जार्ज का जाना

जाबिर हुसैन | फेसबुक: सुबह-सुबह ही, किसी ने दिल्ली से जार्ज के निधन का समाचार दिया. मन दुखी हो गया. फेसबुक पर अपनी संवेदना प्रेषित करते वक़्त भी मन गहरे दुख में उलझा रहा. मुश्किल से दो वाक्य लिख पाया-‘कितनी ख़ामोशी से गुज़र गए जार्ज! शब्दों में आग भरने वाला व्यक्तित्व!’

मेरे सहयोगी, पवन कुमार ने बाद में सुझाया, चाक पर रेत से आपकी पोस्ट (17 मार्च 2016) लगा दूं. मैंने मौन रहकर अपनी सहमति दे दी.


शायद दो महीने बीते हों, जब, अचानक, फेसबुक पर अपने इस प्रिय नेता की एक तस्वीर नज़र आई. तस्वीर उनके निजी कमरे की थी, बिस्तर पर ढेर-सारी पत्रिकाएं, पुस्तकें बिखरी थीं. सिरहाने एक टेबललैम्प लगा था, और पास की तिपाई पर बेस-फोन. जार्ज बिस्तर पर अपनी आंखें बंद किए लेटे थे. आंखों पर चश्मा अब भी लगा था.

तस्वीर किसने फे़सबुक पर डाली, याद नहीं. कब ली गई होगी यह तस्वीर, नहीं कह सकता. पर कमरे और बिस्तर के हालात कह रहे थे कि तस्वीर हाल की है. घंटों यह तस्वीर आंखों में घूमती रही, और दिल में एक टीस बनकर उभरती-डूबती रही.

इस तस्वीर से बाहर, मुझे उनके बारे में काफ़ी दिनों से कोई जानकारी नहीं मिल पाई. दोस्त-मित्र, और क़रीबी साथी भी ज़रूरी सूचना नहीं दे सके. बस इतना कहा कि उनका उपचार चल रहा है.

दिल्ली में मेरी उनसे आख़िरी मुलाक़ात उस दिन हुई, जब वो राज्यसभा में सदस्यता लेने आए थे. सब से पीछे वाली पंक्ति में बिठाए गए थे, और राज्यसभा के अधिकारी हस्ताक्षर-बही लेकर उनकी सीट पर आए थे. शिवानंद तिवारी जी उनके साथ थे, बल्कि उन्होंने ही मेरे उनकी सीट तक जाने पर जार्ज से कहा: जाबिर साहब आपको ‘विश‘ करने आए हैं. मुझे याद है, नाम सुनते ही, जार्ज ने हाथ बढ़ाया और गर्मजोशी से मेरा हाथ देर तक थामे रहे. उनके उत्साही हाथों का यह स्पर्श भूलता नहीं!

दिल्ली छोड़ते वक़्त मिलने की ख़ाहिश हुई, पर संपर्क की कोई डोर नहीं दिखाई दी. मायूस बिहार लौट आना पड़ा.

कम ही लोगों को पता होगा कि 1977 के विधान सभा चुनाव में जार्ज ने ही मुंगेर टाउन हाल में मेरी पहली चुनावी सभा का उद्घाटन किया था. इस सभा की अध्यक्षता प्राचार्य कपिल जी ने की थी, और संभवतः जेपी के निर्देश पर, उनके अत्यंत क़रीबी सहयोगी, श्री एस एच रज़ी, भी सभा में शरीक हुए थे. साथ की तस्वीर में आप उन सबके चेहरे पहचान सकेंगे. सभा के बाद जार्ज को नाथनगर जाना था. मुझे साथ चलने को कहा. देर रात गए उनकी सभाएं भागलपुर में होती रहीं.

जार्ज को गंभीर और तनावपूर्ण मुद्रा में भाषण करते लाखों-करोड़ों लोगों ने देखा है. उन्हें मुस्कुराते, हंसते, हास्य-व्यंग्य की भाषा बोलते देखना अपने-आप में एक अनुभव था.

रक्षा मंत्री रहते, एक दिन, उन्होंने फ़ोन पर यह कहकर मुझे चौंका दिया कि वो दो दिनों के लिए पटना आ रहे हैं, और विधान परिषद् के गेस्ट हाउस में ठहरेंगे. मैं चौंक इसलिए गया कि भारत-पाक के रिश्ते जंग की भेंट चढ़े हुए थे, और सीमा पर गोले-बारूद की भाषा बोली जा रही थी. मेरा संकोच महसूस करते हुए जार्ज ने कहा: एनी प्राब्लेम. मैंने तुरंत कहा: यू आर मोस्ट वेलकम. कह तो दिया ‘मोस्ट वेलकम‘ पर मेरी रातों की नींद उड़ गई. उनकी ज़िद थी कि वहां सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया जाए और प्रशासन की मदद भी नहीं ली जाए. मैंने मुश्किल-से परिषद् के एक-दो कर्मियों को गेस्ट हाउस में तैनात किया. खुद मुझे, रात-भर जागकर, उनकी ख़बरगीरी करनी पड़ी. मैं आज तक उनके इस फ़ैसले के पीछे का रहस्य नहीं जान सका.

दूसरे दिन, वो अपने क्षेत्र नालंदा के भ्रमण पर चले गए.

बिहार में सैनिक स्कूल खोलने का फ़ैसला लटका तो एक दिन मैंने उनसे कहा, सरकार चाहती है, आप एक स्कूल गोपालगंज में भी स्वीकृत करें. आपकी क़लम से ही निर्णय होना है, तो इसमें क्या हर्ज है. जार्ज मुस्कुराए, फिर बोले: अच्छी वकालत करते हो, चलो देखो. फ़ैसला बिहार के हक़ में हुआ.

राजगीर रेल सेवा के उद्घाटन में आए तो मैंने उनसे कहा: आप बराबर सियाचीन का भ्रमण करते हैं. एक बार मुझे भी साथ ले चलिए. बोले, जानते हो ना वहां कितनी ठंड होती है. अ‘कलाइमटाइज़ होना पड़ेगा, ठंड सहने की आदत डालनी पड़ेगी. मैंने जवाब दिया, इतने वर्षों से इस पार्टी में हूं, अब भी ठंड सहने की आदत डालनी होगी!

जार्ज ज़ोरदार हंसी के साथ बोले: यस, यू हैव ए प्वाइंट. एक तस्वीर यहां इसी लम्हे को कै़द करती है.

जार्ज मेरे लिए अपने-आप में हमेशा एक जीवंत प्रेरणा रहे हैं. उनकी ख़ामोशी उदास लम्हों में मुझे बेहद तकलीफ़ पहुंचाती है.

जार्ज पर बहुत कुछ लिखने का मन है. समय ने साथ दिया, तो ज़रूर लिखूंगा.

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