


देश में डिलॉयटी के वरिष्ठ निदेशक अनीस चक्रवर्ती ने कहा, “बहु-ब्रांड खुदरा कारोबार के लिए बहुत बड़ा निवेश चाहिए. मेरे खयाल से खुदरा कारोबार की कंपनियां और अधिक स्पष्टता का इंतजार करना चाहेंगी.”

उन्होंने कहा कि वालमार्ट, टेस्को और केयरफोर जैसी रिटेल कंपनियों द्वारा जताई गई चिंताओं में से कुछ का सरकार ने समाधान करने की कोशिश की है.

यूपीए सरकार ने पिछले सप्ताह बहु-ब्रांड खुदरा कारोबार नीति में कई विवादित शर्तो में ढील दी है. इनमें लघु उद्यमों से 30 फीसदी खरीदारी, बैंक एंड आधारभूत संरचना में 50 फीसदी निवेश और सिर्फ 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में ही सीमित रहने जैसी शर्ते शामिल हैं.

चक्रवर्ती ने कहा कि भले ही गुरुवार को मंत्रिमंडल के फैसले से नीति में कुछ स्पष्टता आई है, कई अस्पष्टता अब भी बाकी हैं और खुदरा कंपनियां निवेश का फैसला करने से पहले उन पर भी जवाब चाहेंगी.

सरकार ने बैक-एंड आधारभूत संरचना में 50 फीसदी निवेश की शर्तो में ढील दी है. संशोधित नियमों के मुताबिक सिर्फ पहली बार के निवेश में ही रिटेल कंपनियों को बैक-एंड आधारभूत संरचना में 50 फीसदी निवेश करना होगा. न्यूनतम निवेश की शर्त करीब 600 करोड़ रुपये है.

चक्रवर्ती ने कहा कि नई परियोजनाओं में बैक-एंड निवेश की बाध्यता है या नहीं, इस पर भ्रम बना हुआ है.

सच तो यह है कि राजनीतिक अनिश्चितता के कारण भी रिटेल कंपनियां भारत में प्रवेश करने से सकुचा रही हैं.

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