पटाखा इस्तेमाल नहीं करने की सामाजिक चुनौती

अनिल चमड़िया
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में पटाखा की बिक्री पर 1 नवंबर तक के लिए रोक लगाने का आदेश दिया है. जब भी न्यायालय कोई आदेश देता है तो उसकी कई तरह से व्याख्याएं की जाती हैं और वे सभी व्याख्याएं समाज का विभिन्न हिस्सा अपने सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक हितों के आधार पर करता है. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की एक व्याख्या यह भी की जा रही है कि उसने पटाखों की ब्रिकी पर तो रोक लगाई हैं लेकिन उसके इस्तेमाल पर पाबंदी नहीं लगाई है, यानी राजधानी दिल्ली क्षेत्र के लोग चाहे तो आसपास के दूसरे शहरों से लाकर पटाखों का इस्तेमाल कर सकते हैं. दीवाली का त्यौहार पटाखों के लिए सबसे बड़े त्यौहार के रुप में देखा जाता है और सुप्रीम कोर्ट का 1 नवंबर तक पटाखों की ब्रिकी पर रोक का आदेश इस दीवाली के आलोक में आया है.

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह एक याचिका आई है कि दिल्ली में हवा इतनी खराब होती जा रही है कि उसमें सांस लेना मुश्किल हो रहा है और पटाखों के कारण ये हवा और जहरीली हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी पटाखों की बिक्री पर रोक लगा रखी थी लेकिन वह कुछ शर्तों के साथ थी. सवाल ये नहीं है कि दिल्ली में हवा के जहरीले होने के कारण सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या की जाए. समाज में हर चीज कोई संस्था ही तय करें, ये अच्छी बात नहीं है. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के आदेश की समीक्षा करने से बेहतर है कि हम अपने आसपास के हालात को अनुभव करें. मानव सभ्यता के विकास में जो जटिलताएं खड़ी हो रही हैं उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की एक चेतना विकसित करने की जरुरत महसूस हो रही है.


दिल्ली की आबादी के सामने कई वर्षों से प्रदूषण सबसे बड़े खतरे के रुप में सामने आया है. हमने मानव जाति के विकास के लिए पर्यावरण के जो ढांचे विकसित किए थे उन्हें आधुनिक सभ्यता के विकास के रास्तों की बाधा समझकर समाप्त करते जा रहे हैं. दिल्ली में यमुना को ही यहां की आबादी और उसके विकास के रास्तों ने ही उसे नाले में परिवर्तित कर दिया है. दिल्ली में पेट्रोल और डीजल से ज्यादा गैर आधारित वाहनों को प्रचलन में लाने की जरुरत महसूस हुई. उद्योगों को दिल्ली से बाहर किया गया लेकिन प्रदूषण के स्तर से दिल्ली के लोगों को राहत नहीं मिलती दिख रही है, क्योंकि प्रदूषण रहित दिल्ली की चेतना बनाने की तरफ हम आगे ही नहीं बढ़ पा रहे हैं, इसीलिए दिल्ली में रोजी-रोटी से ज्यादा बड़ा मुद्दा प्रदूषण का बढ़ता स्तर है.

हर तरह के प्रदूषण से दिल्ली घिरी हुई है. दुनिया के अनुभव हमारे सामने हैं कि आधुनिकता के नाम पर विकसित देशों में पर्यावरण की सुरक्षा एक राजनीतिक मुद्दा बनता है. हरियाली के लिए राजनीतिक पार्टियां बन रही हैं. दिल्ली ही नहीं बल्कि देश भर में पर्यावरण एक राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है.

