इलाहाबाद के पंडे और सरकारी दफ्तर

मुकेश नेमा | फेसबुक: इलाहाबाद के घाटों से ही होते हैं सरकारी दफ्तर. सच तो ये है कि ये इलाहाबाद के घाट ही हैं, जो सरकारी दफ़्तरों के रूप में पूरे देश में फैल गये हैं. चूँकि कहा जाता है कि ये दफ़्तर है और जनता के वाजिब काम करने के लिये स्थापित किये गये हैं तो आपकी समझदारी इसी में है कि इस कहे तो चुपचाप मान लें क्योंकि यदि आप उनके दफ़्तर होने या उनके कुछ और होने या उनके किसी किये धरे पर संदेह प्रगट करेंगे तो आप अपना ही कुछ नुक़सान करवा लेंगे, इसमें सरकारी दफ़्तर का क्या बिगड़ना है, ये इलाहाबाद के घाटों की तरह शाश्वत और अपरिहार्य हैं, वैसे भी सरकारी दफ़्तरों पर सवाल उठाना हमारी परम्पराओं और कर्मकान्डों पर सवाल उठाने जैसा ही है, हमारे सरकारी दफ़्तर ऐसे सारे तुच्छ विचारों से ऊपर होते हैं !

जिस तरह ज़िंदगी भर सामाजिक सुधारों का नारे लगाने वाला और प्रगतिशील विचारधारा के झन्डे उठाये घूमता हर आदमी बाप के मरते ही इलाहाबाद पहुँच कर गंगा किनारे बिना कोई सवाल किये पूरी श्रद्धा के साथ चुपचाप अपना मुन्डन करा लेता है, उसी तरह और उसी भावना से हमारे देश के सभी विवेकशील भद्रजन सरकारी दफ़्तरों में झुके सर के साथ ही पहुँचा करते हैं.


सरकारी दफ़्तरों और इलाहाबाद के गंगा किनारे अपने अपने तख़्त सजाये बैठे पन्डों की दुकानों में अन्तर तलाशना बहुत टेढी खीर है. जहाँ तक मैं समझता हूँ, इस पुण्यभूमि में बस यही दो जगहें हैं, जहाँ कभी ना कभी आपको पहुँचना ही होता है. लोग यहाँ आते हैं, धकियाये जाते हैं और खुद पैसे ख़र्च कर प्राप्त किये गये अपने चिकने सर लेकर अपने घर वापस लौटते हैं. सरकारी दफ़्तरों में भी पूरा देश पहुँचता है, यहाँ पहुँच भर जाईये, यहाँ आपको अपने जैसे बहुत से और भी दुखियारों के साथ लाचार, अमीर, ग़रीब, सभी अपनी बारी आने का इन्तज़ार करते मिलेंगे. भिखारी भी यहाँ हैं और आपका काम बारी से पहले करवा देने की ग्यारंटी देते दलाल भी. बिना कुछ किये धरे मोटे होते हु्ये पन्डों से बर्ताव करते अफसरों के दर्शन भी आपको यहीं होंगे, जो खुद कुछ नही करते, उनके छोटे कारिन्दे होते हैं, जो उनकी ओर से सारे कर्मकान्ड करते हैं.

हमारे सरकारी दफ़्तरों में भी इलाहाबाद की ही तरह हर छोटे बड़े मँझले आगन्तुक का निरपेक्ष भाव से मुन्डन सँस्कार कर दिया जाता है. गंगा यहाँ भी बहती है पर उल्टी ही बहती है. सरकारी आदमी हर वो काम करते हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिये या वे कम से कम वो काम तो नहीं ही करते, जिसके लिये वो वहाँ बैठाये गये हैं, वे हर आने वाले को आँखों ही आँखों में तौलते है, उसे उसकी औक़ात के अनुसार आसन देते हैं और बहुत से पोथी पत्रों, कर्मकान्डों में उलझा कर उसे मूड़ लेते हैं.

सरकारी दफ़्तरों में आने वाले भी इलाहाबाद यात्रा के अनिच्छुक यात्री की तरह ही धकियाया हुये से, अनमने भाव से अपनी जेबों में रूपये ठूँस कर आते हैं. वे यहाँ आना नहीं चाहते थे पर जिस तरह हर उस आदमी को इलाहाबाद जाना पड़ता है, जिसका बाप ताज़ा-ताज़ा गुज़र गया हो, उसी तरह हर आम और खास आदमी भी किसी सरकारी दफ़्तर में तभी जाता है जब वो अनाथ हो चुका हो. वैसै सरकारी दफ़्तर इस मायने में इलाहाबाद के पन्डों से बेहतर हैं, वो आपको बाप के होते हु्ये भी अनाथ होना महसूस करवा सकते हैं!

आपने कभी आपने देखा या सुना है कि कोई भला आदमी किसी सरकारी दफ़्तर में किसी काम से गया हो और बिना ज़लील हुये, बिना अपनी अन्टी ढीले किये और बिना अपना सर मुंडवा़ये अपना काम करवा कर राज़ी ख़ुशी सकुशल अपने घर लोट गया हो? ऐसा होने दिया जाना इलाहाबाद की ही तरह सरकारी दफ़्तरों की मर्यादा और पूर्व स्थापित गौरवशाली परम्पराओं के ख़िलाफ़ होता है, इसलिये ऐसा अनर्थ कभी नहीं होने दिया जाता.

इलाहाबाद से लौट कर आप वहाँ के लालची पन्डों को लाख गालियाँ बकते रहें, इससे उनकी सेहत पर कोई असर नही पड़ता. आप ऐसा ही करेंगे, वो पहले से जानते हैं और वे यह भी जानते हैं कि आप उन्हें कितना भी कोस लें, जब भी आपकी अम्मा मरेंगी आप एक बार फिर उनके सामने सर झुकाये बैठे होंगे !

किसी भी सरकारी आफ़िस में जाकर वहाँ से लौट कर देखिये आपको इलाहाबाद स्मरण हो ही आयेगा !

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