बाजार और धरती का फर्क

सुनील कुमार
गांधी जयंती अभी हफ्ते भर पहले गुजरी तो बहुत से लोगों ने एक बार फिर गांधीवादी किफायती जिंदगी के बारे में कुछ घंटों के लिए सोचा, और फिर उसके तुरंत बाद उसके ठीक उल्टे जीना शुरू कर दिया. कई मामलों में तो ऐसा हुआ कि किफायत के इन घंटों का मानो गम गलत करने के लिए बहुत से लोगों ने अपनी जिंदगी के लिए उसकी भरपाई कर ली, अधिक खरीदी करके या अधिक बर्बादी करके.

यह कुछ वैसा ही था जैसे कि गांधी जयंती के शराबबंदी के बाद अगले दिन लोग कुछ अधिक पी लेते हैं, या सुबह से शुरू हो जाते हैं. लेकिन गांधीवादी सादगी की किफायत के खिलाफ भी आज बाजार के पास बड़े-बड़े तर्क हैं.


लोगों का यह मानना है कि अगर लोग खर्च न करें, तो बहुत से लोगों को रोजगार ही न मिले. जब लोग अपनी जरूरत से अधिक खर्च करते हैं, जरूरत से अधिक बड़ा मकान बनाते हैं, शादियों में बड़ी-बड़ी दावतें देते हैं, घरों में बड़े-बड़े बगीचे बनाते हैं, कपड़ों को हर रोज धुलवाते हैं और इस्त्री करवाते हैं, तो ऐसे हर काम में अनगिनत लोगों को रोजगार मिलता है.

अगर ये तमाम लोग गांधी की बताई सादगी में जीने लगें, खुद पखाना साफ करने लगें, और खुद कपड़े धोने लगें, कुल दो जोड़ी में जीने लगें, तो सामान और काम, इन दोनों का क्या होगा? इसलिए सादगी एक सीमा तक तो ठीक रहती है, लेकिन उसके बाद वह बेरोजगारी पैदा करती है, ऐसा बाजार का मानना रहता है.

लेकिन अब दूसरी तरफ कुछ बातों को देखें तो अभी मध्य एशिया के अराल समंदर की एक खबर आई है कि वह किस तरह रेगिस्तान में तब्दील हो गया है. और इसके पीछे फैशन इंडस्ट्रीज की वह भूख है जिसके चलते वह ग्राहकों की आदतों को बर्बाद करने का काम करती है.

दुनिया के इस इलाके पर अभी बीबीसी ने फैशन उद्योग के गंदे रहस्य नाम की एक डाक्यूमेंट्री बनाई है जो बताती है कि लोगों को अधिक कपड़ों की आदत डालने, और कपड़ों के फैशन जल्दी-जल्दी बदलने का सिलसिला चलाकर फैशन उद्योग धरती पर बड़ा बोझ डाल रहा है.

सूती कपड़ों के लिए कपास उगाने में ढेरों पानी लगता है, और इसके बाद कपड़ों की रंगाई, उनके रासायनिक कामों में और पानी लगता है. इसमें धरती का पानी खत्म होते जाता है, और धरती पर प्रदूषण का बोझ बढ़ते जाता है. एक वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर इस फिल्म में बताया गया है कि किस तरह एक जींस तैयार करने में जो कपास लगता है, उसे उगाने में 15500 लीटर पानी खर्च होता है. ऐसे ही कपास की खेती से यह पूरा इलाका रेगिस्तान बन गया है.

आज धरती पर सबसे ज्यादा पहने जाने वाले कपड़े, जींस को लेकर पानी की इस खपत को तो कोई शहरी सोच भी नहीं पाते हैं क्योंकि कपास की खेती उनकी नजरों के सामने नहीं होती है. अगर कपास के खेत के बगल से वे गुजरते भी हैं, तो भी उन्हें उस पानी का अंदाज नहीं रहता जो कि एक जींस के लायक कपास उगाने में लगता है.

अब दिक्कत यह है कि फैशन का पूरा कारोबार इसी पर चलता है कि कैसे लोगों को कपड़े तेजी से बदलने के लिए उकसाया जाए. नतीजा यह होता है कि जो कपड़े एक वक्त महज जरूरत रहते थे, वे अब ऐसी फैशन बन गए हैं जिसकी चाहत से राहत का कोई रास्ता नहीं है, और जो चाहत बढ़ती ही चलती है.

अब तो सोशल मीडिया पर इंस्टाग्राम जैसी जगहों पर अनगिनत चर्चित लोग कंपनियों के दिए हुए कपड़ों को पहनकर अपनी तस्वीर खिंचवाकर या खींचकर पोस्ट करते हैं, और उस प्रचार के लिए भुगतान लेते हैं, वे कपड़े भी. इसके बाद ये लोग सामानों की बिक्री की एक दूसरी वेबसाईट पर इन कपड़ों को बेचते हुए भी दिखते हैं.

बाजार का हाल यह है कि ब्रिटेन की खबरों की एक सबसे लोकप्रिय समाचार वेबसाईट पर ब्रिटिश शाही घराने, फिल्म और फैशन उद्योग, टीवी और खेल जगत के चर्चित लोगों की तस्वीरें जब खबरों के साथ लगती हैं, तो उनके पहने हुए एक-एक कपड़े का ब्रांड पहचानकर उनके साथ दाम लिखकर ऐसी तस्वीर पेश की जाती है कि उस चर्चित ने उस वक्त किस-किस ब्रांड के कुल कितने दाम के कपड़े पहने थे.

इसके बाद बाजार का तजुर्बा है कि लोकप्रिय लोगों के पहने कपड़ों या उनके लिए हुए फैशन के सामानों की तस्वीर के तुरंत बाद बाजार में वे सामान हाथों-हाथ बिक जाते हैं.

अब यहां पर दो सवाल हैं, यह जाहिर है कि किसी भी दूसरे कारोबार की तरह फैशन उद्योग से भी लोगों को रोजगार मिलते हैं. लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी जाहिर है कि ऐसे रोजगार के साथ-साथ धरती बेरोजगार होती जा रही है क्योंकि पानी खत्म होता है, प्रदूषण बढ़ता है, और प्राकृतिक साधन घटते चले जाते हैं, धरती पर कचरे का बोझ बढ़ते चले जाता है.

एक दूसरी सामाजिक दिक्कत यह भी होती है कि फैशन के ऐसे मुकाबले के चलते लोगों पर एक सामाजिक दबाव बने रहता है कि वे फैशन के साथ चलें. नतीजा यह होता है कि लोग अपनी जरूरत और ताकत, इन दोनों से आगे बढ़कर खरीददारी करते हैं, और उसके बाद भी लगातार एक बेचैनी के साथ जीते हैं कि उनके पास क्या-क्या नहीं है. यह होता है कि लोग उन्हें हासिल चीजों से खुश होने के बजाय अपनी अधूरी हसरतों को लेकर लगातार दुखी रहते हैं.

यह बात टेक्नालॉजी के साथ भी है कि लोग एक मोबाइल फोन खरीदते ही उसके बाद आने वाले अगले मोबाइल फोन की कुछ बेहतर खूबियों को लेकर अपने फोन से दुखी रहते हैं, ऐसा ही दूसरे सामानों के साथ भी होता है.

आज बाजार में सामानों की बिक्री में एक बड़ा हाथ उन सामानों की पैकिंग का होता है जो कि ग्राहक के इस्तेमाल की नहीं रह जाती, महज धरती पर बोझ बन जाती है. इसलिए एक ऐसे टैक्स की जरूरत हमने पहले भी बार-बार लिखी है जो कि किसी भी सामान की पैकिंग पर लगनी चाहिए.

पैकिंग में अगर बोतल है, तो उसके कांच या प्लास्टिक पर वजन के हिसाब से, उसके ऊपर अगर गत्ते का बक्सा है, तो उसके वजन के हिसाब से, और उसके भी ऊपर अगर पॉलीथीन या सेलोफिन है, तो उसके भी वजन के हिसाब से एक कचरा-टैक्स लगना चाहिए जिससे कारोबार को यह भी समझ आए कि पैकिंग में गैरजरूरी सामान लगाना उनका हक नहीं है, उन पर बोझ है. ऐसे टैक्स के बिना कारोबार हर किस्म की बर्बादी जारी रखेगा, और बढ़ाते चलेगा.

लेकिन चूंकि कारोबार कानूनी है, और किसी कारोबार से गांधीवादी सादगी की उम्मीद करना उसे खुदकुशी सुझाने जैसा है, इसलिए बाजार से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती. लोगों को खुद ही यह समझना होगा कि वे अपनी हसरतों और खुशियों को पूरा करने के लिए धरती को कितना अधूरा करके छोड़ेंगे?

यह अहसास आसान इसलिए नहीं है कि हिन्दुस्तान जैसे समाज में सार्वजनिक सम्पत्ति को कोई नागरिक बचाने के लिए अपनी नहीं मानते, लेकिन बर्बाद करने के लिए अपनी जरूर मान लेते हैं. ऐसे में धरती और कुदरत तो इतनी विशाल सार्वजनिक सम्पत्ति है कि उसके बारे में यह अहसास आसान तो है ही नहीं, मुमकिन भी नहीं है. यह लिखने का कितना असर होगा, यह अंदाज लगाना आसान नहीं है, पढऩे वालों पर असर की तो छोड़ ही दें, खुद लिखने वाले पर इसका कितना असर होगा इसमें भी बड़ा शक है.

लेकिन लोगों को यह तो समझना होगा कि वे आज अगर अधिक खरीदने और अधिक खर्चने की ताकत रखते हैं, तो यह ताकत धरती को बर्बाद करने में अधिक खर्च हो रही है, और अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाने में कम इस्तेमाल हो रही है. रोजगार तो ऐसे होने चाहिए जिनसे कुदरत को नुकसान कम हो, और लोगों की क्षमता का इस्तेमाल हो सके.

बंजर इलाकों में खेती, या जंगलों की उपज से जुड़े कामकाज, नदियों और समंदर से तरह-तरह की उत्पादकता जैसे बहुत से काम हो सकते हैं जो कि लोगों को रोजगार और कमाई दे सकते हैं, और इसके साथ-साथ धरती को बचा भी सकते हैं. इसलिए बाजार जिन मामलों में ऐसा दावा करता है, या ऐसा झांसा पैदा करता है कि वह रोजगार पैदा कर रहा है, तो वह हकीकत नहीं है.

बाजार धरती के इतने हिस्से का, इतनी कुदरत का नुकसान कर देता है जिसकी भरपाई यह कमाई नहीं कर सकती, और वह नुकसान एक पीढ़ी में हो चुका रहता है, और शायद अगली दर्जनों या सैकड़ों पीढिय़ां भी उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगी.

इसलिए न महज फैशन के, बल्कि धरती के सारे कारोबार को अगले सैकड़ों बरस के सार्वजनिक नफा-नुकसान से जोड़कर भी देखना चाहिए कि इस नुकसान को कैसे कम से कम किया जाए, और जहां यह कम न हो सके, वहां पर इस पर जुर्माना लगाकर उसकी भरपाई से धरती के नुकसान को कैसे सुधारा जाए.

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