त्यौहारों के रुप बदलते रहते हैं. कल पटाखों के बिना भी दीवाली होती थी और आज हम पटाखों के अत्याधिक इस्तेमाल के दौर वाली दीवाली तक पहुंचे हैं लेकिन दीवाली का महत्व तभी है जब आम जीवन को वह स्वस्थ और खुशहाल रखने में मददगार हो. वैसे भी दीवाली को अपेक्षाकृत संपन्न लोगों के त्यौहार के रुप में देखा जाता है लेकिन अब मुश्किल ये हो गई है कि अपेक्षाकृत संपन्न लोगों को जीने भर के लिए स्वच्छ वातावरण चाहिए. दीवाली की रात और उसके बाद के कुछ दिनों तक बूढ़े और बच्चों की हालात का अंदाज नहीं लगाया जा सकता है.

बड़ी संख्या में बूढ़े बुजुर्ग दिल्ली से बाहर चले जाते हैं. रात भर लोगों को शोर-शराबे से ही नहीं बल्कि धुएं और गंध से तड़पते देखा जाता है. दीवाली का त्यौहार कई स्तरों पर बदला है लेकिन यह बदलाव संपन्नता का तांडव जाहिर करने में ही नहीं होना चाहिए. इस त्यौहार को मनाने वालों को इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए कि उन्होंने अपने स्तर से दीवाली में इस्तेमाल होने वाली कुछ वैसी चीजों को छोड़ने का भी कभी कोई फैसला किया है, जिससे कि आम आबादी को राहत मिलती हो. यदि दीवाली के साथ मिट्टी की जगह दूसरे पदार्थों से निर्मित दीए और मूर्तियों के इस्तेमाल को आधुनिकता से जोड़कर देखते हैं तो पटाखों जैसी चीज को छोड़ना भी आधुनिकता है. समाज में ये चेतना नहीं हो कि उसे समय के अनुकूल उस तरह के व्यवहारों को त्याग देना है जो समाज को अंदर से कमजोर करता है, तो वह समाज अंदर ही अंदर घुटकर समाप्त होने के लिए अभिशप्त होता है.

समाज की चेतना ही उसके लिए सबसे बड़ी संस्था होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बजाय नागरिकों के स्तर पर ही ये पहले होनी चाहिए कि पटाखों का इस्तेमाल दीवाली या किसी भी ऐसे त्यौहार के मौके पर नहीं किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने अभी भी केवल ब्रिकी पर रोक लगाई है लेकिन अब समाज की चेतना के सामने ये चुनौती है कि वह इससे आगे बढ़कर पटाखों के इस्तेमाल पर अपने स्तर से रोक लगाएं. पटाखों का इस्तेमाल नहीं करने का अभियान ही वास्तव में आज स्वच्छता की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.

पटाखे अब केवल दीवाली में ही इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं बल्कि सालभर में कई मौकों पर उनका इस्तेमाल करने का प्रचलन बढ़ा है. यह सांस्कृतिक प्रदूषण का भी एक माध्यम बना है. सांस्कृतिक प्रदूषण वास्तव में सांस्कृतिक आक्रमण होता है और वह आक्रमण इस बात की परवाह नहीं करता है कि उससे किसे किस रुप में नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि वह अपना वर्चस्व जाहिर करने में ज्यादा यकीन करता है.

इस तरह के जब कोई फैसले आते हैं, तो उसके व्यापार और उस पर आश्रित आबादी के आर्थिक भरपाई का सवाल सामने आता है. बेहद ही यह मानवीय सवाल है और उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है लेकिन बहस को इस रुप में खड़ा नहीं किया जा सकता है कि आबादी के एक छोटे से हिस्से के जीने के साधनों को बनाए रखने के लिए बड़ी आबादी को बीमार करने की इजाजत दी जा सकती है.

समाज में पर्यावरण की चेतना को विकसित करने का अर्थ ही यह होता है कि वह आबादी के उस हिस्से को अपने जीवकोपार्जन के ढांचे में समाहित करें. सबसे बड़ी चुनौती सरकार के सामने होती है कि वह कितनी कौशलता से पर्यावरण और जीवकोपार्जन के सवालों को एक साथ हल करें.
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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