युवाओं से जुड़ा हुआ है फ्यूज़न संगीत

मुंबई | एजेंसी: विश्व संगीत को स्थापित करने में जुटे संगीतज्ञों ने इस बात को खारिज कर दिया है कि अंतर्राष्ट्रीय सहकार्य से भारतीय शास्त्रीय संगीत के मूलतत्व क्षरित हो जाते हैं. उन्होंने याद दिलाया कि युवाओं को आकर्षित करने के लिए पंडित रविशंकर ने फ्यूजन संगीत की शुरुआत की थी.

1980 के दशक में रविशंकर के फ्यूजन ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी. दो दशक बाद उनके शिष्य ‘गोल्डल ट्रायो’ (स्वर्ण त्रय) यानी ग्रेमी पुरस्कार विजेता मोहन वीणा वादक पंडित विश्व मोहन भट्ट, जानेमाने संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य और मशहूर शहनाई वादक पंडित दयाशंकर ने फ्यूजन संगीत से सभी को मुग्ध कर रहे हैं.

भट्ट ने आईएएनएस को बताया, “फ्यूजन संगीत में किसी भी तरह के संगीत की दो शैलियों को एक साथ मिला दिया जाता है और यही विश्व संगीत बन जाता है. हर संगीतज्ञ जो दो शैलियों को मिला रहा है उसे दूसरी शैली के बारे में जानकारी होनी चाहिए. पंडित जी (रवि शंकर) ने इसकी शुरुआत की थी और पूरी दुनिया में इसे सराहा गया था, खासतौर से युवाओं द्वारा.”

मोहन वीणा के सिरजनहार भट्ट ने कहा, “संगीत के इस ब्रांड के जरिए हम युवाओं से जुड़ रहे हैं.”

अमेरिकी वायलिन वादक और कंडक्टर येगुदी मेनुहिन और रविशंकर का लंबा सहकार्य 1996 में आए उनके अलबम ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ से शुरू हुआ. इस अलबम ने एक नई शैली पैदा की जिसमें सार्वभौमिक अपील थी. पंडित रविशंकर के तीन प्रिय शिष्य भट्ट, भट्टाचार्य और दया शंकर उनकी इस विरासत को प्रसारित कर रहे हैं.

संगीतज्ञों के अनुसार, फ्यूजन संगीत की खासियत है कि यह शास्त्रीय संगीत की तरह अनुशासित नहीं होता और छोटी समयावधि में किया जा सकता है.

भट्ट कहते हैं, “फ्यूजन में कोई निर्धारित प्रारूप नहीं है, जहां आप डेढ़ घंटे में एक राग सुनने की जरूरत होती है. इन दिनों लोगों के पास ज्यादा समय नहीं है.”

1994 में ट्रायो में शमिल होने वाले तालवादक बिक्रम घोष का कहना है, “कुछ लोग ही इसे करने योग्य हैं. आप एक शैली के संगीतज्ञ हैं और आपको दूसरी शैली की थोड़ी बहुत जानाकारी है तो आप फ्यूजन नहीं बना सकते.”

भट्टाचार्य का कहना है कि संगीतज्ञ को दोनों शैलियों की जानकारी होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “यह ध्यान रखना चाहिए कि फ्यूजन निम्न मूल्यों पर संगीत बनाना नहीं है..इसमें व्याकरण होनी चाहिए. कलाकार को अन्य शैली को सुनना और समझना चाहिए.”

शहनाई वादक दया शंकर फ्यूजन के लिए विभिन्न रूपों में समान टैपिंग को महत्व देते हैं. उन्होंने भारतीय संगीत के पश्चिमी संगीत से प्रभावित होने के लिए भी आगाह किया.

उन्होंने कहा, “हमारा संगीत पश्चिमी संगीत के प्रभावित हो रहा है, यह अच्छा नहीं है. मैं इसके ज्यादा प्रयोग के खिलाफ हूं लेकिन फ्यूजन ठीक है. हमें अपने श्रोताओं को वापस लाना होगा और वह संगीत देना होगा जो श्रोता, खासतौर से युवा पसंद करते हैं.”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *