सोना, बजट और आंकड़े

जे के कर
झूठ तीन तरह के कहे जाते हैं- सफेद झूठ, काला झूठ और आंकड़ों का झूठ. सच की तरह की प्रामाणिकता और तेवर के साथ सामने आने वाला आंकड़ों का झूठ बहुत बार इतना तन कर खड़ा होता है कि उसकी हकीकत जान पाना लगभग असंभव है. किसी भी बजट के आंकड़ों को परखने के लिये तुलनात्मक रुप में या बाजार मूल्यों के आधार पर वास्तविक बढ़ोत्तरी को देखने की जरुरत है.

वित्तमंत्री पी चिदंबरम भले इस बजट से खुश हैं और उनकी सरकार के दावे भी खूब हैं लेकिन 2013-14 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा तथा गांवों पर पिछले बजट की तुलना में कम खर्च किया जाने वाला है. कम से कम सोने के भाव-ताव को आधार बना कर देखने पर तो यही निष्कर्ष निकलता है.


विभिन्न कोणों और पैमानों से बजट की समीक्षा की जा रही है. राजनैतिक दल, कारोबारी गृहणियां, युवा, कृषक, शहर और गांव के लोग, सभी अपने-अपने तरीके से इस बजट को देख रहे हैं. हालांकि पिछले कुछ सालों में एक बड़ा समूह ऐसा भी सामने आया है, जो इस बजट को महत्व ही नहीं देता. इस वर्ग का तर्क है कि सरकार जब चाहे तब कीमतों में इजाफा कर देती है, कर लगा देती है तो फिर इस वार्षिक बजट को इतनी गंभीरता से लेने की जरुरत क्या है?

बजट के आंकलन का एक तरीका सोने की कीमतों को आधार बना कर देखने का भी है. अंततः खर्च को मूल्यों के आधार पर ही देखा जाना चाहिये, बाजार भाव को आधार बना कर. पिछले साल मार्च 2012 में 10 ग्राम सोने की कीमत थी 28,129 रुपये. सोने की यह कीमत फरवरी 2013 में बढ़ कर 30,090 रुपये हो गई है. यानी पिछले एक साल में सोने की कीमत में 6.9 प्रतिशत या करीब 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. इसी बढ़ोत्तरी को आधार बना कर हम ताजा बजट की समीक्षा करेंगे.

पिछला बजट 14,90,925 करोड़ रुपयों का था. इस साल 2013 में 16,65,297 करोड़ का बजट लेकर चिदंबरम सामने आये. इस तरह देखें तो पता चलता है कि पिछले साल की तुलना में ताजा बजट में 11.69 प्रतिशत की बढोत्तरी की गई है. अब जरा इसमें से सोने की 6.9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी को घटा दें तो यह आंकड़ा वास्तव में 4.78 प्रतिशत तक ठहरता है.

सोने की कीमत को आधार बना कर अगर ग्रामीण विकास के लिये प्रस्तावित बजट देखें तो गांवों के बजट की 5.12 प्रतिशत की बढोत्तरी 1.79 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी है. स्वास्थ्य पर यह बढ़ोत्तरी 6.66 प्रतिशत है, जो तुलनात्मक रुप से 0.25 प्रतिशत कम है. शिक्षा पर 6.55 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्शाई गई है, जो वास्तविक रुप में 0.38 प्रतिशत कम है. कृषि पर बजट का 8.23 प्रतिशत रखा गया है, जो 1.32 प्रतिशत ज्यादा है. जाहिर है, इन आंकड़ों के बाद यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि चिदंबरम के बजट में जनता के हिस्से जो कुछ आया है, वह इतना तो नहीं ही है, जितना मनमोहन सिंह की सरकार दावा कर रही है. जब रुपयों के आंकड़े ऐसे नहीं हैं तो फिर विकास के आंकड़ों और दावों पर कितना यकीन किया जाना चाहिये?

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